NDTV Khabar

सरकारी भर्तियों पर वक़्त की पाबंदी क्यों नहीं?

हमने नौकरी सीरीज़ की शुरुआत इसलिए की ताकि इसके साथ-साथ आप नौजवानों की ज़िंदगी में झांक सकें, देख सकें कि उनके साथ सरकारें कैसा मज़ाक कर रही हैं.

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
सरकारी भर्तियों पर वक़्त की पाबंदी क्यों नहीं?

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

नौकरी सीरीज़ का 28वां अंक आ गया है. जहां परीक्षाएं हो रही है वहां धांधली और लीक की ख़बरें गुलज़ार हैं और जहां परीक्षा हो चुकी है वहां जांच की मांग और ज्वाइनिंग की तारीख की मांग हो रही है. अगर आप सरकारी नौकरी की भर्ती की परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं तो साथ-साथ धरना प्रदर्शन की भी तैयारी कर लीजिए. जिस कॉपी में प्रैक्टिस करते हैं उसी के हाशिये पर पहले से ही मुर्दाबाद के नारे लिखना शुरू कर दीजिए. इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप भारत के किस राज्य में है, हर जगह यही हाल है. हमने नौकरी सीरीज़ की शुरुआत इसलिए की ताकि इसके साथ-साथ आप नौजवानों की ज़िंदगी में झांक सकें, देख सकें कि उनके साथ सरकारें कैसा मज़ाक कर रही हैं. चुनाव के समय युवा-युवा करने वाला कोई भी नेता इस परीक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए तत्पर नज़र नहीं आता है. चाहे वो सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का. हर कोई चाहता है कि युवाओं की नाराज़गी का लाभ उसे मिले, मैं बस इतना चाहता हूं कि युवाओं को नौकरी साफ सुथरी प्रक्रिया और पारदर्शिता से मिले.

'इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो न', अंकुश फिल्म का यह गाना गाते हुए ये 12,460 शिक्षक इतना प्रदर्शन कर चुके हैं कि वाकई इन्हें शक्ति और धीरज की बहुत ज़रूरत है. 15 मार्च को ये लखनऊ में फिर जमा हुए और अपनी ज्वाइनिंग की मांग करने लगे. भाजपा मुख्यालय के सामने ये जमा हो गए और नारे लगाने लगे. इनकी लड़ाई विचित्र है. दो-दो बार अदालत से केस जीत चुके हैं. मगर सरकार इनकी ज्वाइनिंग नहीं करा रही है. हमने ये मसला प्राइम टाइम की नौकरी सीरीज़ के अंक 7 और 24 में उठाया था और अब 28वें अंक में भी उठा रहे हैं. एक सवाल का जवाब नहीं मिल रहा कि जब ये लोग सिंगल बेंच और डबल बेंच से केस जीत चुके हैं तब इनकी ज्वाइनिंग की प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू हो रही है. क्यों नहीं हो रही है. जब 12,460 शिक्षकों की ये हालत हो सकती है तो समझिए बाकी परीक्षाओं की क्या स्थिति होगी.

पहली बार ये 3 नवंबर 2017 को इलाहाबाद हाई कोर्ट से जीत गए. कोर्ट ने कहा कि दो महीने में इन शिक्षकों की भर्ती हो जानी चाहिए. 3 जनवरी 2018 को दो महीने पूरे हो गए मगर 12,460 शिक्षक बहाली का इंतज़ार करते रह गए. फिर यह मामला डिविज़न बेंच में सुना गया. वहां से भी ये 12,460 शिक्षक जीत गए. इस बार हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से कहा कि 4 हफ्ते के भीतर भर्ती की प्रक्रिया शुरू कीजिए. 6 मार्च को चार हफ्ते पूरे हो गए. 15 मार्च को ये फिर धरने प्रदर्शन पर उतर आए हैं.

2016 में 12,460 शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन निकला था. मार्च 2017 तक इसकी काउंसलिंग चलती रही. 18 मार्च 2017 तक सारे ज़िलों के कट ऑफ़ गए और मेरिट लिस्ट बन गई थी. लेकिन 23 मार्च को योगी सरकार ने इन भर्तियों पर रोक लगा दी. उसके बाद से ये नौजवान हर मौके पर प्रदर्शन कर रहे हैं. कभी धरना देते हैं, कभी अदालत में मुकदमा लड़ते हैं. यहां तक कि 16 जुलाई 2017 से तीन सितंबर 2017 तक ढाई महीने लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान में धरना भी दिया.

बहुत से विधायक और सांसदों ने इनके लिए सरकार को पत्र भी लिखा है फिर भी इनकी ज्वॉइनिंग नहीं हो रही है. केंद्रीय श्रम एवं रोज़गार मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने भी इनके समर्थन में पत्र लिखा है फिर भी इनकी ज्वॉइनिंग नहीं हो रही है. पत्र लिखने की ज़रूरत ही क्यों है, अदालत के दो-दो आदेश हैं तब भी कुछ नहीं हो रहा. अगर कुछ हो रहा है, तो सरकार को इन 12,460 नौजवानों को बता देना चाहिए कि उसकी तैयारी किस स्तर पर है और इरादा क्या है. क्या इसलिए टाला जा रहा है ताकि कुछ दिन और इन्हें वेतन न देना पड़े या कोई और बात है.

पश्चिम बंगाल से भी हमें नौकरी सीरीज के लिए लगातार लोग लिखते रहते हैं और बंगाल के सर्विस कमिशन का हाल बताते रहते हैं. प्राइम टाइम के 13वें एपिसोड में हमने दिखाया था कि बंगाल के युवा बेरोजगार बेसहारा मारे-मारे फिर रहे हैं. वेस्ट बंगाल सर्विस कमीशन को बेस्ट बंगाल पब्लिक सर्विस कमीशन में मिला दिया गया था. पहले अधिकारियों और कर्मचारियों की भर्ती के लिए अलग-अलग आयोग होते थे, अब वहां एक ही है. मालदा जिले में शिक्षकों की बहाली के लिए चल रहे आंदोलन को 25 दिन से अधिक हो चुके हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं कर रहा है और वो हमें लगातार संदेश भेजते हैं. इसी तरह 7 मार्च को मदरसा के शिक्षकों ने कोलकाता में एक प्रदर्शन किया. इससे पहले भी कई बार आंदोलन कर चुके हैं.

इनकी परेशानी का आलम ये है कि वो इन्हें बंगाल से हमारे एनडीटीवी कार्यालय ले आई. संघर्ष करते-करते बैग में दस्तावेज़ों की फाइल मोटी हो गई है. ये लोग सुप्रीम कोर्ट में भी केस लड़ रहे हैं. इन्होंने बताया कि वेस्ट बंगाल मदरसा सर्विस कमिशन 2008 में बना था, इसके तहत 614 सरकारी मदद प्राप्त मदरसा स्कूल हैं. सात लाख छात्र पढ़ते हैं. बंगाल के कोलकाता मदरसा कालेज की स्थापना 1780 में हुई थी. इसके बाहर हुजूम प्रदर्शन कर रहा है. ये लोग बंगाल की अलग अलग जगहों में कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं. इनका कहना है कि ये बंगाल में 600 से अधिक प्रदर्शन कर चुके हैं. 294 विधायक और 42 सांसद इनके लिए पत्र लिख चुके हैं. मुख्यमंत्री को याचिका दी जा चुकी है. ये सभी पुरानी बातें हैं जो उन्‍होंने ही बताई हैं. मामला यह है कि 2008 से 2013 के बीच इनमें 12,000 शिक्षकों की बहाली हुई थी लेकिन मदरसों की प्रबंधन समिति ने ही केस कर दिया कि मदरसा कमीशन को शिक्षकों की बहाली का अधिकार नहीं है और यह अल्पसंख्यक संस्थान की स्वायत्तता में दखलदांज़ी है. मैनेजमेंट कमेटी चाहती थी कि संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार बहाली का अधिकार उसके पास रहे. शिक्षक कहते हैं कि प्रबंधन पहले मनमाने तरीके से बहाल करता था. कमिशन से बहाली होने पर प्रतियोगिता के बाद इनकी मेरिट लिस्ट बनी है. मदरसों की प्रबंधन समिति और मदरसा सर्विस कमिशन की कानूनी लड़ाई मे इन शिक्षकों का भविष्य दांव पर है. क्योंकि 12 मार्च 2014 को हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि मदरसा सर्विस कमिशन अवैध है. कमिशन को कहा कि वो किसी प्रकार की नियुक्ति न करे. कोलकाता हाईकोर्ट के डिविज़न बेंच ने भी माना कि मदरसा चयन आयोग अवैध है और इसके द्वारा की गई बहालियां भी अवैध हैं. इस आदेश से पहले बहाल हो चुके 12,000 शिक्षकों पर तलवार लटक गई है. अब सुप्रीम कोर्ट ने दो साल पहले हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि रिज़ल्ट निकाल दिया जाए. अंतिम फैसला नहीं आया. तब से इस मामले को कभी हाईकोर्ट तो कभी सुप्रीम कोर्ट चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट में अगली तारीख 4 अप्रैल को पड़ी है.

हमें तो पता भी नहीं कि मदरसा प्रबंधन समिति के क्या अधिकार हैं या मदरसा चयन आयोग को भंग किए जाने से किन लोगों की ज़िंदगी प्रभावित हो रही है, लोग खुद ही हमसे संपर्क कर रहे हैं जिन्हें हम थोड़ी बहुत जांच के बाद आपके सामने रख देते हैं. हमें लगता था कि हमारे बताने में कोई चूक होगी, मगर अभी तक किसी भी चयन आयोग ने ये तक नहीं कहा कि हमारी बात किस हद तक गलत है. सब इस इंतज़ार में हैं कि जल्दी नौकरी सीरीज़ बंद हो जाए ताकि फिर सबकुछ वैसा ही चलता रहे. मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस की परीक्षा पास करने के बाद 476 नौजवान ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं. हमने जवाब के लिए सपंर्क भी किया मगर जवाब नहीं मिला.

2015 में SSC-Junior Engineer का विज्ञापन निकला था. 24 जुलाई 2016 को मुख्य परीक्षा हुई जिसका रिज़ल्ट 16 दिसंबर 2016 को आ गया. दस्तावेज़ों की जांच के बाद 9 अक्टूबर 2017 को रिज़ल्ट भी आ गया.

जिस परीक्षा का विज्ञापन 2015 के साल में निकला था, उसका नतीजा आया अक्टूबर 2017 में. यानी दो साल तो इम्तहान में ही लग गए. उसके बाद ये साढ़े चार महीने से ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं. इन छात्रों का कहना है कि उन्हें कोई बता नहीं रहा कि कब ज्वाइनिंग होगी. आप यकीन नहीं करेंगे परीक्षा पास कर, मेरिट लिस्ट में आकर भी ये नौजवान घर बैठे हुए हैं. इन्हें कोई बताने वाला नहीं है. एसएससी की परीक्षा पास कर सीएजी के लिए सहायक ऑडिट अफसर के लिए चुने गए 1000 छात्र ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं. एसएससीसीएचएसएल 2015 की परीक्षा पास कर department of industrial policy and promotion (Dipp) में ज्वाइनिंग के लिए 24 छात्र 7 महीने से इंतज़ार कर रहे हैं. छात्रों का कहना है कि जनरल कैटगरी की ज्वाइनिंग हो गई है मगर अनुसूचित जाति और ओबीसी छात्रों की ज्वाइनिंग नहीं हो रही है. आप सोच रहे हैं कि मैं ये गिनती क्यों कर रहा हूं, इसलिए कर रहा हूं ताकि आपको पता चल सके छात्र चाहे 24 की संख्या में हो या 12,460 की संख्या में, चयन आयोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. कई बार लगता है कि सरकार ही बहाली नहीं करना चाहती है, चुनाव आते हैं तो भर्तियां निकाल दी जाती हैं और उसके बाद कभी कोर्ट तो कभी नकल के नाम पर इन्हें अटका दिया जाता है.

क्या कंप्यूटर शिक्षक के लिए भी बीएड की डिग्री अनिवार्य होती है, इसका हमें कुछ पता नहीं मगर यूपी में 15 मार्च को एलटी ग्रेड के 1500 कंप्यूटर शिक्षकों की बहाली आई है उसमें बीएड की शर्त है. छात्रों का कहाना है यह ठीक नहीं है. हम इंजीनियरिंग करने के बाद बीएड करने ही क्यों जाएं. हमारी कोई राय नहीं है इस पर, बस सूचना के तौर पर यहां रख रहा हूं. इन छात्रों का कहना है कि केंद्रीय विद्यालय संगठन, नवोदय विद्यालय और सेना के स्कूलों में कंप्यूटर के शिक्षके लिए बीएड नहीं होता है. अक्सर मैंने देखा है कि बहाली तो आती है मगर कई बार नई नई शर्तें जोड़ दी जाती हैं ताकि कोई मिले ही नहीं.

टिप्पणियां
बिहार के छपरा में एक जेपी यूनिवर्सिटी है, इसमें जिन लोगों ने 2012 में बीए में एडमिशन लिया है वो अभी तक बीए ही कर रहे हैं. छात्र खुद बताते हैं कि 40,000 से अधिक छात्र जेपी यूनिवर्सिटी के चक्कर में फंसे हैं. अब अगर 40,000 छात्र मिलकर अपनी समस्या का समाधान नहीं कर सकते तो फिर यही समझा जाना चाहिए कि वे और उनके परिवार वाले भी नहीं चाहते हैं दस बीस साल से पहले बीए पास हों. ये बी आर अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय का लंगट सिंह कॉलेज है. यहां के 2016-19 बैच के एक छात्र ने बताया कि अभी तक एक भी वर्ष की परीक्षा नहीं हुई है. कायदे से प्रथम वर्ष की परीक्षा अगस्त 2017 में हो जानी चाहिए थी मगर विभिन्न कारणों से 2017 के साल में इस विश्वविद्यालय में एक भी परीक्षा नहीं हुई. वीसी का कहना है कि वे 11 महीने पहले आए हैं और चीज़ों को दुरुस्त करने में लगे हैं. छात्र संघ का चुनाव और हड़ताल के कारण 2017 ज़ीरो ईयर रहा. इस विश्वविद्यालय में करीब दो लाख छात्र हैं. इस संख्या के बाद भी अगर छात्रों की ये हालत है तो बहुत दुखद है. ऐसा लगता है कि इन छात्रों के माता-पिता और बिहार के समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनके बच्चे बर्बाद किए जा रहे हैं. वेरी सैड.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

विधानसभा चुनाव परिणाम (Election Results in Hindi) से जुड़ी ताज़ा ख़बरों (Latest News), लाइव टीवी (LIVE TV) और विस्‍तृत कवरेज के लिए लॉग ऑन करें ndtv.in. आप हमें फेसबुक और ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं.


Advertisement