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प्राइम टाइम इंट्रो : क्यों होना चाहिए विशेषाधिकार?

क्या कोई लेख सदन की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है, सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले अगर तत्व हो भी तो क्या विशेषाधिकार का कानून या प्रक्रिया इन सब बातों को लेकर स्पष्ट है...

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प्राइम टाइम इंट्रो : क्यों होना चाहिए विशेषाधिकार?

कर्नाटक विधानसभा की फाइल तस्वीर

21 जून को कर्नाटक की विधानसभा ने दो संपादकों को एक साल के लिए जेल भेजने का आदेश दे दिया. 2014 में कांग्रेस के दो और बीजेपी के एक विधायक ने दो पत्रिकाओं के संपादकों के ख़िलाफ़ मानहानि करने के लिए लेख छापने का मामला उठाया. उस वक्त के स्पीकर ने मामले को विशेषाधिकार समिति में भेज दिया, उस समिति ने अपना प्रस्ताव दिया और मौजूदा स्पीकर जो उन तीन शिकायतकर्ताओं में शामिल थे, इन पत्रकारों को जेल भेजने का आदेश दे दिया.

विशेषाधिकार कमेटी का कहना है कि रवि बेलागरे बार-बार समन भेजने के बाद भी हाज़िर नहीं हुए, मगर अनिल राजू ने माफी मांग ली. लेकिन इसके बाद भी दोनों कई ऐसे लेख छापते रहे जिनसे इनकी मानहानि होती रही. बस स्पीकर के आदेश होते ही विधानसभा के सचिव ने सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव को संदेश भेज दिया कि आदेश का पालन हो. जबकि मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पत्रिकाओं में जो कुछ छपा था उसका संबंध सदन की कार्यवाही से नहीं था और न ही उन लेखों से सदन की कार्यवाही में बाधा पहुंचती है. Hi Bangalore और येलाहांका वॉइस के संपादकों को एक साल की जेल के साथ-साथ 10,000 रुपये के जुर्माने की भी सज़ा हुई है. इस फैसले के बाद से कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की भी आलोचना हो रही है कि जो पार्टी दिल्ली में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर आवाज़ उठाती है, वो बेंगलुरु में कैसे यह सब होते देख सकती है. 2014 में पत्रिकाओं के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन की शिकायत करने वालों में मौजूदा स्पीकर भी हैं, जो तब विधायक थे.

विशेषाधिकार हनन के मामले में निंदा होती है, फटकारा जाता है मगर जेल भेजने की सज़ा किसी ने सुनी नहीं. बस यहीं से विवाद शुरू हो गया कि क्या विधायिका को वो फैसले लेने चाहिए जो न्यायपालिका का काम है. जेल भेजने का काम न्यायपालिका का होता है.

इससे पहले 2006 में यूपी विधानसभा ने आईबीएन 7 के खिलाफ तीन विधायकों के स्टिंग करने पर विशेषाधिकार का नोटिस दिया था. हाल ही में टीवी टुडे ग्रुप ने जब मुज़फ्फरनगर दंगों से संबंधित एक स्टिंग किया था तब विधानसभा ने विशेषाधिकार का नोटिस दिया था. अब कर्नाटक का मामला सामने है. क्या इन दो पत्रकारों को जेल भेजने और जुर्माना तय कर सदन ने अपने विशेषाधिकार की सीमा का ऐसा विस्तार कर दिया है. हिन्दू अखबार ने 26 जून के अपने संपादकीय में लिखा है कि संविधान ने विधायिका को कुछ विशेषाधिकार दिए हैं ताकि सदन के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रहे और सदन चलाने में किसी प्रकार का दबाव या प्रभाव पैदा न किया जा सके. क्या किसी पत्रकार या सदन के बाहर के सदस्य को विशेषाधिकार के दायरे में लाया जा सकता है. पान सिंह तोमर का एक डायलॉग याद आता है जब पान सिंह का किरदार कहता है कि संसद में तो डाकू होते हैं तो क्या यह विशेषाधिकार का मामला बनता है.

क्या कोई लेख सदन की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है, सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले अगर तत्व हों भी तो क्या विशेषाधिकार का कानून या प्रक्रिया इन सब बातों को लेकर स्पष्ट है. हमने इस संदर्भ में प्रैक्टिस एंड प्रोसिजर ऑफ पार्लियामेंट नाम की किताब के पन्ने पलटे जिनके लेखक एमएन कॉल हैं, एसएल शकधर हैं और जिसे पीडीटी आचार्या ने संपादित किया है. इसके पेज नंबर 309 से 311 तक विशेषाधिकार की प्रक्रिया के बारे में काफी कुछ लिखा हुआ है. सदन में विशेषाधिकार का मामला उठाने से पहले स्पीकर की अनुमति लेनी होती है. विशेषाधिकार का मामला उठाने के लिए सदस्य को लिखित रूप में लोकसभा जनरल सेक्रेट्री को देनी होती है. नोटिस के साथ-साथ दस्तावेज़ सौंपना भी अनिवार्य होता है. नोटिस मिलने के बाद स्पीकर तय करता है कि सदन में विशेषाधिकार का मामला उठे या नहीं. इसके बाद स्पीकर का फैसला सदस्य को बता दिया जाता है. स्पीकर मना भी कर सकते हैं. तब जाकर सदस्य सदन में विशेषाधिकार का सवाल उठा सकता है. सदन की एक बैठक में एक से ज़्यादा विशेषाधिकार के मामले नहीं उठाए जा सकते हैं.

स्पीकर की सहमति के बाद ही विशेषाधिकार का नोटिस स्वीकार होता है. विशेषाधिकार समिति जब जांच कर रिपोर्ट देती है तो स्पीकर पर निर्भर करता है कि वो उसे खारिज कर दे या स्वीकार करे. अगर स्पीकर स्वीकर कर लेता है तो उसे सदन के सामने रखा जाता है और सदन उस रिपोर्ट पर फैसला लेता है. इस किताब के पेज नंबर 310 पर लिखा है कि अगर किसी अख़बार की रिपोर्ट में सदन की कार्यवाही के मामले में ग़लत जानकारी लिखी गई है या सदन या सदस्यों पर प्रतिकूल टिप्पणी की गई है तब स्पीकर हो सकता है कि विशेषाधिकार हनन के मामले में फैसला देने से पहले अखबार के संपादक को अपना पक्ष रखने के लिए कहे. अगर संपादक माफी मांगता है या अफसोस ज़ाहिर करता है, संशोधन छापने के लिए तैयार हो जाता है तब स्पीकर विशेषाधिकार हनन का मामला उठाये जाने की अनुमति नहीं देता है.

कई बार सदस्य इस बात के लिए भी विशेषाधिकार का नोटिस देने की अनुमति मांगते हैं कि पुलिस अधिकारी ने मारपीट की, धक्का-मुक्की की या शिष्टाचार का पालन नहीं किया. इसके बारे में इस किताब के पेज नंबर 311 पर जो लिखा है वो दिलचस्प है. एक के बाद एक कई स्पीकर ने माना है कि अगर सदस्य संसदीय कार्य से अलग किसी काम के लिए गया है और उसके साथ धक्का मुक्की हो जाए या बुरा बर्ताव हो जाए तो वो विशेषाधिकार का हनन नहीं है या फिर शिष्टाचार का पालन नहीं हुआ तो वो विशेषाधिकार नहीं होगा.

मान लीजिए कि किसी विधानसभा के भीतर लोकसभा या उसके सदस्य के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी कर दे, तो उसके खिलाफ लोकसभा में विशेषाधिकार का नोटिस स्वीकार नहीं होता है क्योंकि हर सदन की अपनी गरिमा और स्वतंत्रता है. इसके लिए पेज नंबर 314 पर एक दिलचस्प केस का ज़िक्र है सदन की अवमानना या विशेषाधिकार के हनन के मामले में सज़ा का प्रावधान है. जिस किताब का मैंने हवाला दिया प्रैक्टिस एंड प्रोसिजर ऑफ पार्लियामेंट उसमें पेज नंबर 272 पर लिखा है कि अगर अवमानना या विशेषाधिकार का हनन बहुत गंभीर नहीं है कि उसे गिरफ्तार किया जाए तो अवमानना करने वाले व्यक्ति को सदन की दहलीज़ पर बुलाकर शब्दों से प्रताड़ित किया जाता है.

लोकसभा में अभी तक ऐसे दो मामले हुए हैं. जब सदन की दहलीज़ पर बुलाकर प्रताड़ित किया गया है. मतलब वो दरवाज़े पर खड़े रहते हैं और सदन अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर करता है. इनमें से एक मामला एक साप्ताहिक पत्रिका दि ब्लिट्ज में छपे लेख का भी है. एक केस में लोकसभा के सेक्रेट्री जनरल को ही प्रताड़ित किया गया, मगर उन्हें सदन की दहलीज़ पर नहीं बुलाया गया था. सिर्फ हाउस में प्रस्ताव पास हुआ था.  

पेज नंबर 273 पर प्रोसिक्यूशन ऑफ ऑफेंडर्स में लिखा है कि विशेषाधिकार के मामले को तय करते समय सदन के पास विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्ति होती है. सदन कोर्ट की तरह एक्ट कर सकता है. इस मामले में सदन ही सर्वोच्च है मगर सदन को संविधान के दायरे में ही फैसला लेना होगा. अगर सदन चाहे तो उसके पास जो सज़ा देने के अधिकार हैं वो पर्याप्त नहीं है, तब वो इस मामले को अदालत में भेज सकता है. जितना पढ़ा उससे यही समझ आया कि सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी जा सकती है.

एक बार लोकसभा की पब्लिक गैलरी में किसी विजटर ने नारे लगा दिए. उस व्यक्ति के पास दो पिस्टल थी और पटाखे भी थे. सदन ने एक महीने की कड़ी सज़ा सुनाई थी. स्पीकर के आदेश पर इस फैसले को पुलिस के पास भेज दिया गया था. 19 दिसंबर, 1978 को छठी लोकसभा ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, आरके धवन और डी सेन को विशेषाधिकार हनन के मामले में दो सत्रों के बीच के समय में जेल भेजने का फैसला सुनाया था, सदन की सदस्यता से निलंबित कर दिए जाएं. मगर 7 मई 1981 को सातवीं लोकसभा ने एक दूसरा प्रस्ताव पास किया और इन तीनों को निर्दोष करार दिया.


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