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क्या इन उपचुनावों के नतीजों से विपक्ष की लामबंदी बढ़ेगी?

उपचुनावों के नतीजों को बहुत लंबा नहीं खींचना चाहिए, मगर इसके ज़रिए भविष्य में बनने वाले राजनीतिक समीकरणों की आज़माइश ज़रूर देखी जा सकती है. 31 मई के उपचुनावों के नतीजों का एक पैटर्न है.

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क्या इन उपचुनावों के नतीजों से विपक्ष की लामबंदी बढ़ेगी?

चुनावी नतीजे की रात जानकारों की रात होती है. वो राजनीति के बारे में जितना कुछ आगे पीछे जानते हैं, आज की रात ज़रूर बोलने आते हैं और फिर कुछ दिनों तक भविष्य से जोड़ कर लिखने लगते हैं. हर चुनाव में बहुत कुछ बदल जाने की भविष्यवाणी करने वाले जानकारों को फिर से उन फार्मूलों की तरफ लौटना पड़ रहा होगा जिन्हें वे हमेशा के लिए रिजेक्ट कर चुके हैं. उपचुनावों के नतीजों को बहुत लंबा नहीं खींचना चाहिए, मगर इसके ज़रिए भविष्य में बनने वाले राजनीतिक समीकरणों की आज़माइश ज़रूर देखी जा सकती है. 31 मई के उपचुनावों के नतीजों का एक पैटर्न है. दो प्रकार की चुटकियां मार्केंट में ली जा रही हैं. विपक्ष के खेमे की चुटकी है कि लगता है कि आयकर विभाग और सीबीआई ने ठीक से मेहनत नहीं की. भाजपा समर्थकों के खेमे की चुटकी है कि उपचुनाव विपक्ष का, आम चुनाव भाजपा का. चुटकी चुटकी के बीच कैराना में क्या हुआ पहले देखते हैं, फिर उसके बाद देखेंगे कि कैराना में पहले क्या हुआ था.

कैराना से राष्ट्रीय लोक दल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को 55 हज़ार के अंतर से हरा दिया है. कैराना से मृगांका के दिवंगत पिता हुकूम सिंह ही सांसद थे. हुकूम सिंह को 5 लाख 65 हज़ार 909 वोट मिले थे, इस बार उनकी बेटी मृगांका सिंह को 4 लाख 36 हज़ार 564 वोट मिले हैं. 2014 से 2018 के बीच 1 लाख 29 हज़ार 345 वोट कम हो गया. वैसे शामली और कैराना विधानसभा में बीजेपी ने विपक्ष के उम्मीदवार से काफी बढ़त बनाई मगर तीन विधानसभा में वह विपक्ष से पीछे रह गई. 2014 में विपक्ष एकजुट नहीं था, इस बार सपा बसपा ने मिलकर रालोद को समर्थन दिया, कांग्रेस भी साथ आ गई और आम आदमी पार्टी ने भी समर्थन दे दिया. बीजेपी के वोट करीब 1 लाख 30 हज़ार घट गए. गोरखपुर और फूलपुर की तरह कैराना भी महत्वपूर्ण था. तभी मुख्यमंत्री योगी ने वहां कई सभाएं कीं. योगी सरकार के दर्जनों मंत्रियों ने सभा की थी. मतदान के एक दिन पहले प्रधानमंत्री के एक्सप्रेस वे के उदघाटन, रोड शो और बागपत में सभा को भी इस तरह से देखा गया कि प्रधानमंत्री कैराना के लिए यह सब कर रहे हैं. आलोचना हुई कि चुनाव प्रचार समाप्त हो गया है, मतदान के एक दिन पहले प्रधानमंत्री का रोड शो करना, लगातार टीवी पर बने रहना मर्यादानुकूल नहीं है.


मतदान के एक दिन पहले प्रधानमंत्री गन्ना किसानों को सही दाम देने का वादा कर रहे थे, कह रहे थे कि गन्ना किसानों को समय से पैसा मिलेगा, मैं आश्वासन देता हूं कि उनका पैसा नहीं रुकेगा. प्रधानमंत्री के इस बयान पर जिसे लेकर विपक्ष ने एतराज़ भी उठाया था. सवाल चुनाव आयोग पर भी उठे थे. इसके बाद भी विपक्ष संयमित रहा. मायावती और अखिलेश यादव ने कैराना में एक भी सभा नहीं की. सिर्फ अजित सिंह और जयंत सिंह ने सभा की. बीजेपी हार गई. सिर्फ गठबंधन के ज़रिए विपक्ष ने कैराना में बीजेपी को हरा दिया. नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में सपा उम्मीदवार ने बीजेपी के उम्मीदवार को हरा दिया. नुरपुर विधानसभा की सीट भी भाजपा की थी. क्या कैराना के लिए प्रधानमंत्री ने परोक्ष रूप से मैदान में उतर कर बड़ा दांव खेला था जो नहीं चला. क्या अब उनके रोड शो के असर की बात होगी, इस बार जवाबदेही से योगी बच जाएंगे या फिर प्रधानमंत्री भी कुछ हिस्सा बांट लेंगे.

चार साल से चैनलों के ज़रिए जिस नेशनल सिलेबस को चलाया जा रहा था, उस सिलेबस का जिन्ना चैप्टर कैराना में फट गया. क्या आगे के लिए भी कैराना में हिन्दू मुस्लिम टॉपिक की हार हुई है, जहां जून 2016 में मीडिया के ज़रिए समाज को बांटने का ख़तरनाक खेल खेला गया था. जिसे लेकर 2016 में न्यूज़ चैनलों पर कितनी बहस हुई थी. पलयान का किस्सा गढ़ा गया और नौकरी पढ़ाई बेरोज़गारी के सवालों को छोड़ चैनलों पर दिन रात हिन्दू मुस्लिम टॉपिक पर बहस चलती रही. मीडिया के ज़रिए एक इलाके के सामाजिक रिश्तों को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया. झूठी ख़बरों और मनगढ़ंत बयानों को इस बहस में मान्यता दिलाई गई और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एक माहौल बनाया गया. यूपी चुनाव के एक साल बाद 2018 में कैराना में नेशनल सिलेबस की किताब धूल खा रही है. इसका मतलब यह नहीं हिन्दू मुस्लिम टॉपिक ख़त्म हो गया है, वो अभी भी है और उसके रूप आने बाकी है.

न्यूज़ चैनलों के स्क्रीन ठीक उसी तरह से जून 2016 में सजा दिए गए थे जिस तरह से कर्नाटक चुनावों के पहले जिन्ना प्रकरण से चैनल सजे हुए थे. अचानक एक लिस्ट आई कि कैराना से हिन्दू परिवारों को पलायन हो रहा है. तभी हमारे सहयोगी हिमांशु शेखर मिश्र वहां रिपोर्ट करने पहुंचे थे और दिखाया था कि यह सूची फर्जी है. दिवंगत सांसद हूकूम सिंह जिस सूची के जरिए सांप्रदायिक कारणों से पलायन का दावा कर रहे हैं वो फर्जी है. मगर चैनलों को इससे फर्क नहीं पड़ा. स्थानीय अखबार सांप्रदायिक और झूठी ख़बरों से भरे हुए थे. बाद में हुकूम सिंह ही पलट गए और कहा कि पलायन सांप्रदायिक नहीं, कानून व्यवस्था के कारण है. उस वक्त सहारनपुर रेंज के डीआईजी ने भी यही रिपोर्ट भेजी थी. बहुत जल्दी कुछ लोग मीडिया के इस झूठ को पकड़ने लगे. न्यूज़ लौंड्री और मीडिया विजिल ने बकायदा तफ्तीश की थी. नागरिक पत्रकारों के समूह ने भी कैराना बन गया कश्मीर के बहाने खेले जा रहे खूनी खेल की मंशा पकड़ ली. इसी इरादे को कोबरापोस्ट के स्टिंग में एक्सपोज़ किया गया है जबकि कैराना में बिना स्टिंग के ही कई न्यूज़ चैनलों और अखबारों के इरादे सामने आ चुके थे. मानवाधिकार आयोग तक सक्रिय हो गया जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सांप्रदायिक कारणों से नहीं खराब कानून व्यवस्था के कारण पलायन हुआ था मगर तब तक जिहादी आ गए, आतंकवादी आ गए टाइप के बयानों से एक समुदाय के प्रति नफरत फैला दी गई.

आप दर्शक एक बार यू ट्यूब में जाकर जून 2016 में कैराना पर हुई बहसों को फिर से देखिए. आपके होश उड़ जाएंगे कि कैसे न्यूज चैनल और अखबार मिलकर भारत के लोकतंत्र को बर्बाद कर देना चाहते थे. कैराना के सामाजिक रिश्तों में हमेशा के लिए हिन्दू बनाम मुस्लिम का ज़हर घोल देना चाहते थे. नौजवानों को दंगाई बनाने का जो प्रोजेक्ट चला है वो शायद अब आप समझ पाएं इसलिए ज़रूर जून 2016 के महीने में कैराना पर हुई डिबेट निकाल कर देखिएगा. उसकी जगह शिक्षा मित्रों पर बहस हुई होती, 12460 टेट शिक्षकों पर बहस हुई थी तो आज हज़ारों नौजवानों को नौकरी मिल गई होती. कोई दावा नहीं कर सकता कि यह ध्रुवीकरण हमेशा के लिए मिट गया है या जल्दी किसी और रूप में लौटेगा मगर आज के नतीजे से उम्मीद दिखती है कि लोग फिर से गले मिल सकते हैं. देखना चाहिए कि क्या सिर्फ विपक्ष की जीत हुई है या वहां की जनता ने उन रिश्तों को जीता है जिसे वह नफरत के आगे हार चुकी थी.

मुख्यमंत्री योगी ने कैराना उपचुनाव में प्रचार के दौरान जिन्ना प्रकरण का भी ज़िक्र किया. चैनलों पर आपने देखा होगा जिन्ना हारा गन्ना से टाइप की लाइनें चमक रही थी मगर जब यह विवाद आया था तो दो खेमे बना दिए गए थे. जिन्नावादी और राष्ट्रवादी. कैराना के लोगों ने एक खेमा बना दिया हम सब है गन्नावादी. 25 मई के इंडियन एक्स्प्रेस में कैराना से लालमणि वर्मा की रिपोर्ट है जिसमें मुख्यमंत्री योगी के भाषण के एक हिस्से का ज़िक्र है. शामली की सभा में योगी ने कहा था कि 'ध्रुवीकरण हो चुका है मैं जानता हूं, एक तरफ वो लोग हैं जिन्होंने मुज़फ्फरनगर और पश्चिम यूपी के दंगों को हवा दी, सचिन और गौरव जैसे युवाओं की क्रूरता से हत्या हुई और उन जैसे कइयों को फंसाया गया, तब किसी पार्टी ने कुछ नहीं कहा, केवल बीजेपी कार्यकर्ताओं ने आवाज़ उठाई. सुरेश राणा और संजीव बालियान जैसे कार्यकर्ताओं पर मुकदमे हुए, हुकूम सिंह को न्याय दिलाने से रोका गया. दूसरी पार्टी को मौका मिलता है तो वे तुष्टीकरण की नीति अपनाएंगे और दंगों को हवा देंगे. उनका बस चले तो कांवड़ यात्रा को भी रुकवा देंगे.'

मुख्यमंत्री योगी जिस सुरेश राणा की तारीफ कर रहे थे उनके ही विधानसभा में बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह 14,000 वोटों से पीछे रह गईं. राणा ही तो गन्ना मंत्री हैं. मोदी सरकार में मंत्री पद से हटाए गए संजीव बलियान के तेवर भी मृगांका के काम नहीं आ सके. काम तो मुख्यमंत्री योगी भी नहीं आ सके जिन्होंने कहा था कि वोट के लिए बाप बेटा गली-गली भीख मांग रहे हैं. बाप बेटा मतलब मुलायम सिंह और अखिलेश यादव. गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव के समय योगी ने कहा था कि सांप छुछूंदर का मेल हो गया है. मुख्यमंत्री योगी को कम से कम ऐसी भाषा बोलने से बचना चाहिए. क्योंकि इस भाषा के बाद भी वे मोदी और शाह की जीती हुई लोकसभा सीटों में से तीन हार चुके हैं. मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि गन्ना हमारा मुद्दा है पर हम जिन्ना की फोटो नहीं लगाने देंगे. लोगों ने जिन्ना की जगह गन्ना का फोटो लगा दिया. 14 दिनों के अंदर गन्ना किसानों के बकाये के भुगतान का वादा था. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार योगी सरकार में 800 करोड़ के करीब पैसा बंटा भी मगर बाद में इसकी गति रुक गई और गन्ना किसानों का बकाया 12000 करोड़ तक पहुंच गया. वैसे ये राशि और भी अधिक हो सकती है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कैराना लोकसभा क्षेत्र में 800 करोड़ का बकाया था. हिन्दू मुसलमान में बंटे कैराना के लोग इस उपचुनाव में वापस किसान बन गए हैं. गन्ने के खेत से जिन्ना का भूत भाग गया.

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इसलिए कैराना के नतीजों को कैराना के लिए देखिए कि क्या नफरत कम हुई है, क्या लंबे समय के लिए कम हुई है या नए ज़हरीले तेवरों के साथ इसकी वापसी होगी. क्या इस हार के बाद यूपी सरकार किसानों का बकाया जल्दी बंटवा देगी या फिर उनकी नाराज़गी का ख़तरा मोल लेती रहेगी. गोरखपुर लोकसभा सीट हारने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि शायद विपक्ष को समझने में ग़लती हो गई है. क्या योगी कैराना में भी विपक्ष को नहीं समझ पाए.

बिहार में अररिया ज़िले के जोकिहाट विधानसभा सीट पर राजद की जीत ने तेजस्वी का ग्राफ ऊपर कर दिया है. सरकार से अलग होने के बाद तेजस्वी के नेतृत्व में राजद ने तीन उपचुनाव जीते हैं. राजद उम्मीदवार ने जदयू के उम्मीदवार को 41,224 वोटों से हराया. जोकीहाट की सीट जदयू के पास थी. इस सीट पर तसलीमुद्दीन के बेटे सरफराज़ आलम विधायक थे जो जद यू छोड़ अररिया लोकसभा उपचुनाव में राजद के उम्मीदवार बन गए और बीजेपी के प्रदीप सिंह को हरा दिया. जोकिहाट सीट को जदयू ने नाक का सवाल बना लिया था मगर जदयू के उम्मीदवार को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की काफी आलोचना हुई है. इन सब जीत से उत्साहित तेजस्वी लगातार खुद को नीतीश के मुकाबले रखने लगे हैं. जैसे ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार को स्पेशल स्टेटस का दर्जा दिए जाने की बात की तेजस्वी ने फट से ट्वीट कर दिया कि सरकार आपकी, सहयोगी आपके तो विशेष राज्य का दर्जा किससे मांग रहे हैं. चंद्रबाबू नायडू की तरह साहस दिखाइये.



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