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CBI का गैरकानूनी सिस्टम, सुप्रीम कोर्ट से कैसे सुधरेगा

अफसरों के परस्पर विवाद के भयानक दौर में, क्या CBI के कानूनी सिस्टम को ठीक करने की पहल होगी...?

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CBI का गैरकानूनी सिस्टम, सुप्रीम कोर्ट से कैसे सुधरेगा

CBI चीफ मामले की सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट ने अगले हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया है. राफेल मामले की विशेष जांच की याचिका पर भी सुनवाई खत्म होने के बाद, फैसला आना बाकी है. आरोपों की जांच करने वाली CBI के संदेह के दायरे में आने के बाद, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने भी आंखे तरेरना शुरू कर दिया है. अफसरों के परस्पर विवाद के भयानक दौर में, क्या CBI के कानूनी सिस्टम को ठीक करने की पहल होगी...?

हाईकोर्ट ने CBI के सिस्टम को गैरकानूनी बताया : संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार पुलिस राज्यों का विषय है. यूनियन लिस्ट की एन्ट्री नंबर 8 के तहत केंद्र सरकार को CBI जैसी संस्था के गठन का अधिकार है. इसके बावजूद, सरकार ने संसद से इस बारे में कोई कानून नहीं बनाया और शॉर्टकट रास्ते से दिल्ली पुलिस के 1946 के विशेष कानून के तहत 1963 में CBI की स्थापना कर दी गई. भ्रष्टाचार और संगठित अपराध के खिलाफ काम कर रही देश की प्रीमियर एजेंसी के कानूनी ढांचे को गौहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रशासनिक आदेश से गठित CBI के कानून को मंत्रिमंडल या संसद का अनुमोदन नहीं मिला. हाईकोर्ट द्वारा CBI की वैधता पर सवालिया निशान खड़ा करने के खिलाफ केंद्र सरकार की अर्ज़ी पर सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2013 में स्थगनादेश दे दिया, पर समस्या जस की तस रही.

CBI को पुख्ता कानूनी आधार देने में सभी सरकारें फेल : CBI के कमज़ोर कानूनी ढांचे को ठीक करने के लिए संसद की समितियों ने अनेक रिपोर्ट दी हैं. केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के तहत CBI काम करती है. विभाग की संसदीय समिति ने 14वीं, 19वीं और 24वीं रिपोर्ट में CBI के लिए संसद के माध्यम से समुचित विधान बनाने का सुझाव दिया. समिति की सिफारिशों पर कार्यवाही के बारे में विभाग की 37वीं रिपोर्ट में, कानून नहीं बनाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई. इन सारे गंभीर सवालों के बावजूद पूर्ववर्ती UPA और वर्तमान BJP सरकार ने CBI की व्यवस्था को पुख्ता आधार देने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए.


हवाला मामले के बाद CBI पर CVC का सुपरविज़न : जैन हवाला डायरी के खुलासों ने भारतीय राजनीति में तूफान ला दिया था. इस मामले में, विनीत नारायण की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने CBI की कार्यप्रणाली को दुरुस्त करने के लिए 1997 में अनेक सुझाव दिए. इसके पश्चात सन् 2003 में CBI को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के दायरे में लाया गया. CBI के कानूनी सिस्टम का ठोस सुधार तो नहीं हुआ, लेकिन कानूनी प्रावधान से डायरेक्टर के लिए दो साल का कार्यकाल सुनिश्चित कर दिया गया. क्या CVC द्वारा CBI के डायरेक्टर के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, इस पर अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है.

सरकार द्वारा CBI का दुरुपयोग और 'पिंजरे में कैद तोता' : तत्कालीन UPA सरकार द्वारा CBI के दुरुपयोग और अनेक जांचों को प्रभावित करने के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा तीखी बयानबाजी की गई. कोयला घोटाले मामले में जस्टिस लोढा ने CBI को 'पिंजरे में बंद तोता' करार दिया, यद्यपि यह बात सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश में नहीं दिखी. CBI के तत्कालीन डायरेक्टर रंजीत सिन्हा पर जांच में दखलअंदाज़ी करने और भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बावजूद CBI के सिस्टम में सुधार नहीं हुआ, जैसा वर्तमान विवादों से ज़ाहिर है.

CBI में भ्रष्टाचार और अफसरों की जंग : भ्रष्टाचार के खिलाफ छापे मारने वाली CBI द्वारा अपने ही अधिकारी की गिरफ्तारी और नंबर 2 अधिकारी के खिलाफ FIR के बाद CBI में भ्रष्टाचार की नई परतें खुलने लगीं. बड़े अफसरों द्वारा मामलों को दबाने के लिए भ्रष्टाचार और दुरभिसंधि के खुलासों से CBI की बकाया छवि भी दागदार हो गई. सरकार के मंत्रियों और अफसरों का CBI में हस्तक्षेप, गैरकानूनी टेलीफोन टैपिंग और गुटबाजी से CBI की साख तार-तार हो गई.

सिस्टम सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट से हो सकती है पहल : देश में संघीय संवैधानिक व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार के अधिकारियों और योजनाओं की सभी राज्यों में उपस्थिति है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू सरकार ने अपने राज्यों में CBI के क्षेत्राधिकार को खत्म करने के लिए आदेश पारित कर दिए हैं. CBI में चल रहे विवादों से देश में लोकपाल की प्रासंगिकता और बढ़ गई है, पर सरकार इस बारे में मौन है. पिछले कई सालों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद CBI में अनेक सुधार लागू हुए. आमूलचूल परिवर्तन के लिए एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश दिया जाए, तभी भ्रष्टाचार के खिलाफ CBI की जंग सफल हो सकेगी.

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- विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.



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