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प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या चुनावी चंदे में बचेगी पारदर्शिता?

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दिसंबर 2013 में लोकपाल कानून बन गया लेकिन 2017 आ गया, लोकपाल कौन है, इसका ज़िक्र न बैंकिंग सर्विस क्रोनिकल में मिलेगा न ही प्रतियोगिता दर्पण में क्योंकि लोकपाल बना ही नहीं है. आखिर जिस कानून को बनाने के लिए इतना घनघोर आंदोलन चला, उस कानून के बन जाने के बाद लोकपाल क्यों नहीं बना, लोकपाल का ढांचा क्यों नहीं बना. इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हुई है, फैसला सुरक्षित है. लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है और लोकपाल कानून के हिसाब से बगैर विपक्ष के नेता के लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो सकती है. तो ज़ाहिर है इसे लेकर कानून में संशोधन करना होगा. बाकी तमाम कानूनों के संशोधन झटके में पास हो जाते हैं, लोकपाल कानून के 20 संशोधनों में ऐसी क्या मुश्किल आ रही है तो इतना लंबा वक्त लग रहा है. सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा है कि लोकपाल की नियुक्ति वर्तमान हालात में संभव नहीं है. कई सारे संशोधन हैं जो संसद में लंबित हैं. मानसून सत्र में इन संशोधनों के पास होने की उम्मीद है.

कुल मिलाकर बग़ैर लोकपाल के ही भ्रष्टाचार की मुक्ति का सर्टिफिकेट बंट रहा है. दो साल तक लोकपाल को भ्रष्टाचार के कफ सिरप के रूप में पेश किया गया मगर चार साल से इसकी कोई सुध ही नहीं ले रहा है. इससे कहीं तेज़ी से लोकसभा में वित्त विधेयक पास हो गया और विपक्ष देखता रह गया. इस संशोधन में राजनीतिक दलों ने अपने लिए कारपोरेट चंदे का बढ़िया इंतज़ाम कर लिया है. आप यह मत समझिये कि सरकार ने राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए आधार नंबर अनिवार्य कर दिया है. वहां तो चंदा देने वालों की पहचान गुप्त रखने का इतना अच्छा प्रयास किया गया है कि पूछिये मत. लोकसभा में संशोधन पास होने से पहले कोई भी कंपनी अपने कुल मुनाफे का साढ़े सात फीसदी हिस्सा राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में दे सकती है. कंपनी को अपने बहिखाते में बताना होता था कि कितना पैसा राजनीतिक दल को दिया. किस राजनीतिक दल को दिया गया है, यह भी बताना पड़ता था.

शायद आप इसी को पारदर्शिता कहेंगे कि लेन-देन किस किस के बीच हो रहा है यह पता चले. मगर अब पारदर्शिता का नया मतलब लांच हुआ है. नए संशोधन के अनुसार अब कंपनियों को नहीं बताना पड़ेगा कि किस राजनीतिक दल को चंदा दिया है. अब आप ही हिन्दी की क्लास में मास्टर साहब से पूछ लें कि पारदर्शिता क्या हुई. बताना पारदर्शिता है या छिपाना पारदर्शिता है. यही नहीं, आप बैंकों से इलेक्टोरल बांड खरीदेंगे, वो बांड किसी दल को चला जाएगा. यह साफ नहीं कि बांड खरीदने वालों का नाम गुप्त रहेगा या सार्वजनिक किया जा सकेगा. नए संशोधन के अनुसार कारपोरेट अब कुल मुनाफे का साढ़े सात फीसदी से भी अधिक चंदा दे सकते हैं. यानी साढ़े सात फीसदी तक ही चंदा देने की सीमा समाप्त कर दी गई है. पहले बताना पड़ता था कि किसे चंदा दिया, अब नहीं बताना होगा.

चेक या इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जब चंदा देना ही होगा तब किसे दिया जा रहा है इसे छिपाने का क्या मतलब है. खासकर तब जब हर किस्म की लेन देन का पता लगाने के लिए सरकार आधार नंबर को अनिवार्य या ज़रूरी करती चली जा रही है. अब एक सवाल आपसे है. राजनीतिक दल चंदा देने वालों को क्यों यह सुविधा देना चाहते हैं कि आप किसे चंदा रहे हैं यह पता नहीं चलेगा. पहले 20,000 से कम की राशि देने वालों का नाम पता बताने की ज़रूरत नहीं थी. अब इसे घटाकर 2000 कर दिया गया है. सवाल तब भी उठे लेकिन लोगों को लगा कि कुछ हो रहा है तो आगे अच्छी उम्मीद की जानी चाहिए. लेकिन नया संशोधन क्या राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाता है. यहां पर पैन नंबर, आधार नंबर क्यों नहीं अनिवार्य है? क्यों राजनीतिक दल चंदा देने वालों के पैन नंबर तक नहीं देते हैं और उनका कुछ नहीं होता है. क्या आपने सोचा है कि अगर कोई कंपनी अपने मुनाफे का कुछ भी हिस्सा चंदे के रूप में एक राजनीतिक दल को देने लगे तो उसके क्या खतरे होंगे? क्या आप बिल्कुल ही नहीं जानना चाहेंगे कि किस कंपनी ने चंदा दिया है?


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