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'क्लास में नहीं गुरु, भारत बनेगा विश्वगुरु?' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम

क्लास में नहीं गुरु और भारत बनेगा विश्व गुरु. क्या बगैर गुरु के भारत विश्व गुरु बन सकता है? यह कमाल यहां के नेता ही करा सकते हैं और उनके झांसे में भारत के युवा ही आ सकते हैं.

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'क्लास में नहीं गुरु, भारत बनेगा विश्वगुरु?' रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
क्लास में नहीं गुरु और भारत बनेगा विश्व गुरु. क्या बगैर गुरु के भारत विश्व गुरु बन सकता है? यह कमाल यहां के नेता ही करा सकते हैं और उनके झांसे में भारत के युवा ही आ सकते हैं. भारत के युवाओं की जागरूकता का स्तर भी कमाल का है, वे जानते हैं कि कॉलेज में प्रोफेसर नहीं हैं, कोई गुरु नहीं है, फिर भी वे एडमिशन फीस देते हैं, जो कॉलेज उनका डेवलपमेंट समाप्त करने वाला है, उसके डेवलपमेंट के लिए भी अलग से फीस देते हैं. यही नहीं उनकी जागरूकता पांच साल के ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद इतनी विकसित हो जाती है, वे यूजीसी से एक हज़ार रुपये का फार्म ख़रीद कर नेट की परीक्षा देते हैं. नेट की परीक्षा पास कर वे दो से तीन दशक तक प्रोफेसर बनने के लिए इंतज़ार करते हैं. युवाओं को बेरोज़गार रखते हुए उनसे कुछ न कुछ वसूलने का जो अर्थशास्त्र है, उसके लिए भारत के विश्वविद्यालयों को संयुक्त रूप से नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए.

 हमने प्राइम टाइम में जो सीरीज़ शुरू की है, उसमें बहुत ही कम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का हाल हम ले पाएं हैं, मगर उसमें से ही पता चलता है कि कॉलेजों में प्रोफेसर, लेक्चरर के कई हज़ार खाली पड़े हैं. ये वेकैंसी कई साल से हैं. कहीं-कहीं से बीस-बीस साल से हैं. फिर भी कोई मांग नहीं करता है कि नौकरी है तो देकर हमें रोज़गार दो. परमानेंट होना भारत के युवाओं का सपना है, इस सपने के नाम पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी उन्हें गेस्ट लेक्चरर रखती है, एडहॉक रखती है, दिहाड़ी देती है और कई साल उनको झांसा देने के बाद बाहर कर देती है. भारत के युवाओं को कभी लगा ही नहीं कि इस मसले पर व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी में कुछ सवाल जवाब किए जाएं.

जेपी के आंदोलन की निशानी भले न बची हो मगर उनका नाम लेकर सांसद मंत्री बनने वाले बहुत लोग बचे हैं. लोकनायक जयप्रकाश नारायण का इतिहास आज़ादी के आंदोलन के समय भी शानदार रहा है और आज़ादी के बाद भी. आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण ने जिस संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था, अब उसकी कोई निशानी नहीं बची है. जेपी के सेनानी 5000 से 10000 तक पेंशन लेने लगे हैं. जेपी का नाम लेकर कई नेताओं की सरकार आईं, सरकार में आकर उन्होंने भी वही किया जिसके ख़िलाफ़ जेपी लड़े. भ्रष्टाचार उनकी राजनीति का अहम हिस्सा है, किसी के यहां परिवारवाद के नाम पर भ्रष्टाचार है, तो किसी के यहां व्यक्तिवाद के नाम पर. सब अपने-अपने अवसरों के हिसाब से भ्रष्टाचार के मुद्दों को पहचानते हैं, बोलने और चुप रहने की रणनीति तय करते हैं. जेपी का आंदोलन आवाज़ उठाने के साहस का एक सफल आंदोलन था, मगर आगे चलकर अपने तमाम लक्ष्यों को हासिल करने में फेल रहा. इस फेल आंदोलन का नाम लेकर कई नेता सफल हैं. वे खुद को क्रांतिकारी की तरह पेश करते हैं, जबकि उनकी राजनीति सिर्फ और सिर्फ काला धन के आधार पर ही चमकती है.

यह भी कम बड़ी बात नहीं कि जयप्रकाश नारायण का नाम लेने वालेआज कई नेता मुख्यमंत्री हैं, केंद्रीय मंत्री हैं, राज्यपाल हैं. एक असफल क्रांति के इतने सारे सफल नायक. जेपी के नाम पर एक यूनिवर्सिटी है बिहार में. संपूर्ण क्रांति एक पिटा हुआ नारा है, इसकी मिसाल है छपरा की जेपी यूनिवर्सिटी. जब जेपी के नाम पर एक ढंग की यूनिवर्सिटी नहीं बना सके तो आप समझ सकते हैं कि हमारे नेता जेपी के नाम का इस्तमाल ही करते हैं. 1990 में सीवान, गोपालगंज, छपरा ज़िलों के लिए जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. 27 साल बाद भी यह विश्वविद्यालय बिहार की शिक्षा के नक्शे पर कहीं नज़र नहीं आता है.

हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से जारी राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क ( NIRF) की रैंकिंग में तो इसका नाम भी नहीं है. जेपी यूनिवर्सिटी में न तो जेपी का कुछ है, न यूनिवर्सिटी का कुछ है. 1990 में माला मिर्ज़ा टुकड़ा गांव की 240 एकड़ ज़मीन पर इस यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई थी. इससे तो अच्छा कि यहां पर खेती ही होती रहती. 27 साल बाद भी इस यूनिवर्सिटी का बुनियादी ढांचा पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है. इसके अंतर्गत 32 कालेज आते हैं जिसमें अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट के 47000 छात्र पढ़ते हैं. 47000 छात्रों को यह पता चल जाए कि वे बगैर गुरु के लिए विश्व गुरु बनाने के झांसा प्रोजेक्ट के शिकार हो रहे हैं तो उन्हीं में एक जेपी पैदा हो जाए. इस यूनिवर्सिटी में 750 प्रोफेसर, लेक्चरर होने चाहिए थे मगर हैं सिर्फ 300,  जिसमें से 100 हाल-फिलहाल में नियुक्त हुए हैं. 450 पद ख़ाली हैं. 50 फीसदी से ज़्यादा पद ख़ाली हैं. इसके पास 17 पोस्ट ग्रेजुएट विभाग हैं, आमतौर पर इसके लिए अलग से बहाली होती है मगर कॉलेज के शिक्षकों से ही पीजी की क्लास लेने के लिए कहा जाता है.

यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर हरिकेश सिंह स्वीकार करते हैं कि यूनिवर्सिटी अपनी स्थापना के रजत जयंती वर्ष में है और अभी तक एक भी इमारत पूरी बनकर तैयार नहीं हुई है.

इसी यूनिवर्सिटी का एक कॉलेज है राजेंद्र कॉलेज छपरा में है. यह बिहार का ऐतिहासिक कॉलेज है जिसे 1 अगस्त, 1938 के दिन स्थापित किया गया था. छपरा के बनवारी लाल जी ने अगर अपना एक भवन, 20 बीघा, 12 कट्ठा और 11 धूर ज़मीन न दी होती तो यह कॉलेज यहां मौजूद न होता. आज भी यह कॉलेज 1939 के पहले बने इस भवन में चल रहा है. बनवारी लाल शाह जी का भी अपना अलग ही इतिहास है. गूगल सर्च से एक किताब का पता चला, Communication and Colonialism in Eastern India: Bihar, 1760s-1880s, इसके लेखक नितिन सिन्हा ने लिखा है कि ब्रिटिश सरकार ने सारण के कलेक्टर को कहा गया कि दरबार का आयोजन करें और उन्हें शाह की उपाधि का सनद प्रदान करें. बनवारी लाल जी की ख्याति ही इस बात की थी कि वे धर्मशाला, सराय के लिए काफी धन-दौलत और ज़मीन दान में देते थे. वे उस समय सारण के बड़े व्यापारी थे और नदी के रास्ते होने वाले व्यापार को भी कंट्रोल करते थे. बनवारी लाल शाह छपरा के कटरा मोहल्ला में रहते थे. वे आजकल वाले शाह की तरह नहीं थे जो सौ करोड़ की मानहानि का मुकदमा कर देते हैं. शाह बनवारी लाल जी ने कितना कुछ दान कर दिया, बगैर सोचे कि 21वीं सदी का हिंदुस्तान याद भी करेगा या नहीं.

विश्वविद्यालय या कॉलेज का इतिहास अकेले क्लास रूम का नहीं होता है. वो शहर और उसके समाज का भी इतिहास होता है. इसलिए हम राजेंद्र कॉलेज छपरा की बात करते-करते बनवारी लाल शाह जी के बारे में बात करने लगे. 1866 में छपरा नगरपालिका का गठन हो चुका था. 1939 में तत्कालीन नगरपालिका के उपाध्यक्ष हरिहरशरण जी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर कॉलेज खोला, तब राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति नहीं बने थे, भारत की आज़ादी आठ साल दूर थी, लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर उनके जीतेजी कॉलेज कैसे बना. यह भी एक इतिहास है. उस वक्त बिहार में बाढ़ आई थी और राजेंद्र बाबू अपने राहत के काम से काफी लोकप्रिय हो गए. उस काम के सम्मान में छपरा में राजेंद्र प्रसाद कॉलेज खुला. उनके बड़े भाई महेंद्र प्रसाद का भी छपरा के शहरीकरण में योगदान था. एक कहावत है कि महेंद्र नहीं होते तो राजेंद नहीं होते. यह सब जानकारी पॉलिटिकल साइंस विभाग के प्रमुख प्रोफेसर लाल बाबू यादव ने हमें दी. आज उस कॉलेज में पढ़ाने के लिए 157 प्रोफेसर-लेक्चरर चाहिए, मगर 33 प्रोफेसरों के दम पर ही कॉलेज चल रहा है. केमिस्ट्री, संस्कृत, उर्दू में तो कोई पढ़ाने वाला ही नहीं है. भूगोल, हिन्दी, कॉमर्स में सिर्फ एक-एक शिक्षक हैं. इस कॉलेज में 5000 छात्र पढ़ते हैं. दो साल से सरकार ने इस कॉलेज को पैसा नहीं दिया है. फीस नहीं लेने के एवज़ में सरकार ने अपना हिस्सा नहीं दिया है.

राजेंद कॉलेज छपरा से राहुल सांकृत्यायन का नाम भी जुड़ा है. हिन्दी के महान साहित्यकार शिव पूजन सहाय जी यहीं पढ़ाते थे. पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय यहीं के छात्र थे. महाराजगंज से भाजपा सांसद जनार्दन सिग्रिवाल यहीं के छात्र थे. भिखारी ठाकुर को सामने लाने वाले मनोरंजन सिन्हा इसी कॉलेज के प्राचार्य थे. मगर अब इस कॉलेज में पढ़ाने वाला नहीं है. पढ़ाई का न नाम है न नामोनिशान है. 150 कंप्यूटर हैं लेकिन उन्हें चलाने के लिए कंप्यूटर ऑपरेटर मात्र एक है.

1941 का है डीएवी कॉलेज सीवान. स्वर्गीय बैद्यनाथ प्रसाद जी ने इस कॉलेज को बनवाया था. आज यहां 12,000 छात्रों को पढ़ाने के लिए मात्र 27 प्रोफेसर-लेक्चरर हैं. एक शिक्षक पर 444 छात्रों का भार आता है.  बॉटनी, भूगोल, संस्कृत में कोई प्रोफेसर नहीं हैं. 57 पद ही मंज़ूर हैं जिसमें से 30 पद ख़ाली हैं. बताया गया कि 18 प्रोफेसर जो रिटायर हुए हैं, उन्हें ही कभी-कभार बुला लिया जाता है, जिसका पैसा भी नहीं दिया जाता, मगर वे आते हैं और पढ़ा जाते हैं. बिहार के शिक्षा मंत्री काम क्या करते हैं, राम जाने.

यहां महाविद्यालय में विज्ञान में थोड़े बहुत उपकरण हैं, अन्यथा बिना लैब के क्लास चला रहे हैं. यह सिर्फ हानिकारक नहीं अपराध भी है. हमने जितने भी वाइस चांसलर से बात की है, कोई तो मिला जो ईमानदारी से अपनी व्यथा कह रहा है. बता रहा है कि बिना प्रयोगशाला के डिग्रियां दी जा रही हैं. ये हानिकारक ही नहीं अपराध भी है. कोई अपने नेताओं से पूछेगा कि हमारे बच्चों को जब पढ़ाने वाले नहीं थे, वो क्या पढ़कर निकले. क्या यही कारण है कि आज यूनिवर्सिटी से ज़्यादा व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी लोकप्रिय है, प्रोफेसर से ज़्यादा छात्र या युवा नेताओं के प्रोपेगैंडा को इतिहास और विज्ञान मान कर स्वीकार कर रहे हैं. जेपी का जन्म 11 अक्तूबर के दिन हुआ था, मगर मौत 8 अक्तूबर को हुई थी, इसलिए 8 से 11 अक्टूबर के बीच जेपी को लेकर इस यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम किए जा रहे हैं.

इसके लिए अलग से बजट नहीं आया है. मगर हर तरह की प्रतियोगिता हो रही है. जेपी को याद करने के लिए इन छात्रों ने कितनी मेहनत की होगी, मगर जिन्हें जेपी के नाम पर राज मिला है, उन्होंने इस यूनिवर्सिटी के लिए कितनी मेहनत की है. वाद-विवाद, निबंध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है. यही नहीं जेपी की याद में कॉलेज में रोज़गार मेला भी लगा हुआ था. बिना प्रोफेसर के इन्हें बेरोज़गार होने लायक बनाओ और फिर उनके बीच रोज़गार मेला भी लगाओ. जिसकी एक तस्वीर से पता चलता है कि इसमें सुरक्षाकर्मियों यानी सिक्योरिटी गार्ड की बहाली के लिए विशेष भर्ती अभियान चल रहा है. मतलब धूल झोंकने का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है.

2013-16 का बैच 2017 तक खत्म नहीं हो पाया है. यानी सेशन लेट है. 2015 में सेकेंड ईयर की परीक्षा होनी थी, 2017 के जून में हुई है. 2014-17 बैच के प्रथम वर्ष की परीक्षा 2015 में हो जानी चाहिए थी, 2017 जून में हुई है और अभी तक रिज़ल्ट नहीं आया है. 2015-18 और 2-16-19 बैच का इम्तहान कब होगा, किसी को पता नहीं. यूनिवर्सिटी में ये सेशन लेट क्यों होते हैं. इसलिए होते हैं ताकि बेरोज़गारों को कुछ साल वहीं कैंपस में रोक कर रखो. सेशन लेट कैसे होता है इसका पेटेंट बिहार के शिक्षा मंत्री को करा लेना चाहिए.

छपरा के रामजयपाल कॉलेज के इतिहास विभाग में पांच साल से एक भी टीचर नहीं है. सोचिए, पांच साल तक बग़ैर टीचर के इन छात्रों ने क्या इतिहास पढ़ा होगा. आजकल नेता सुबह-सुबह जयंती-पुण्यतिथि पर याद करने वाले कार्ड ट्वीट कर देते हैं. आप भी सोचते होंगे कि ये अपने पुराने नेताओं का कितना सम्मान करते हैं. हाल आप अपनी आंखों से देख ही रहे हैं. नेता वोट के लिए याद करते हैं. 1972 में गोपालगंज में महिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. जेपी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर की तरह यहां की प्रिंसिपल ने भी कहा कि मेरा नाम लेकर बोलिए. हम किरण जी की इस हिम्मत का एहतराम करते हैं. बहुत से प्रिंसिपल तो फोन जाते ही कांपने लगे, अपना अच्छा ख़ासा नाम छिपाने लगे. खस्ता हाल कॉलेज का हाल भी ऐसे बताने लगे जैसे भारत का नंबर एक कॉलेज उन्हीं का हो. मगर किरण जी ऐसी नहीं हैं. उन्होंने बताया कि इस कॉलेज में 26 प्रोफेसर, लेक्चरर होने चाहिए मगर पूरे नहीं हैं.

संस्कृत. इतिहास, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान में कोई प्रोफेसर नहीं है. हिंदी में एक प्रोफेसर हैं जो रिटायर होने वाली हैं. नॉन टीचिंग की बहुत सारी सीटें खाली हैं. अरसे से बहाली नहीं हुई. कॉलेज की साफ-सफाई करने के लिए भी लोग नहीं हैं. 960 के करीब छात्रा हैं. भवन की हालत खराब है, पुस्तकालय है लेकिन लाइब्ररेरियन नहीं है. प्रिसिंपल डॉ किरण कुमारी लगातार विश्वविद्यालय को लिख रही हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं है.

जब नेता का काम मूर्ति बनवाकर, जयंती मनवा कर चल ही जाता है तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने के लिए प्रोफेसर-टीचर क्यों रखें. इसी तरह मैंरवा का एक कॉलेज है एचआर कॉलेज. यहां मात्र 4 प्रोफेसर हैं, होने चाहिए 17. जयप्रकाश नारायण की स्मृति में बने विश्वविद्यालय का हाल हमने ले लिया. अब हम दीनदलाय उपाध्याय की स्मृति में बने विश्वविद्यालय का हाल लेंगे. दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी, गोरखपुर चलते हैं.

1957 से गोरखपुर यूनिवर्सिटी चल रही है. पंडित एसएम त्रिपाठी के प्रयासों से यह यूनिवर्सिटी शुरू हुई थी. मंहत दिग्विजयनाथ का भी योगदान था, उन्हीं की परंपरा के दूसरे उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. तस्वीरों को देख कर यही लगा कि गोरखपुर यूनिवर्सिटी का कैंपस काफी चमकदार और साफ-सुथरा है. गोरखपुर यूनिवर्सिटी का नाम दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी है. इस कैंपस में 16000 से ज़्यादा छात्र हैं. हर साल यहां 5000 से अधिक छात्र एडमिशन लेते हैं. यूनिवर्सिटी के इस कैंपस में टीचर कितने आते हैं, हम उस पर आ रहे हैं.

365 पद यहां मंज़ूर हैं मगर 25 पद ख़ाली हैं. इस बार यूनिवर्सिटी ने बहाली का विज्ञापन निकाला है, करीब 212 पदों की भर्तियां निकलीं हैं. उम्मीद है यूनिवर्सिटी इस समस्या से मुक्ति पा लेगी. मगर यूनिवर्सिटी से जुड़े बाकी कॉलेजों का क्या हाल है, वहां कितनी भर्तियां होनी हैं, इसकी मुकम्मल जानकारी हमारे पास नहीं हैं. हमने अपनी रिपोर्ट के लिए 2016-17 के लिए यूनिवर्सिटी के बजट पत्र का सहारा लिया है. यहां के छात्र, तरह-तरह की फीस के ज़रिए इस यूनिवर्सिटी को करीब 74 करोड़ रुपये देते हैं, मगर बदले में मिलता है ख़ाली क्लास रूम. बजट पत्र देख कर पता चल रहा है कि कई जगहों पर भयंकर कटौती है. जैसे 2014-15 में रसायन शास्त्र विभाग का वास्तविक बजट था 11 लाख से अधिक था. मगर 2015-16 का अनुमानित बजट 8 लाख कर दिया गया है. तीन लाख की कटौती हो गई है.

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कितने साल इस यूनिवर्सिटी में बग़ैर शिक्षकों के क्लास चली होगी, उन छात्रों के साथ क्या हुआ होगा. उन्हें ही जब अपनी ज़िंदगी से मतलब नहीं तो हम कितना परेशान हो. फिर भी गोरखपुर यूनिवर्सिटी ने 1998 से लेकर 2003 तक एडहॉक पर शिक्षक रखे. इन्हें मानदेय शिक्षक कहा जाता है. जो पहले 5000 प्रति माह की सैलरी पर पढ़ाते थे जो बाद में बढ़कर 8000 प्रति माह हो गया. 2006 में यूनिवर्सिटी की कार्यपरिषद ने 2004 तक मानदेय पर रखे गए शिक्षकों को नियमित करने का प्रस्ताव पास किया मगर वो फैसला लागू नहीं हुआ. 2010 में यूनिवर्सिटी ने 87 मानदेय शिक्षकों को अचानक निकाल दिया जबकि ये कम से कम 8 साल और अधिक से अधिक 15 साल तक पढ़ा चुके हैं. अब ये सड़क पर हैं. मानदेय शिक्षक एसोसिएशन बनाकर संघर्ष कर रहे हैं. 2014 में सांसद के तौर पर योगी आदित्यनाथ ने इनके लिए पत्र भी लिखा था. अब वे मुख्यमंत्री हैं. मानदेय शिक्षक एसोसिएसन मानदेय के साथ-साथ ध्यानदेय के लिए भी संघर्ष कर रहा है ताकि कोई तो इनकी तरफ ध्यान दे.

इन अध्ययनों के दौरान पता चला कि भाषाई विषयों की हालत सबसे अधिक ख़राब है. हिन्दी और संस्कृत के नाम पर नेता लोग शहर में दंगा करा दें, उत्तर-दक्षिण भारत को भिड़ा दें मगर जगह-जगह हिन्दी और संस्कृत विभाग बग़ैर प्रोफेसरों के चल रहे हैं. उर्दू का भी हाल इन्हीं के जैसा है.


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