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  • मैंने देख ली 'बाहुबली 2' : 10 खास बातें, जो वर्ष 2017 की सबसे बड़ी फिल्म में मैंने पाईं...
    दूसरे भाग से उम्मीदें तो हद से ज़्यादा हैं ही, इस रहस्य से पर्दा उठने का भी इंतज़ार सारा देश कर रहा है कि क्यों माहिष्मती के सेनापति कटप्पा (यह भूमिका सत्यराज ने निभाई है) ने नायक बाहुबली (अभिनेता प्रभास) को मार डाला था... अब पढ़िए, राजामौली और उनकी टीम ने पांच साल लगाकर जो फिल्म बनाई है, उसमें मैंने क्या-क्या पाया...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्यों हुई देरी लोकपाल की नियुक्ति में?
    लोकपाल भले न आया हो लेकिन इसके आने को लेकर जो आंदोलन हुआ उससे निकल कर कई लोग सत्ता में आ गए. 2011 से 13 के साल में ऐसा लगता था कि लोकपाल नहीं आएगा तो कयामत आ जाएगी. 2013 में लोकपाल कानून बन गया. 1968 में पहली बार लोकसभा में पेश हुआ था. कानून बनने में 45 साल लग गए तो कानून बनने के बाद लोकपाल नियुक्त होने में कम से कम दस बीस साल तो लगने ही चाहिए थे.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या मोदी के कारण हारता है विपक्ष?
    मुद्दों को भले न जगह मिल रही हो मगर हार-जीत के हिसाब से ही नगरपालिका चुनावों को मीडिया में काफी महत्व मिलने लगा है. बीजेपी ने पंचायत, ज़िला परिषद, नगर पालिका और नगर निगम चुनावों को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है. बीजेपी पूरी ताकत झोंक देती है, राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसद मंत्री तक इन चुनावों में प्रचार करते हैं. इसके ज़रिये बीजेपी बड़ी संख्या में अपने कार्यकर्ताओं की राजनीतिक महत्वकांक्षा को बनाए रखती है.
  • नौकरशाही के नए अवतार का इंतजार
    योगी अदित्यनाथ ने अपने अभी तक के बढ़ाए गए कदमों से यह तो सिद्ध करने में सफलता हासिल कर ली है कि 'मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं है'. यह जनविश्वास के लिए बहुत जरूरी था. उन्होंने नौकरशाहों को यह संदेश स्पष्ट रूप से दे दिया है कि काम किए बिना गुजारा नहीं है, और सही तरीके से काम करना पड़ेगा. इसी के साथ जुड़ी हुई बात है- टारगेट फिक्स करना. यानी कि अब 'देखा जाएगा और देखते हैं' के स्थान पर 'होगा' की कार्यसंस्कृति को अपनाने के बहुत स्पष्ट निर्देश दे दिए गए हैं.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : नारों से बलिदान का हिसाब नहीं होता
    हम मीडिया वालों के पास इससे अधिक न तो समझ है और न ही कोई दूसरा तरीका जिससे हम छत्तीसगढ़ की घटनाओं को आप तक पहुंचा सके. अब आपकी भी ट्रेनिंग ऐसी ही हो गई है कि बलिदान, बहादुरी और बदला से आगे समझने का न तो वक्त है न ही दिलचस्पी. भारत में दो शब्दों की दो समस्याएं हैं. दो शब्दों की इन दो समस्याओं के पीछे लाखों की संख्या में सेना और अर्ध सैनिक बल लगे हैं. इनके नाम हैं कश्मीर समस्या और नक्सल समस्या.
  • क्या आपने 'एयरलिफ्ट' देखी है?
    कश्मीर की हालत को लेकर देश में भारी चिंता है. फारुख अब्दुल्ला के अनुसार जो पत्थर फेंक रहे हैं वह अपने वतन के लिए लड़ रहे हैं. पी. चिदंबरम का कहना है कि कश्मीर हाथ से फिसल रहा है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या दिल्ली के दिमाग में कश्मीर है?
    व्हाट्स अप ने कश्मीर पर जितने प्रोफेसर कश्मीर के भीतर पैदा कर दिये हैं, उससे ज्यादा कश्मीर के बाहर. व्हाट्स अप के ज़रिये कश्मीर के ज़रिये जिस तरह के तथ्यों को गढ़ा जा रहा है उससे हालात बिगड़ ही रहे हैं. वही हाल शेष भारत में भी है. व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के कारण हर दूसरा आदमी कश्मीर पर राय रखता है.
  • अज़ान और जागरण वाली बहस के बीच लाउडस्पीकर की रणभूमि बना मेरा गांव...
    शोर सबसे शुरुआती हिंसा है, जिसके असल हिंसा में तब्दील होने में वक़्त नहीं लगता है. सोशल मीडिया से लेकर ट्रैफिक हर तरफ बढ़ता शोर हिंसा के पिनकोड में ही आते हैं. हिन्दू-मुस्लिम कर इसे जस्टीफाई करने की नहीं, इस हिंसा से सबको बचाने की ज़रूरत है. धरती वालों को भी और ऊपर वालों को भी, बिना इस बहस में पड़े कि किस धर्म का डेसिबल लेवल कितना है.
  • फेसबुक की दुनिया में सड़कों पर दोस्त बनाता एक बाइकर
    इस फेसबुक की दुनिया में सड़कों पर दोस्त बनाता एक बाइकर. हाल फ़िलहाल में बहुत कम ऐसे लोग मिलते हैं जिन्हें देखते ही पहली नज़र में महसूस होता है कि वो इन्सपिरेशनल हैं, जिनकी कहानी प्रेरणा दे.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : चक्रव्यूह में फंसे किसानों का रचनात्मक प्रदर्शन
    किसान चक्रव्यूह में फंसे हैं. ऐसा नहीं है कि सरकारें कुछ नहीं करती हैं लेकिन उनका करना काफी नहीं है. किसानों ने जो रचनात्मकता दिखाई है उससे उनकी बेचैनी समझ में आती है. कुछ लोग निंदा भी कर रहे होंगे कि इतना अतिवाद क्यों. कई बार करुणा दिखानी चाहिए. समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों कोई मुंह में चूहा दबा रहा है, ज़मीन पर दाल-भात बिछाकर खा रहा है. वो क्या कहना चाहता है, क्या पाना चाहता है. ऐसी ही ज़िद और रचनात्मकता चाहिए किसानों को अपनी समस्या से निकलने के लिए. प्रदर्शन के लिए भी और खेती के तौर तरीके बदल देने के लिए भी....ऐसा ही ज़ोर लगाना होगा महंगी खेती के चक्र से निकलने के लिए...
  • पर्यावरण के अनुकूल हैं गरीबों के लिए चलने वाले परिवहन के साधन...
    पर्यावरण को सुदृढ़ बनाए रखने में आम व्यक्तियों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाला परिवहन हमेशा से कारगर रहा है और यही 'टिकाऊ' भी है. इसे रोज़गार बढ़ाने वाला क्षेत्र, और गरीबों के लिए टिकाऊ यातायात का माध्यम एवं पर्यावरण के रक्षक के रूप में देखते हुए एक व्यापक योजना के रूप में अंजाम देने की अत्यंत आवश्यकता है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : सीबीएसई के पास सभी स्कूलों की निगरानी के लिए क्या कोई तंत्र है?
    सीबीएसई ने फिर से दोहराया है कि स्कूल किताब, नोटबुक, स्टेशनरी, यूनिफार्म नहीं बेचेंगे और बोर्ड के नियमों का पालन करेंगे. स्कूल बिजनेस नहीं है बल्कि समाज सेवा है. सभी स्कूलों से कहा गया है कि वे एनसीईआरटी या सीबीएसई की किताबों का ही इस्तेमाल करें. अभिभावकों पर अलग किताबें खरीदने का दबाव न बनाएं. इस तरह के निर्देश तो राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने भी जारी किए हैं. अब सवाल है कि जिन्हें बाध्य किया गया है अधिक दाम पर चीज़ें खरीदने के लिए, क्या उनके पैसे वापस होंगे? जिन्हें 800 की जगह 2000 के जूते खरीदने के लिए कहा गया है क्या उन्हें वापस होंगे? क्या सीबीएसई के पास सभी स्कूलों की निगरानी करने का कोई तंत्र है भी या हम सिर्फ उम्मीद करते रहते हैं?
  • क्या-क्या मुसीबतें आएंगी 'सस्ते इलाज' के नए सपने की राह में...?
    नए-नए सपनों में सस्ते इलाज का एक और सपना जुड़ गया है. देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत सबको पता है. महंगे इलाज की सुविधाएं जिस तरह बढ़ रही हैं, उससे हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सबको स्वास्थ्य का हमारा इरादा किस तरह हारता चला जा रहा है.
  • विनय कटियार ने कहा था- तुम बच गई हो न?
    'तुम बच गई हो न? विनय कटियार ने कहा था.....खुली जीप को चलाते हुए 6 दिसम्बर 1992 को जब मैंने परेशान होकर उनसे कहा था कि मेरी टीम मुझसे बिछड़ गई है. भगदड़ और धूल के गुबार के बीच मेरे कैमरामेन और साउंड रिकॉर्डिस्ट बिछड़ गए थे....अयोध्या में बाबरी मस्जिद के गुंबद की ऊपरी परत भरभराकर गिर रही थी. मुड़कर देखा तो लोग पत्थर फेंक रहे थे कुछ ऊपर भी चढ़े हुए थे और हाथ में कुछ लिए तोड़ने की कोशिश कर रहे थे. मैं मस्जिद परिसर के बाईं ओर मौजूद थी और भीड़ मुझे धीरे-धीरे मस्जिद से दूर धकेल चुकी थी. चारों ओर जमीन पक्की नहीं थी इसलिए भीड़ की भगदड़ से धूल उड़ रही थी.....शोर भी बहुत था.......कुछ भागने वालों की तो कुछ उत्तेजित लोगों की. जमीन पर उतरे मिट्टी के बादलों ने सब धूमिल सा कर दिया था...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों पर जनसुनवाई - हर साल क्यों बढ़ती है इतनी फीस?
    schoolfee@ndtv.com पर हज़ारों ईमेल आए हैं. मैंने सारे तो नहीं मगर कई सौ मेल तो पढ़े ही हैं. यह तय है कि देश भर के प्राइवेट स्कूलों में इस साल 15 से 80 फ़ीसदी तक वृद्धि हुई है. हैदराबाद के एक स्कूल ने 50 फीसदी फ़ीस बढ़ा दी है. ये सब मैं ईमेल के आधार पर बता रहा हूं. क्या किसी माता-पिता की एक साल में सैलरी इतनी बढ़ती है.
  • वर्ल्‍ड अर्थ डे : खुद को बचाना है, तो धरती को नया जीवन देना होगा...
    जब हम स्कूल में पढ़ते थे, हमें कहा गया था कि धरती हमारी माता हैं, पर शायद धरती मां ने तो हमें अपनी संतान मान लिया, लेकिन हम उन्‍हें मां का दर्जा नहीं दे पाए. मेरी इस बात का मतलब समझने के लिए आपको जरा आसपास नजर घुमाने की जरूरत होगी. इतना कूड़ा-कचरा, इतना प्रदूषण, यह व्यवहार भला कोई अपनी मां के साथ कैसे कर सकता है? इस शनिवार, 22 अप्रैल को पूरी दुनिया वर्ल्ड अर्थ डे मनाएगी. लेकिन शायद हम और दिनों की ही तरह इस दिन को भी महज एक दिन मनाकर भूल जाएंगे. क्‍यों न हम इस दिन खुद से कुछ ऐसे वादे करें, जो धरती को हमारे लिए एक प्रदूषित जगह बनाने के बजाए हमें एक स्‍वस्‍थ वातावरण दे...
  • प्राइम टाइम इंट्रो : स्कूलों पर जनसुनवाई - कॉशन मनी नहीं लौटाते स्कूल
    एक ईमेल आया है कि अगर मैं स्कूलों पर जनसुनवाई एक महीना तक करता रहूं तब भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि स्कूल नेताओं और अधिकारियों के होते हैं. अदालतों के आदेश भी नहीं मानते. मैं स्वीकार करता हूं कि उनकी यह बात सही है, लेकिन आज न कल नेताओं को स्कूलों की मनमानी के सवाल पर आना होगा.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या ट्रांसपोर्ट के नाम पर भी स्कूलों में लूट मची है?
    आज कल कई स्कूल पीली वाली बस तो खरीदने लगे हैं मगर बहुत से बच्चे अभी भी वैन से ही जाते हैं. बस का किराया तय करने का कोई सर्वमान्य फार्मूला नहीं है. किसी किसी स्कूल में तो घर 100 मीटर दूर है फिर भी बस से जाना अनिवार्य है. ऐसा कुछ माता पिता ने ई-मेल कर बताया है.
  • रेसिस्म, भारतीय समाज और एक सांवली लड़की
    कुछ दिनों पहले एक भाजपा नेता का बयान आया कि भारत के लोग दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं (यानी केवल उत्तर भारतीय ही असल भारतीय हैं) इसलिए हम एक नस्ली देश नहीं हैं. मैं नोएडा में नाइजीरिया के छात्रों पर हुए हमले पर फिलहाल बात नहीं करूंगी क्योंकि जब यहां लोग अपने ही देश के सांवले लोगों को एक नजर से नहीं देखते तो वे तो दूसरे देश के हैं. खैर, मैं साफ करना चाहूंगी कि मैं मध्यभारत से हूं जिसे अपनी सहूलियत के हिसाब से उत्तर के लोग दक्षिण और दक्षिण के लोग उत्तर भारत का हिस्सा मान लेते हैं. जहां से भी हूं, मुद्दा यह है कि मैं सांवली हूं. मैं एक पढ़ी लिखी, सेल्फ डिपेंडेंट लड़की हूं, पर सांवली हूं. मेरे रंग से मुझे कोई परेशानी नहीं है लेकिन मैं सांवली हूं. मैं सांवला शब्द बार-बार इसलिए लिख रही हूं क्योंकि मैं अक्सर यह सुनती हूं, 'तेरा रंग थोड़ा और फेयर होता तो....'
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम एक गिरे मनोबल वाले 'सैनिक' का खुला खत
    हम पिछले काफी समय से ऐसी बातें सुनते आ रहे हैं जिसे लेकर भारतीय सेना के जवानों, अधिकारियों या कहें कि पूरी सेना का मनोबल गिरता है.
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