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विचार
  • हमारी पार्टियों के लिए बेरोज़गारी कोई मुद्दा है?
    रवीश कुमार
    2019 के चुनाव में बेरोज़गारी की बात बहुत हो रही है, मगर इस पर न तो सरकार की तरफ से कुछ ठोस आ रहा है और न ही विपक्ष की तरफ से. पक्ष और विपक्ष की उदासीनता के बीच बेरोज़गारों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे अपने मुद्दों का क्या करें. 20 मार्च के इंडियन एक्सप्रेस में जे मजूमदार की खबर छपी है. इस खबर के अनुसार वर्क फोर्स यानी काम करने वालों की तादाद में तेज़ी से गिरावट आई है. पांच साल पहले की तुलना में इस वक्त कम लोग काम पर लगे हुए हैं. 1993-94 के बाद पहली बार आई कार्य बल में गिरावट आई है.
  • पहली बार सियासी बातचीत में छाया 'चौकीदार'
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 मार्च को देश भर के असली चौकीदारों से बात करेंगे. शाम साढ़े चार बजे यह बातचीत होगी. दावा किया जा रहा है कि 25 लाख चौकीदारों को संबोधित किया जाएगा. 31 मार्च को उन चौकीदारों से भी बात करेंगे जो ट्विटर पर बने हैं. इसका मतलब यह हुआ कि बीजेपी चौकीदार वाले अभियान को लेकर गंभीर है. तो हमने सोचा कि उन 25 लाख चौकीदारों में से झारखंड में 10,000 चौकीदारों का हाल पहले ही बता दें, जिन्हें कई महीनों से सैलरी नहीं मिली है. कुछ ज़िलों में नवंबर से सैलरी नहीं मिली है तो कुछ ज़िलों में जनवरी के बाद सैलरी नहीं मिली है. हर त्योहार से पहले इनकी यही खबर होती है कि दिवाली से पहले वेतन नहीं मिला तो फीकी रहेगी दिवाली और होली से पहले वेतन नहीं मिला तो फीकी रहेगी होली.
  • 2014 का चायवाला 2019 में चौकीदार हुआ!
    रवीश कुमार
    चुनाव शुरू हो चुका है. अभी तक कैच लाइन का पता नहीं है. बल्कि कैच लाइन वालों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है. हो सकता है अभी आगे के लिए बचा कर रखा हो, मगर जो आ रहा है उसमें मज़ा नहीं आ रहा है. 2014 का चुनाव याद कीजिए. 'अच्छे दिन आने वाले हैं' कैंपेन चल पड़ा था. इस कैंपेन की चुनाव के दौरान धुलाई नहीं हो सकी. उस स्लोगन के बहाने जो लिखा गया, जो गाया गया मतदाता के बड़े वर्ग का वो गीत बनता चला गया. कायदे से स्लोगन तो यही हो सकता था कि अच्छे दिन आ गए हैं, अब आगे बहुते अच्छे दिन आने वाले हैं. विपक्ष ने भी अच्छे दिन कहां है, पूछ-पूछ कर पुराना कर दिया है और सत्ता पक्ष भी इससे बोर हो गया होगा. तभी तो पहले 'मोदी है तो मुमकिन' है लॉन्च हुआ. अगर वो जुबान पर चढ़ा होता तो 'हां मैं भी चौकीदार हूं' लॉन्च नहीं होता.
  • सोचिएगा, समझिएगा, दुनिया में हिन्दुस्तान की भद्द न पिटवाइएगा
    राकेश कुमार मालवीय
    परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक होने चाहिए. हमने पिछली लोकसभा में 34 प्रतिशत ऐसे सांसदों को चुन लिया, जिन्होंने अपने घोषणा पत्र में स्वयं पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज होना घोषित किया था. 2019 में एक बार फिर यही राजनेता आपके सामने वोट मांगने के लिए आ खड़े हुए हैं.
  • क्‍या भारत में हर समस्‍या के लिए जवाहर लाल नेहरू जिम्‍मेदार हैं?
    रवीश कुमार
    भारत ने अपनी समस्याओं को पहचान लिया है. सारी समस्याओं का एक ही नाम है, नेहरू. भारत में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसकी जड़ में नेहरू नहीं हैं. अगर नेहरू नहीं हैं तो वह समस्या नहीं हैं. दुनिया के पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने अकेले दम पर इतनी समस्याएं पैदा करी हैं.
  • अब तक कहां छिपे बैठे हैं चुनावी मुद्दे
    सुधीर जैन
    अनुमान यह लगता है कि इस बार के चुनाव में किसानों और देश के युवावर्ग के दुख या संकट को कम करने के लिए व्यावहारिक योजना पेश करने की होड़ मचेगी. खासतौर पर मौजूदा सरकार की बेदखली की कोशिश करने वाले विपक्ष के नेताओं में यही होड़ मचेगी कि कौन सबसे ज्यादा विश्वसनीय तरीके से अपनी योजनाएं पेश कर पाता है.
  • यूपी में भाजपा के लोग सुबह-शाम मोदी नाम केवलम क्यों कर रहे?
    मनीष कुमार
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में वापस आने की संभावना चुनाव घोषित होने के पहले हफ़्ते में प्रबल दिख रही है. जबकि ये भी सच है कि इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा के शीर्ष नेता से कार्यकर्ता तक मानकर चल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में सीटों को संख्य कम होगी. वह पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में आधी भी हो सकती है. लेकिन इसके बावजूद एक महीने या 45 दिन पहले तक जो भाजपा उत्तर प्रदेश में हाशिये पर डबल डिजिट के लिए संघर्ष कर रही थी वह अब खेल में वापसी कर चुकी है.
  • क्‍या हम चीन की ओर से आंख मूंद रहे हैं?
    रवीश कुमार
    चीन के कारण आतंकी संगठन जैश के मुखिया मसूद अज़हर फिर से ग्लोबल आतंकी घोषण नहीं हो सका. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति की 1267 प्रतिबंध कमेटी की सुनवाई में चीन ने चौथी बार तकनीकि कारणों के आधार पर मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी नहीं होने दिया.
  • चीन को लेकर अभी-अभी देखा गया एक सपना, सपने में सुना मोदी का भाषण
    रवीश कुमार
    हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा. अब चीन को पिचकारी से मार देंगे. होली के पहले जितनी भी पिचकारियां आई हैं, मैं हर देशभक्त से अपील करूंगा कि वह सिर्फ तीन चीज़ें लेकर सीमा पर पहुंचे. एक बाल्टी पानी, रंग और चीन की पिचकारी. इसके बाद हम सब पिचकारी से ही चीन की सेना को ज़ुकाम करा देंगे. छींकते छींकते चीन की बोलती बंद हो जाएगी.
  • भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद से प्रियंका गांधी की मुलाकात के क्या हैं मायने
    रवीश कुमार
    मंगलवार को गांधीनगर में अपने पहले राजनीतिक भाषण के बाद अगले दिन प्रियंका गांधी मेरठ चली आईं. उनका मेरठ आना पहले राजनीतिक भाषण से कहीं ज़्यादा राजनीतिक था. उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले इस मुलाकात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकेंगे. भीम आर्मी के नेता चंशेखर आजाद से अभी तक बड़े नेता दूरी बना कर चल रहे थे. कारण यह था कि चंद्रशेखर की अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा है और संगठन है. लगातार जेल में रहने और भाषण देने से रोके जाने के कारण चंद्रशेखर का सियासी व्यक्तित्व भी स्वायत्त हो चुका है.
  • लो ये नोटबंदी फिर जवाब मांगने लगी?
    राकेश कुमार मालवीय
    एक अखबार के पहले पन्ने पर यह खबर है कि नोटबंदी के निर्णय पर देश का रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया सहमत नहीं था. नोटबंदी के ढाई घंटे पहले तक भी इस निर्णय पर सवाल किए गए थे और शंका जताई गई थी कि जिस लक्ष्य को लेकर यह फैसला लिया जा रहा है वह इससे हासिल नहीं होगा! यानी काला धन के लौटने पर आशंका जताई गई थी. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन से यह बात ऐन चुनाव के वक्त एक बार फिर सामने आ गई है. हालांकि मुख्यधारा के अखबारों ने इस खबर को कोई खास तवज्जो नहीं दी.
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 'किंतु-परंतु' और जनाक्रोश से जीत चुके हैं PM नरेंद्र मोदी
    आईपी बाजपेयी
     उत्तर प्रदेश में प्रतिद्वंद्वी दोस्त बन गए हैं, ताकि 'साझा दुश्मन' BJP से मुकाबिल हो सकें. बहुजन समाज पार्टी (BSP), समाजवादी पार्टी (SP) तथा राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के अलावा भी कई दल महागठबंधन बनाकर एक साथ आ रहे हैं, और उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी मिली-जुली ताकत प्रतिद्वंद्वी को बुरी तरह हरा देगी.
  • पत्रकारों को अवमानना की सजा सुनाने पर सवाल
    रवीश कुमार
    इस चुनाव में मीडिया भी एक मुद्दा है. इस मीडिया के लिए आप कैसे लड़ेंगे यह एक मुश्किल सवाल है, मीडिया खुद के लिए लड़ पाएगा या नहीं यह उसका सवाल है. मगर मीडिया एक मुद्दा है. मीडिया पर इस तरह हमला है और इतना हमला है कि आप भी किन-किन सवालों की परवाह करेंगे, और इसी तरह धीरे-धीरे आप उन सवालों को नज़रअंदाज़ कर सामान्य होने लगेंगे.
  • चुनाव के एक विद्यार्थी की किताब आई है 'The Verdict'
    रवीश कुमार
    जब भी चुनाव आता है डॉ प्रणॉय रॉय चुनाव पढ़ने निकल जाते हैं. वे चुनाव कवर करने नहीं जाते हैं. चुनाव पढ़ने जाते हैं.कई साल से उन्हें चुनावों के वक्त दिल्ली से जाते और जगह-जगह से घूम कर लौटते देखता रहा हूं. अक्सर सोचता हूं कि उनके भीतर कितने चुनाव होंगे. वो चुनावों पर कब किताब लिखेंगे. वे अपने भीतर इतने चुनावों को कैसे रख पाते होंगे. हम लोग कहीं घूम कर आते हैं तो चौराहे पर भी जो मिलता है, उसे बताने लगते हैं. मगर डॉ रॉय उस छात्र की तरह चुप रह जाते हैं जो घंटों पढ़ने के बाद लाइब्रेरी से सर झुकाए घर की तरफ चला जा रहा हो.
  • बीजेपी के गढ़ गुजरात में कांग्रेस की बैठक के पीछे क्या है गणित
    मनोरंजन भारती
    2019 के लोकसभा चुनाव की लड़ाई को कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के घर तक ले गई है और इसी उम्मीद में कांग्रेस की पूरी कार्यसमिति गुजरात में इकट्ठा हुई है.
  • क्या मोदी सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं?
    रवीश कुमार
    इन पांच सालों में काफी कुछ बदल गया. जो सबसे ज़्यादा बदला वो सवाल पूछने की व्यवस्था. इस व्यवस्था की बुनियाद जाने अनजाने में 1975 में 'दीवार' फिल्म में सलीम जावेद ने डाली थी. जब अमिताभ अपने दारोगा भाई शशि कपूर को कहते हैं कि जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ. मेरी राय में यही लाइन अब लाइन में बदल गई है कि जाओ पहले यह पूछ कर आओ कि 70 सालों में क्यों नहीं हुआ.
  • 2019 का चुनाव- पैसा बहेगा पानी की तरह और झूठ अमृत की तरह
    रवीश कुमार
    चुनाव आयोग ने जो चरण बांधे हैं उसे लेकर सवाल उठ रहे हैं. 2014 में बिहार में छह चरणों में चुनाव हुए थे. 2019 में 7 चरणों में होंगे. एक शांतिपूर्ण राज्य में सात चरणों में चुनाव का क्या मतलब है. 2014 में झंझारपुर, मधुबनी, दरभंगा को मधेपुरा, समस्तीपुर, बेगुसराय और खगड़िया के साथ चौथे चरण में रखा गया था. झंझारपुर, मधुबनी और दरभंगा एक दूसरे से सटा हुआ है. इस बार इन तीनों पड़ोसी ज़िले को अलग-अलग चरणों में रखा गया है. झंझारपुर में मतदान तीसरे चरण में यानी 23 अप्रैल को होगा. दरभंगा में मतदान 29 अप्रैल में हैं. मधुबनी में पांचवें चरण में 6 मई को होगा.
  • किसानों को उल्लू बनाने के लिए बहुत ज़रूरी हैं राष्ट्रवाद के नारे
    रवीश कुमार
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी इस असफलता को आतंकवाद और राष्ट्रवाद के जोशीले नारों से ढंकने की कोशिश में हैं मगर पांच साल में उस जगह को बर्बाद किया है जहां से किसान आता है और सेना के लिए जवान आता है. इसके बाद भी अगर चैनलों के सर्वे में मोदी की लोकप्रियता 100 में 60 और 70 के स्केल को छू रही है तो इसका मतलब है कि लोग वाकई अपनी आमदनी गंवा कर इस सरकार से बेहद ख़ुश हैं. यह एक नया राजनीतिक बदलाव है.
  • लंदन में नीरव का मोदी मोदी हो जाना और मेरा नीरव को पत्र लिखना
    रवीश कुमार
    प्यारे नीरव मोदी, लंदन में तुमको लंदनर की तरह देखकर अच्छा लगा. वहां तुम कितने कूल लग रहे थे. हर बात पर नो-कमेंट कहे जा रहे थे. टैक्सी खोजते देखा तो थोड़ा दुख हुआ. तुम्हारे पास अपनी कार क्यों नहीं है. सुपर पावर इंडिया का नीरव मोदी लंदन में टैक्सी खोजे मुझे ठीक नहीं लगा.
  • एनडीए की पटना रैली के बाद नीतीश के चेहरे पर मुस्कराहट और भाजपा में बेचैनी क्यों?
    मनीष कुमार
    बिहार की राजनीति में रविवार तीन मार्च का दिन कई कारणों से याद किया जाएगा. इस दिन सुबह कश्मीर में शहीद हुए सब इंस्पेक्टर पिंटू सिंह का पार्थिव शरीर पटना आया था. तब न तो नीतीश कुमार समेत उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने, न ही मोदी मंत्रिमंडल में शामिल बिहार के किसी मंत्री ने पटना में मौजूद रहने के बावजूद पटना एयरपोर्ट पर जाकर सिंह को श्रद्धांजलि देने की जरूरत समझी. इससे साफ है कि पुलवामा हो या अन्य घटना, इन नेताओं के लिए मीडिया में प्रचार पाने के अलावा कुछ नहीं.
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