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  • कांग्रेस को भारी पड़ गया 'हुआ तो हुआ', जनता ने फिर किया मोदी पर 'विश्‍वास'
    सुरेश कुमार
    कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता मणिशंकर अय्यर के एक बयान ने गुजरात चुनाव की दिशा मोड़ दी थी. ठीक वैसा ही बयान चुनावी अभियान के दौरान कांग्रेस के खेमे से निकला और बीजेपी ने उसका इस्‍तेमाल मिसाइल की तरह करके कांग्रेसनीत गठबंधन के किले को ध्‍वस्‍त कर दिया. वह बयान था सैम पित्रोदा का जो कि सिख दंगों को लेकर दिया गया था- 'हुआ तो हुआ'.
  • ईवीएम की सुरक्षा को लेकर इतना हंगामा क्यों?
    रवीश कुमार
    अगर उनके जमा होने का कारण यह है कि ई वी एम मशीन बदली जा सकती है या गड़बड़ी हो सकती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है. यह चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के लिए अच्छा नहीं है. जिस तरह इस चुनाव में उसके फैसलों पर नज़र रखी गई है, हर फैसले को लेकर संदेह किया गया है यह पहले के चुनावों से कहीं ज़्यादा है. 
  • एग्जिट पोल की अटकलभर से पूंजी बाजार बमबम...
    सुधीर जैन
    एग्जिट पोल में मोदी सरकार की जीत की अटकल लगते ही शेयर बाजार की बांछें खिल गईं. सोमवार को बाजार खुलते ही एक मिनट के भीतर बाजार के सांड ने दौड़ लगा दी.
  • गंभीर मुद्दे इन चुनावों से गायब क्यों रहे? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
    नमस्कार मैं रवीश कुमार, इंटरव्यू होता नहीं था कि लोग हंसना शुरू कर देते थे. ह्मूमर नहीं होता तो 2019 का चुनाव सीरियस नहीं होता. पत्रकारों की जगह अभिनेताओं ने ले ली और सवाल लतीफे बन गए. कई बार तो लगा कि नेता खुद ही कार्टून बन रहे हैं और कार्टूनिस्ट सिर्फ स्केच कर रहे हैं.
  • चुनाव आयोग पर क्यों उठ रहे हैं सवाल
    मामला बिगड़ता गया क्योंकि आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में पीएम मोदी पर जो सवाल उठे उसमें चुनाव आयोग क्लीन चिट देता गया. इस पर चुनाव आयोग के अंदर का मतभेद खुल कर सामने आ गया, जब चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को लिखी चिट्ठी में उनकी अलग राय को रिकॉर्ड नहीं करने की बात सामने आई. उसके बाद लाख सफाई भी काम ना आई.
  • एग्जिट पोल पर बना प्राइम टाइम क्यों ट्रेंड कर रहा है?
    रवीश कुमार
    मेरा शुरू से मानना रहा है कि संडे से बड़ी ख़बर कुछ नहीं होती. संडे घर पर रहने के लिए होता है. संडे को कुछ भी हो एंकरिंग करने नहीं जाना चाहिए. मैं ख़ुद को इतना महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहता कि बिग ब्रेकिंग न्यूज़ में कुर्सी छेंक कर बैठ जाएं. दस साल की एंकरिंग में मैंने ख़ुद से किया यह वादा निभा दिया.
  • मुझे एग्जिट पोल अविश्‍वसनीय लगते हैं, 23 मई का इंतजार करूंगा
    आशुतोष
    जब तक 23 मई को नतीजे नहीं आ जाते, मैं उन आंकड़ों पर भरोसा नहीं करने वाला, जो एग्ज़िट पोल ने हमें दिए हैं. ऐसा नहीं है कि मैं षड्यंत्र वाली थ्योरी में यकीन करता हूं कि चुनाव में धांधली हुई है, या EVM के साथ छेड़छाड़ की गई है. मैं इन पर यकीन नहीं करता, क्योंकि वास्तविकता, जो मुझे दिख रही है, इससे बिल्कुल अलग है. मैं गलत हो सकता हूं, या मैं यह देखने से चूक गया हो सकता हूं कि कब भारत इतना बदल गया, लेकिन मुझे यकीन करने के लिए वास्तविक आंकड़े चाहिए.
  • एग्ज़िट पोल्स को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं...
    रवीश कुमार
    एग्ज़िट पोल पर अब ऐसी कोई बात नहीं है जो कही जा सकती है. टीवी में मुश्किल यही है कि जब सारी बात कह जा चुकी हो तो फिर से उसे कैसे कहें. दरअसल यही टीवी है. एग्जिट पोल के बाद सारे चैनलों को 22 तारीख की आधी रात तक वैसे ही ग़ायब हो जाना चाहिए जैसे एग्ज़िट पोल शुरू होते ही नमो टीवी अपने आप ग़ायब हो गया है.
  • आख़िर कांग्रेस ख़त्म क्यों नहीं होती?
    प्रियदर्शन
    योगेंद्र यादव के ट्वीट को लेकर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसे ध्यान से देखने की ज़रूरत है. उन्होंने लिखा है, 'कांग्रेस को ख़त्म हो जाना चाहिए. अगर वो भारत के विचार की रक्षा के लिए बीजेपी को इन चुनावों में रोक पाने में नाकाम रही तो इस पार्टी के लिए भारतीय इतिहास में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं है. आज किसी विकल्प के निर्माण में ये सबसे बड़ी बाधा की प्रतिनिधि है.'
  • एग्जिट पोल के आंकड़ों पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण
    रवीश कुमार
    शुक्रिया एग्ज़िट पोल का. एग्ज़िट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि मोदी लहर धुंआधार है. हर सर्वे में बीजेपी प्लस की सरकार आराम से बन रही है. यह पूरी तरह आप पर है कि आप एग्ज़िट पोल पर भरोसा करते हैं या नहीं करते हैं. दोनों ही स्थितियों में एग्ज़िट पोल वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. यह ज़रूर है कि 23 तारीख तक आप टीवी पर कुछ नहीं देख पाएंगे
  • प्रधानमंत्री क्यों देते पत्रकारों के सवालों के जवाब
    प्रियदर्शन
    'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक रहते हुए कभी दिलीप पडगांवकर ने कहा था कि देश का सबसे ताकतवर आदमी इस देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा सबसे ताकतवर आदमी 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का संपादक है.तब भी इस वक्तव्य की बहुत आलोचना हुई थी.किसी अच्छे पत्रकार को ताकत के मोह में नहीं पड़ना चाहिए.यह मोह सबसे पहले उसकी पत्रकारिता का क्षरण करता है.लेकिन पत्रकारिता जब अपना काम कर रही होती है तब वह जिस नैतिक आभा से भरी होती है, उसकी ताकत के आगे भी सब सिर झुकाते हैं.
  • यूपी में कागज पर गठबंधन और जमीन पर बीजेपी क्यों मजबूत है?
    ये लोकसभा चुनाव खासा असमंजस से भरा है. लोकसभा चुनाव के दौरान मैंने बीजेपी या गठबंधन के कोर वोटरों से बात करने के बजाए नॉन यादव ओबीसी और नॉन जाटव दलितों से ज्यादा बात करने की कोशिश की है. इसमें पाया कि नॉन यादव ओबीसी का बड़ा वर्ग बीजेपी और खासतौर से मोदी से प्रभावित है.
  • शिव का अनादर है प्रधानमंत्री का लाल कालीन पर चलकर उन तक जाना...
    रवीश कुमार
    सब कुछ ड्रामा जैसा लगता है. सारा ड्रामा इस यक़ीन पर आधारित है कि जनता मूर्ख है. उसे किसी बादशाह पर बनी फिल्म दिखाओ या ऐसा कुछ करो कि जनता को लगे कि वह किसी बादशाह को देख रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ गए हैं. पूरी यात्रा को एक सेट में बदल दिया गया है ताकि न्यूज़ चैनलों पर लगातार कवरेज़ हो सके.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग: चुनाव आयोग में बगावत, आयोग की बैठकों में शामिल होने से आयुक्त अशोक लवासा का इनकार
    रवीश कुमार
    उनकी असहमतियों को दर्ज नहीं किया जा रहा है. संपूर्ण बैठक में तीनों आयुक्त शामिल होते हैं. हर बात दर्ज की जाती है. मगर यह ख़बर हर भारतीय को परेशान करनी चाहिए कि आयोग के भीतर कहीं कोई खेल तो नहीं चल रहा है.
  • इस चुनाव में फ़ेक न्यूज़ का कितना असर रहा...
    रवीश कुमार
    वैसे व्हाट्सएप ग्रुप में एग्ज़िट पोल तो कब से चल रहा है. खासकर पत्रकारों के, जो अपने हिसाब से किसी राज्य में चार सीट कम कर देते हैं तो चालीस सीट बढ़ा देते हैं. कई लोग किनारे ले जाकर पूछते हैं कि अकेले में बता दो किसकी सरकार बनेगी, सही बात है कि हमें नहीं मालूम है. इस चुनाव की एक ख़ास बात यह रही कि इंटरव्यू की ख़ासियत समाप्त हो गई. जो नेता अपने इंटरव्यू में जवाब नहीं दे रहे थे, वो दूसरे नेता के इंटरव्यू का मज़ाक उड़ा रहे थे
  • ब्लॉग: प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शादी में आए 'नाराज फूफा' क्यों बने रहे पीएम मोदी?
    मनोरंजन भारती
    जब से यह खबर आई कि प्रधानमंत्री बीजेपी दफ्तर आ रहे हैं, जहां वे बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे, तो लगा कि सब कुछ सामान्य है. वे आएंगे 40 मिनट तक बोलेंगे, कांग्रेस को भला-बुरा कहेंगे..कुछ अपनी बात कहेंगे, अपने कार्यकर्ताओं का धन्यवाद करेंगे, और बात खत्म हो जाएगी. मगर जब यह खबर आई कि वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तो फिर न्यूज रूम में आपाधापी मच गई. एक अजीब तरह की उत्तेजना और जोश दिखाई देने लगा. सभी तैयारी करने लगे और कहने लगे कि चलो जिस दिन का पिछले पांच साल से इंतजार कर रहे थे वो आखिर आ ही गया...
  • गांधी की संतानों से डरती हैं गोडसे की औलादें
    प्रियदर्शन
    प्रज्ञा ठाकुर को भले पार्टी के दबाव में माफ़ी मांगनी पड़ी, लेकिन उनकी यह बात सौ फ़ीसदी सही है कि एक ख़ास विचारधारा के तहत गोडसे देशभक्त था- उसकी नज़र में देश की जो परिभाषा थी, उससे वह पूजा करता था. उसकी गांधी जी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उसको आरएसएस या हिंदू महासभा ने जो कुछ सिखाया, उस पर उसने पूरी तरह अमल किया. संकट यह है कि आज जो आरएसएस या उससे जुड़े संगठन हैं, उनको अपनी वैचारिकता का भरोसा ही नहीं, इसलिए वे गोडसे की तरह गांधी को सामने से गोली नहीं मारते, पीछे-पीछे उनका वध करते हैं.
  • गोडसे को हीरो बताने के पीछे राजनीति क्या है?
    रवीश कुमार
    इस बात को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. सोचा जाना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि वो कौन सी शक्तियां हैं, वो कौन से लोग हैं और वो लोग किस राजनीतिक खेमे के साथ नज़र आते हैं जो बार-बार गांधी के हत्यारे को अवतार बताने चले आते हैं. पहली बार नहीं हुआ है जब गोडसे को देशभक्त बताया गया है. भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने कहा है कि नाथूराम गोडसे देशभक्त है. आतंकवादी नहीं है.
  • लोकसभा चुनाव : तृणमूल और बीजेपी के बीच संघर्ष के पीछे की कहानी
    मनोरंजन भारती
    पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने प्रचार करने पर रात के 10 बजे के बाद से रोक लगा दी है..यह चुनाव आयोग का एक ऐसा फैसला है जिसको लेकर बहस छिड़ गई है..कई लोग कह रहे हैं कि यदि चुनाव आयोग को प्रचार बंद ही करना था तो 15 तारीख के 10 बजे से ही बंद कर देना चाहिए था. उसे 34 घंटे क्यों बढ़ाया गया. क्या इसलिए कि बंगाल में प्रधानमंत्री को दो रैली होनी थीं. चुनाव आयोग अपने इस फैसले को लेकर विवाद के घेरे में आ गया है और उस पर पक्षपात करने का आरोप लग रहा है.
  • गोरखपुर की चुनावी जंग में कड़ा मुकाबला
    मनोरंजन भारती
    गोरखपुर पूर्वांचल की सबसे हॉट सीट मानी जाती है. वजह है कि गोरखपुर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट है. मुख्यमंत्री बनने के पहले योगी इस सीट से पांच बार सांसद बने. पहली बार 1998 में जीते थे 21 हजार वोटों से फिर उनका जीत का अंतर बढ़ता चला गया. उससे पहले महंत अवैद्यनाथ 1991 से 1998 तक बीजेपी के टिकट पर जीते और 1989 से 1990 में हिंदू महासभा से जीते. मगर योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में प्रवीण निषाद साढ़े 21 हजार वोटों से जीते. निषाद सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार थे.
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