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  • बिहार में नैतिक-अनैतिक को समझना-समझाना आसान नहीं
    बिहार में अचानक राजनीतिक तूफान आया और कुछ ही घंटों में सरकार बदल गई. वैसे बाहर से दिखने में ऐसा लगता नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री वही हैं और मुख्यमंत्री की अपनी पार्टी जेडीयू अभी भी बिहार सरकार में है. बस गठबंधन का नाम बदला है.
  • हारे नहीं हैं लालू प्रसाद यादव, उनका काम हो गया...
    लालू के दोनों युवराज अब राजनीति में संघर्ष करने के दांव-पेंच देख लिए और संभव है, लालू की विरासत को दूर तक लेकर जाएं. इसके लिए लालू प्रसाद को अपने 'कल तक सहयोगी रहे' नीतीश कुमार का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.
  • कश्मीर पर बढ़ी मध्यस्थता की गूंज के बीच कब तक तीन तिगाड़ा काम, बिगाड़ा पर चलेंगे हम?
    गौर करने वाली बात है कि कश्मीर में मध्यस्थता पर बीते चार पांच महीनों में अमेरिका समेत कई देशों ने मध्यस्थता की पेशकश की.
  • 'आम आदमी' एवं 'दलित' की नई राजनीतिक परिभाषा
    और भ्रम फैलाने का सबसे अच्छा माध्यम यह है कि शब्दों के परंपरागत-संस्कारगत अर्थों को भ्रष्ट करके उनकी परिभाषायें बदल दी जायें. इस राजनीतिक औजार की सबसे अधिक जरूरत लोकतांत्रिक प्रणाली वाली व्यवस्था में पड़ती है, और भारत में फिलहाल यही प्रणाली काम कर रही है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : नीतीश का इस्तीफा और मोदी की बधाई...
    बिहार में नीतीश कुमार इस्तीफा देते हैं और थोड़ी देर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नीतीश कुमार को बधाई देना, राजनीति के किस्सों में यदि दिलचस्पी है तो इससे शानदार किस्सा क्या हो सकता है. 2014 में जिस मोदी का नाम प्रधानमंत्री के तौर पर सामने आने पर नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया था, गठबंधन तोड़ते हुए कहा था कि हम अपने बेसिक सिद्दांतों से समझौता नहीं कर सकते हैं.
  • प्राइम टाइम इंट्रो: वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा कैसे दिया जाए?
    भारत के संविधान की धारा 51-ए में कहा गया है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे. क्या आप बता सकतें कि संविधान की इस भावना के आधार पर मौजूदा दौर में कौन सा ऐसा नेता है जो अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : सरकारी विभागों की पोल खोलती सीएजी रिपोर्ट
    भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक, सीएजी की रिपोर्ट की अजीब स्थिति है. सरकारी पक्ष नहीं चाहता कि इस रिपोर्ट को कोई और देख ले, विपक्ष नहीं देख पाता क्योंकि इस रिपोर्ट में उनकी सरकारों के बारे में भी टिप्पणियां होती हैं. सीएजी की रिपोर्ट से गुज़रते हुए आप तमाम विभागों की हालत तमाम राज्यों में समझ सकते हैं.
  • 'लेडी विराट कोहली' नहीं हैं ये - वक्त आ गया है शब्दावली बदलने का
    ...'हार गए, पर दिल जीता' जैसी पंचलाइन जब थोड़ी बसिया जाएंगी, तो उसके बाद भी हमें इस मुद्दे पर सोचना होगा, नई शब्दावलियों पर काम करना होगा. हम शब्दावलियां बदलने के युग में प्रवेश कर चुके हैं.
  • तेजस्‍वी के मुद्दे पर नीतीश से नरमी की उम्‍मीद रखने वाले नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं?
    बिहार में पिछले एक पखवाड़े से अधिक समय से चले आ रहे राजनैतिक गतिरोध का अंत कब होगा, सब यही जानना चाहते हैं. कैसे होगा ये सबको मालूम है लेकिन जो भी होगा, राज्य और देश की राजनीति पर उसका असर आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा.
  • प्राइवेसी को समलैंगिकता के अधिकार से क्यों जोड़ें...
    प्राइवेसी के अधिकार पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जज चंद्रचूड़ द्वारा यह टिप्पणी की गई कि यदि निजता के असीमित अधिकार को मान्यता मिली तो फिर समलैंगिकता पर नाज फाउंडेशन मामले में निर्णय पर पुर्नविचार की मांग हो सकती है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या निजता के लिए नया क़ानून बने?
    26 जनवरी 1950 के संविधान लागू होने के 67 साल बाद भारत की सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि निजता, प्राइवेसी आपका मौलिक अधिकार है या नहीं. 9 जजों की बेंच के सामने यह सवाल आधार के संदर्भ में आया है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : किसानों की समस्याओं का हल क्या?
    समस्या यह है कि किसान दिल्ली आ जाते हैं तब भी कोई नहीं सुनता, मीडिया में आ जाते हैं तब भी किसी को फर्क नहीं पड़ता. ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ करने का दावा नहीं करती है, उसके तमाम दावों और योजनाओं और उनकी वेबसाइट के बाद भी खेती का संकट जहां तहां से निकल ही आता है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : ये सीवर हैं या मौत के कुएं?
    स्वर्ण सिंह, दीपू, अनिल और बलविंदर ये न तो विधायकों के नाम हैं और न ही सांसदों के. न ही ये लोग दल-बदल कर सरकार बनाने का प्रयास कर रहे थे. बहुतों के लिहाज़ से बड़ा काम नहीं कर रहे थे, मेरे लिहाज़ से अगर ये अपना काम नहीं करते तो सीवेज का गंदा पानी हमारे आपके घरों में भर आता. ये चारों लोग 14 जुलाई के दिन दिल्ली के घिटोरनी में एक सेप्टिक टैंक की सफाई करते वक्त मारे गए. टैंक में बनने वाली ज़हरीले गैस से इनका दम घुट गया
  • कौन कहता है कि टाइम मशीनें नहीं बनी हैं ?
    टाइम मशीन का काम क्या होता है. एक वक़्त से दूसरे वक़्त में जाना ? यही होता है ना उसका काम. इसी पैमाने पर मैं ये स्थापना दे रहा हूं कि टाइम मशीन बन चुके हैं और हमारे इर्द-गिर्द बड़ी संख्या में मौजूद है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : पेड न्‍यूज से लेकर फेक न्‍यूज तक
    फेक न्यूज़ का एक और हमसफ़र है पेड न्यूज़. पैसा लेने का तत्व पेड न्यूज़ में भी है और फेक न्यूज़ में भी है. चुनावों में पेड न्यूज़ का क्या आतंक है आप किसी भी दल के उम्मीदवार से पूछ लीजिए. अब पेड न्यूज़ के कई तरीके आ गए हैं.
  • कादम्बिनी शर्मा का ब्लॉग :  क्या चीन और भारत के बीच तनाव कम होगा...
    डोकलाम इलाके में भारत और चीन की सेना को आमने-सामने खड़े एक महीना होने को आया. दोनों में से कोई भी सेना पीछे हटने की जल्दी में नहीं. जिस इलाके को चीन प्राचीन काल से अपना बताकर सड़क बनाने की बात कर रहा है और भारत को पीछे हटने को कह रहा है, भारत लगातार उसे भूटान का क्षेत्र बताते हुए चीन को पीछे हटने को कह रहा है. भूटान की जमीन पर भारत का यह रुख इसलिए है क्योंकि भूटान से उसका रणनीतिक समझौता है जिसके तहत सैन्य मदद उसे मिलती है.
  • कतई नई नहीं है फ़ेक न्यूज़ की बात... हां, नाम ज़रूर नया है...
    हमने दसियों दंतविहीन नियामक ज़रूर बनाए, लेकिन उनकी असरदारी को हम आज तक महसूस नहीं कर पाए. लेकिन आज जब पत्रकारिता के सामने अपनी विश्वसनीयता का ही सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया हो, तो वह अपने इस संकट से निपटने के लिए आचार संहिता की बात मान भी सकती है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : फ़ेक न्यूज़ को कैसे पहचानें?
    फेक न्यूज़ की यह तीसरी कड़ी है. बड़ी चुनौती है कि कोई कैसे पता लगाए कि फेक न्यूज़ है या नहीं. राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित हो कर कई वेबसाइट मौजूद हैं जो न्यूज़ संगठन के भेष में आपके साथ छल कर रही हैं. भारत में इस तरह की कई वेबसाइट हैं जिनके नाम इस तरह से रखे गए हैं जिन्हें देखकर लगता है कि कोई न्यूज़ संगठन होगा. दिक्कत ये है कि इनकी चोरी पकड़ लेने के बाद भी जो सफाई होती है वो उस झूठ का पीछा नहीं कर पाती है जो बहुत दूर निकल चुकी होती है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : फेक न्यूज़ नफरत फैलाने की साजिश?
    क्या आप फेक न्यूज़ से सावधान हैं? दुनियाभर में फेक न्यूज़ लोकतंत्र का गला घोंटने और तानाशाहों की मौज का ज़रिया बन गया है. राजधानी से लेकर ज़िला स्तर तक फेक न्यूज़ गढ़ने और फैलाने में एक पूरा तंत्र विकसित हो चुका है. यही नहीं संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी फेक न्यूज़ दे रहे हैं. कमज़ोर हो चुका मीडिया उनके सामने सही तथ्यों को रखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. पहले पन्ने पर राष्ट्र प्रमुख का बयान छपता है जिसमें फेक जानकारी होती और जब गलती पकड़ी जाती है तो फिर वही अखबार अगले दिन उसी स्पेस में छापने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने झूठा बयान दिया है. मीडिया, पत्रकार और पाठक दर्शक के लिए पता लगाना बहुत जोखिम का काम हो गया है कि न्यूज़ असली है या नकली. पूरी दुनिया में इस बीमारी से लड़ने पर विचार हो रहा है. फेक न्यूज़ से कैसे बचा जाए.
  • ब्लॉग : क्या सचमुच हमारे समाज में बहू 'अनाथ' है...
    ऐसा लग रहा था कि मालती का मुंह, मुंह नहीं एक कोयले से चलने वाला रेल का इंजन है, जो गर्मी से जल रहा है, जिसमें से शब्द नहीं दमा कर देने वाला और दमघोंटू काला धुआं निकल रहा है. इसी वजह से शायद मुझे वहां बैठने और सांस लेने में दिक्कत हो रही थी...
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