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  • यूपी चुनाव : बद से बदतर होती राजनीतिक भाषा शैली
    उत्तरप्रदेश के चुनाव में भले ही और कुछ नया न दिख रहा हो लेकिन भाषा जरूर अचानक बदल गई है. भाषा विवेक पर सभ्य समाज इशारे जरूर कर रहा है लेकिन यह पता नहीं चल रहा है कि आखिर ये बदलाव आया किस रूप में है. यह बदलाव भाषा का है या शैली का है? या साहित्यसुलभ रस और अलंकार के इस्तेमाल में कोई बदलाव आ गया है. सामान्य अनुभव से देखें तो तार्किकता के लिए जरूरी शांत रस राजनीतिक भाषणों में लगभग गायब ही हो चला है.
  • ‘रंगून’ के बाद कंगना और उनकी बेबाकी से बॉलीवुड कैसे निपटेगा?
    रंगून को जो शुरूआती प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं उससे लगता नहीं कि यह फिल्म कंगना की पिछली हिट तनू वेड्स मनु 2 के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की बराबरी कर पाएगी. इसी बॉक्स ऑफिस हिट की बदौलत कंगना ने रंगून में अपने पुरुष साथी कलाकार से एक रुपये ज्यादा की मांग करने की हिम्मत दिखाई थी.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : बच्चे के जन्म के लिए ऑपरेशन सही है या नॉर्मल डिलिवरी?
    दो महीना पहले चेंज डॉट ओआरजी पर मुंबई की सुवर्णा घोष ने एक याचिका डाली और लोगों से समर्थन मांगा. याचिका के ज़रिये सुर्वणा जी ने मांग की कि सभी अस्पतालों के लिए अनिवार्य किया जाए कि वे अपने अस्पताल में होने वाले सीज़ेरियन डिलिवरी की संख्या की घोषणा करें. दो महीने के भीतर इस अभियान को एक लाख चालीस हज़ार लोगों ने अपना समर्थन दिया है जिनमें से साठ फीसदी महिलाएं हैं.
  • सुप्रीम कोर्ट, सरकार और सीबीआई संदेह के घेरे में - पुल के सुसाइड नोट पर हो पब्लिक ट्रायल
    कलिखो पुल के सुसाइड नोट में बड़े वकील और जजों के नाम पर करोड़ों के लेन-देन की मांग का जिक्र है. सीबीआई के दो पूर्व मुखिया बड़े मामलों को दबाने के मामले में जांच का सामना कर रहे हैं फिर सीबीआई इस सुसाइड नोट की निष्पक्ष जांच कैसे कर पाएगी?
  • यूपी विधानसभा चुनाव 2017 : 'गधे' पर अखिलेश यादव की बयानबाजी, एक तीर से दो निशाने
    यूपी में आजकल गधों को लेकर राजनीति होने लगी और इसमें जुबानी जंग तेज है. शुरुआत सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने की और फिर इस पर लगातार बयानबाजी चली आ रही है. एक जानवर किसी चुनाव में इतना महत्वपूर्ण हो जाएगा, कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या हमारे शिक्षा संस्थानों में बोलने की आज़ादी ख़त्म हो रही है?
    रामजस कॉलेज ऐसा वैसा कॉलेज नहीं है. एलिट माहौल के बीच खांटी मिज़ाज का बड़ा ही ऐतिहासिक कॉलेज है. कॉलेज की प्रस्तावना की भावना के तहत 21 फरवरी और 22 फरवरी को सेमिनार का आयोजन किया गया. भावना क्या थी कि छात्र एक्सप्लोर करेंगे. सेमिनार जैसा सोचा गया था उस तरीके से तो नहीं हुआ, मगर रामजस कॉलेज में विरोध की वो संस्कृति देखने को मिली, जो सेमिनार के विषय सूची में नहीं थी. सवाल सिलेबस से बाहर का आ गया.
  • एक वेश्‍या का ख़त: समाज मुझे सम्‍मान नहीं देता लेकिन इसे आपको अपने लिए पढ़ना चाहिए...
    मैंने इतने सालों में एक ही बात समझी है कि जो वंचित और उपेक्षित होता है, वही प्रताड़ित और शोषित होता है. क्या हम इसे खत्‍म नहीं कर सकते? यदि वंचित होना खत्म होगा, तो प्रताड़ना और शोषण अपने आप खत्‍म होगा. मैं चाहती हूं कि हमारी बस्ती में लड़कियों को सम्मानजनक रोज़गार मिलना चाहिए ताकि उन्हें वेश्यावृत्ति न करना पड़े.
  • UP elections 2017: कुछ कह गए वो, सुन कर हम भी चल दिए
    ऐसा कुछ है हमारे देश के चुनावों में कि अच्छे भले नेता भी कुछ ऐसा कहने को मजबूर हो जाते हैं जिससे उनके बारे में लोगों की राय बदल जाए.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : स्टेंट की क़ीमतों पर सरकार ने लगाई लगाम
    इस रिपोर्ट के दौरान इंटरनेट पर रिसर्च करते हुए जानकारी मिली कि 2016 के साल में भारत के अस्पतालों में 6 लाख स्टेंट का इस्तेमाल हुआ. अब सोचिये 30,000 का स्टेंट आपने डेढ़ पौने दो लाख में लगवाया. अस्पतालों ने स्टेंट के ज़रिये काफी कमाया है. कई जगह यह भी पढ़ने को मिला कि भारत से लेकर अमरीका तक में 25-30 प्रतिशत लोगों को स्टेंट लगाया गया जबकि वो सिर्फ दवा से ठीक हो सकते थे. अब जो आदेश हुआ है, उसके अनुसार अस्पताल अपने बिल में अलग से बतायेंगे कि स्टेंट की कितनी कीमत वसूली गई है.
  • समझ नहीं आता हम कहां के नागरिक हैं ?
    भोली जनता उस वक्त और ठगी सी रह जाती है जब विकास न करने के लिए राज्य, केंद्र और केंद्र, राज्य को बिना सोचे-समझे कठघरे में खड़ा कर देते हैं. एक बोलता है हम केंद्र से पैसा भेजते हैं वह आप तक नहीं पहुंच पाते, दूसरा बोलता है पैसा ही नहीं है तो विकास कहां से करें ! संशय में हैं कि हम नागरिक, दोषी ठहराएं तो कि‍से, श्रेय दें तो कि‍से ?
  • क्या करोड़पति भारतीयों के लिए राष्ट्र सिर्फ एक सर्विस प्रोवाइडर होता है?
    क्या करोड़पतियों का कोई राष्ट्र नहीं होता है? तो क्या राष्ट्र सिर्फ उस भीड़ के लिए है जो गरीब है, नासमझ है और जो अपने तर्कों के प्रति कम, भावनाओं के प्रति ज़्यादा समर्पित होती है?
  • यूपी चुनाव : मुद्दों के बजाय आरोप-प्रत्‍यारोप में उलझे सियासी दल
    जब सभी राजनीतिक दलों के नेता रोज लंबे-लंबे भाषण दे रहे हैं तो यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि यूपी चुनाव में मुददे की बातें हो नहीं रही हैं. जिसकी अपनी जो विशेषता, विशेषज्ञता होती है वह जरूर चाहता है कि चुनाव में उसकी विशेषता ही मुख्य मुददा बन जाए. सो यह बात यूपी में पिछले दस दिनों में खूब दिखाई दी. इस तरह एक से बढ़कर एक चुनावी खिलाड़‍ियों ने अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की बात का जवाब देने की बजाए सिर्फ अपनी बात ही कहना ठीक समझा.
  • मोदी जी, यह विकास पुरुष की भाषा नहीं है
    हम उदारवादी जब भी एनडीए सरकार के काम पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करते हैं या फिर प्रधानमंत्री को उत्तर प्रदेश के कल्याण के बारे में बोलते हुए सुनते हैं, वह ऐसा कुछ कह देते हैं कि हम वापस इतिहास में पहुंच जाते हैं.
  • यूपी चुनाव : सौगंध राम की खाते हैं से गंगा की सौगंध तक...
    वाकई ट्रंप ने अगर यूपी चुनाव में भाषा का स्तर देख लिया तो उनके और नीचे आने की उम्मीद की जा सकती है. ट्रंप का असर दुनिया में हो रहा है, कहीं उन पर यूपी का असर न हो जाए.
  • वेद प्रकाश शर्मा : भाषा का उत्कर्ष दिखाने वाला चश्मा उतारकर भी देखें इन्हें
    ये वो दिन थे जब ‘नंदन’, ‘चंपक’ और ‘नन्हें सम्राट’ पढ़ने में उम्र विद्रोह करने लगा था. ‘सुमन सौरभ’ और ‘विज्ञान प्रगति’ के दिन आ गए थे जिसे पढ़ने के बाद लगता था कि कुछ तो बड़े होने लगे हैं. ऐसे ही दिनों में मुझे गांव में विमल भैया की आलमारी मिली. इससे होकर एक ऐसी दुनिया की खिड़की खुली जहां रोमांच था, दिमागी कसरत थी और उत्सुकता थी. ऊपर कोने से मोड़े गए पन्ने जो बुकमार्क का काम करते थे वापस बुलाते रहते थे कि यहां से आगे बढ़कर क्लाइमेक्स तक पहुंचो. ये आलमारी बड़की मां के कमरे में थी, जहां कोई यह कहने नहीं आता था कि ‘इसको पढ़ने की तुम्हारी उम्र नहीं’. आलमारी की तरतीब जब तक न बिगड़े, भैया के भी बिगड़ने की संभावना नहीं थी. एक दिन यहीं मिले वेद प्रकाश शर्मा और ‘जिगर का टुकड़ा’ एक मोटा सा खुरदरे पन्ने वाला उपन्यास. बाद में पता चला था कि इसे लुगदी उपन्यास कहते हैं यानि पल्प फिक्शन.
  • सोचिए अगर एंबैसेडर कार वापस आ गई तो!
    हो सकता है 21वीं शताब्दी में बड़े होने वाले जेनरेशन में एंबैसेडर को लेकर उतनी उत्सुकता न हो, पर अस्सी-नब्बे की दशक में बड़े होने वालों के लिए तो सवालों का पिटारा खुल गया है. क्या वाकई कार वापस आएगी? आएगी तो कितनी बदल कर आएगी? नया इंजन लगेगा? बॉडी का शेप कैसा होगा? छत का डिज़ाइन तो नहीं बदल जाएगा?
  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग: क्या लगता है आपको, यूपी में कौन जीतेगा!
    यूपी में कौन जीत रहा है, इस सवाल के दागते ही फन्ने ख़ां बनकर घूम रहे पत्रकारों के पाँव थम जाते हैं. लंबी गहरी साँस लेने लगते हैं. उनके चेहरे पर पहला भाव तो यही आता है कि दो मिनट दीजिये, नतीजा बताता हूँ लेकिन दो मिनट बीत जाने के बाद चेहरे का भाव बदल जाता है.
  • क्यों सारे बॉलिवुडिया गाने रोमांटिक और क्यों संस्कृति के जोड़ों में दर्द?
    अगर आप दिल्ली में कार चलाते हैं और आपके जीवन का एक ही लक्ष्य हो कि ट्रैफिक में पागल नहीं होना है तो फिर उसके लिए दो ही तरीके हैं - एक तो संगीत और दूसरा दूसरों की कारों में झांकना, जिसे स्थानीय भाषा में ताड़ना कहते हैं. लेकिन अगर आपकी मध्यम वर्ग की कुटी हुई सभ्य अपब्रिंगिंग है तो फिर आप एक ही तरीका अपनाएंगे वो है संगीत का. और मेरी समस्या इसी मुद्दे से शुरू हुई और फिर बढ़ती-बढ़ती ब्लॉग का शक्ल ले चुकी है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : बीएमसी चुनावों में जनता की क्या है मांग?
    30,000 करोड़ से अधिक के बजट वाली बृह्न मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी के चुनाव हो रहे हैं. पौने तीन करोड़ की आबादी 227 पार्षदों को चुनने के लिए 21 फरवरी को मतदान करने जा रही है. मुंबई में वार्डों का नामकरण संख्या के हिसाब से नहीं होता है. अंग्रेज़ी अल्फाबेट से होता है. ए से लेकर टी नाम वाले वार्ड होते हैं यहां. क्‍यू, आई, जे, ओ नाम के वार्ड क्यों नहीं हैं, ये मैं नहीं जानता हूं. जबकि ए से टी के बीच ये चारों आते हैं.
  • खुल गई अखिलेश यादव, राहुल गांधी के धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल
    दिवंगत राजनेता तथा लेखक रफीक ज़कारिया कि पुस्तक 'कम्युनल रेज इन सेक्युलर इंडिया' के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा भविष्यदृष्टा की तरह लिखी गई प्रस्तावना के एक हिस्से में उन्होंने भारत में सांप्रदायिक दंगों का विश्लेषण भी किया था, जो भावनाओं को झकझोर डालता है... उन्होंने लिखा था, "हर किसी के कई-कई व्यक्तित्व हैं, और इसका ताल्लुक सिर्फ किसी के धर्म या समुदाय से नहीं है.

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