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विचार
  • नीतीश कुमार को सोशल मीडिया पर गुस्सा क्यों आता है?
    मनीष कुमार
    इन दिनों सब यही जानना चाहते हैं कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) आख़िर क्यों सोशल मीडिया (Social Media) पर नियंत्रण रखना चाहते हैं. इसका सीधा जवाब है कि  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सोशल मीडिया से चिढ़ है. ये बात इसलिए किसी से छिपी नहीं क्योंकि वो चाहे राजनीतिक कार्यक्रम हो या सरकारी सब जगह वो अपनी सरकार की नकारात्मक छवि का ठीकरा सोशल मीडिया पर फ़ोड़ते हैं. लेकिन बृहस्पतिवार को जो उनके मातहत पुलिस विभाग ने एक आदेश जारी किया है उसके बाद उनकी आलोचना ना केवल विपक्ष कर रहा है बल्कि मीडिया में भी उनके इस फ़ैसले की भर्त्सना करने की होड़ सी लगी है.
  • जब तोड़ने वाले जय श्रीराम का नारा लगाते हैं
    प्रियदर्शन
    जय श्रीराम का यह रुग्ण इस्तेमाल इन दिनों लगातार बढ़ा है. कुछ दिन पहले ऐसे ही नारों और गाली-गलौज के बीच एक बाइक रैली निकली थी. जाहिर है, यह वे राम नहीं हैं जिनसे लोगों की आस्था हो, ये वे राम हैं जिनका इस्तेमाल एक हथियार की तरह होना है- एक विवेकहीन भीड़ के उन्माद के अस्त्र के रूप में.
  • भारत माता की जय के पवित्र नारे को अर्णब गोस्वामी से बचाइये
    रवीश कुमार
    अर्णब गोस्वामी ने व्हाट्स एप चैट को लेकर एक बयान जारी किया. उसमें कहीं नहीं लिखा कि चैट फ़र्ज़ी है. बालाकोट हमले की जानकारी के मामले में वे पाकिस्तान को घुसा कर ढाल बना रहे हैं. क्या TRP मामले में भी पाकिस्तान है ?
  • अर्णब के व्हाट्सऐप चैट पर बोलना था PM को, बोल रहे हैं राहुल गांधी, क्यों?
    रवीश कुमार
    राहुल गांधी किसानों को लेकर एक पुस्तिका जारी करने प्रेस कांफ्रेंस में आते हैं. उनसे कई तरह से सवाल-जवाब होते हैं. एक सवाल इस व्हाट्स एप चैट को लेकर चुप्पी के बारे में होता है जिसके जवाब में राहुल गांधी पहले अंग्रेज़ी में और फिर हिन्दी में बोलते हैं.
  • भारतीय टीम की जीत और क्रिकेट का संगीत
    प्रियदर्शन
    टी-20 और वनडे वाले आधुनिक क्रिकेट के मौजूदा दौर में टेस्ट मैच शास्त्रीय संगीत जैसा लगता है- एक लय में हो रही गेंदबाज़ी, मुरकियों की तरह बल्लेबाज़ी और धीरे-धीरे गेंद और बल्ले के संगीत का बनता हुआ खुमार. यह संगीत जब अपने उरूज पर होता है तो कैसा जादू करता है, यह भारत और ऑस्ट्रेलिया की मौजूदा टेस्ट सीरीज़ ने बताया.
  • नीतीश कुमार के गुस्से के लिए उनकी आलोचना नहीं, उनके प्रति सहानुभूति की जरूरत
    मनीष कुमार
    इंडिगो एयरलाइंस के स्टेशन मैनेजर रूपेश कुमार की हत्या के सम्बंध में शुक्रवार को जब सवाल पूछा गया तो नीतीश कुमार आग बबूला हो गए. उनके जवाब से साफ़ था कि आपत्ति सवाल और सवाल पूछने वाले दोनों से है. कमोबेश पत्रकारों से दूरी बनाए रखने वाले नीतीश कुमार चुनाव में अपने निराशाजनक प्रदर्शन के बाद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कृपा से मुख्यमंत्री बनने के बाद मीडिया से अपने सम्बंध फिर पुराने दिनों की तरह सामान्य रखने लगे थे.
  • नीतीश कुमार को गुस्सा क्यों आता है?
    प्रियदर्शन
    आज नीतीश कुमार मीडिया से चिढ़े हुए हैं. वे मीडिया से पूछ रहे हैं कि वह किसकी तरफ़ है. यह दरअसल इस बात की शिकायत है कि वह उनकी तरफ़ क्यों नहीं है.
  • बीजेपी के बागियों द्वारा पेश की गई सीडी से बीएस येदियुरप्पा के लिए नए संकट की स्थिति
    स्वाति चतुर्वेदी
    कैबिनेट विस्तार के लिए हरी झंडी ऐसे वक्त मिली थी जब बीएसवाई के नाम से गृह राज्य में मशहूर येदियुरप्पा के नेतृत्व में बीजेपी को हालिया उप चुनाव में दो ऐसी सीटों पर जीत मिली, जो कभी पहले पार्टी की झोली में नहीं रहीं. हालिया पंचायत चुनाव में भी बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया. 
  • एक मंदिर के लिए राष्ट्रपति का चंदा देना कितना उचित है?
    प्रियदर्शन
    मान लें, राष्ट्रपति को अपनी आस्थाएं प्रिय हैं. लेकिन वे ऐसी स्थिति में गोपनीय दान भी कर सकते थे. उनकी आस्था भी अखंडित रहती और उनके पद की मर्यादा भी बची रह जाती. क्या उन्हें संदेह था कि उनका गोपनीय दान ईश्वर या राम के लिए गोपनीय रह जाएगा? ईश्वर अगर सब कुछ देखता है तो उनका यह दान भी देख लेता. लेकिन यह तब होता जब राष्ट्रपति सिर्फ़ राम को दिखाना चाहते. वे निश्चय ही चाहते रहे होंगे कि देश देखे कि उन्होंने राम मंदिर के लिए पांच लाख का चंदा दिया है.
  • कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन के 50 दिन पूरे
    रवीश कुमार
    संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी को महत्व नहीं देना चाहता है. कमेटी के सदस्यों को लेकर काफी आलोचना हो रही है और उनकी आलोचना के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट की भी हो रही है. किसान आंदोलन के 51 दिन हो गए.
  • किसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी को ठुकराया
    रवीश कुमार
    जितने स्पष्ट किसान थे कि कोर्ट की कमेटी में नहीं जाना है उतना ही स्पष्ट अदालत थी कि कमेटी बनानी ही है. कमेटी बन गई है और सदस्यों के नाम आ गए हैं. सरकार भी चाहती थी कि कमेटी बन जाए. सरकार नहीं चाहती थी कि कानून के लागू होने पर रोक लगे. सुप्रीम कोर्ट ने कानून के लागू होने पर रोक लगा दी है. सोमवार को लगा था कि सरकार कटघरे में है, मंगलवार को लग रहा है किसान कटघरे में हैं.
  • कृषि कानूनों पर सरकार के रुख से सुप्रीम कोर्ट नाराज...
    रवीश कुमार
    आपको विश्वास हो या न हो, हम सुप्रीम कोर्ट हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा तो किसानों से लेकिन अहसास करा दिया सरकार को कि हम सुप्रीम कोर्ट हैं. कोर्ट के सवालों के सामने सरकार के वकील बल्लेबाजों के विकेट कभी उखड़ते नज़र आए तो कभी गेंद कहीं और बल्ला कहीं और. पूरी बहस से अगर आप सरकारी पक्ष के तमाम वकीलों की दलीलों से कुछ वाक्यों को चुन लें तो पता चलता है कि सरकार कितने कमज़ोर दलीलों से लड़ रही है और उसकी असली चिन्ता क्या है?
  • नीतीश कुमार के राजनीतिक पतन के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराना कितना सही
    मनीष कुमार
    बिहार में एनडीए के नेता के रूप में नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री हैं. लेकिन ये भी सच है कि नीतीश कुमार के नाम और काम पर जो एनडीए चुनाव में गई उसमें सबका प्रदर्शन उम्मीदों के विपरीत निराशाजनक रहा. खासकर जनता दल यूनाइटेड का जो अब बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी है. इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि नीतीश कुमार आज जनता से अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हें पिछले चुनाव तक वो सामने से चुनौती देते थे, की कृपा से आज मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं. साथ ही ये भी एक कड़वा सच है कि भाजपा ने उन्हें हाशिये पर ले जाने का जो भी प्रयास किया उसमें उसको आंशिक सफलता तो मिली. लेकिन जैसा अधिकांश राज्यों में अपने सहयोगियों को निपटा कर सत्ता में अपनी पकड़ मज़बूत करने का उनका लक्ष्य कामयाब होता रहा है, वो बिहार में अभी तक अधूरा है.
  • ट्रंप का तमाशा और दो किताबों के बहाने लोकतंत्र के ज़रूरी सवाल
    प्रियदर्शन
    शुक्र है कि डोनाल्ड ट्रंप को समय रहते यह बात समझ में आ गई कि राष्ट्रपति बने रहने की ज़िद में वे अपनी ही नहीं, अमेरिका की भी जगहंसाई कर रहे हैं. बुधवार को उनके समर्थकों ने कैपिटोल हिल के भीतर जिस तरह का हंगामा किया, वह अमेरिकी लोगों के लिए अकल्पनीय था.
  • ताकि लोकतंत्र का मंदिर बचा रहे
    प्रियदर्शन
    पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनवा में एक ऐतिहासिक हिंदू मंदिर तोड़े जाने की ख़बर सुर्खियों में रही. इसे भारत में सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया. अख़बारों और टीवी चैनलों पर भी यह ख़बर ख़ूब चली. इसे इस बात के प्रमाण की तरह पेश किया गया कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति कितनी बुरी है. वहां जबरन धर्मांतरण कराए जाने की लगातार आ रही ख़बरें इस स्थिति के दूसरे प्रमाण की तरह गिनाई जाती हैं.
  • इतनी भी बेरुख़ी से विदा न कीजिए 2020 को, जाने वाला नहीं है
    रवीश कुमार
    यह साल कई सालों तक रहने आया है. तरक्की के जिन रास्तों पर दुनिया चली जा रही थी उसके सफ़र के लिए कुछ ज़रूरी सामान छूट गए थे. उसी को याद दिलाने आया है 2020.
  • इस बरस कई वायरस...
    प्रियदर्शन
    इस पूरे साल दुनिया एक वायरस से त्रस्त रही. इसकी वजह से सबको घरों के भीतर बंद होना पड़ा. इसकी वजह से उद्योग-धंधे चौपट हुए, लोगों की नौकरियां छूटीं, रोज़गार गया और करोड़ों लोगों के सामने भूखो मरने जैसे हालात आ गए. इस वायरस की वजह से दुनिया भर में आधिकारिक तौर पर 18 लाख लोग मर गए जिनमें से शायद ज्यादातर के हिस्से ज़िंदगी के कई बरस बाक़ी थे. लेकिन इसी वायरस ने कई लोगों को कुछ और अमीर बना दिया.
  • फिरोजशाह कोटला (अब जेटली) स्टेडियम में यह नए दौर का धर्म है
    मनीष शर्मा
    इस मामले पर कुछ 'धर्मयोद्धा' मन ही मन नाराज़ हैं, लेकिन आएदिन हर विषय पर राय रखने वाले इन 'धर्मयोद्धाओं' के होठ सिल गए हैं. दरअसल, ये बड़ा धर्म देख रहे हैं. ये धर्म की व्यापकता में भरोसा रखते हैं. यही वजह है कि इनके मुख से कोई आवाज़ नहीं आई, और जब मूर्ति का अनावरण हो रहा था, तो यही धर्मयोद्धा तालियां बजा रहे थे.
  • किसान आंदोलन का मुक़ाबला सूचना तंत्र से
    रवीश कुमार
    एक महीना पहले हाईवे को बीच से काट देने और सीमेंट के बने भीमकाय बोल्डरों से रास्ता रोकने की तस्वीरों से लगा था कि किसान बैरिकेड की दीवार नहीं पार कर पाएंगे. बेशक सरकार ने किसानों को दिल्ली आने से रोक दिया लेकिन किसानों ने भी अपने आंदोलन को बैरिकेड में बदल दिया है. किसान आंदोलन सरकार के बनाए बैरिकेड की दीवारों से अपनी दीवार ऊंची करने लगा. मगर बैरिकेड सिर्फ वही नहीं थे जिसे पुलिस लगा रही थी.
  • बुझ गया चांद सरे आसमां
    प्रियदर्शन
    कम लोगों को एहसास होगा कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का इंतक़ाल हिंदुस्तानी तहज़ीब और अदबी रिवायत के लिए कितना बड़ा नुक़सान है. 2020 के इस मनहूस बरस में मौत के साये जैसे दस्ताने पहन कर घूम रहे हैं, और वे चुन-चुन कर उन लोगों को ले जा रहे हैं जिन्होंने हमारे समय को ही मायने नहीं दिए, हमारे माज़ी को भी हमारे लिए बचाए रखा.
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