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विचार
  • क्या ऐसे ही भारत में इंसाफ़ होगा?
    रवीश कुमार
    फास्ट ट्रैक कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने कोर्ट रूम में ताला लगाकर शिमला चले जाना चाहिए और वहां बादाम छुहाड़ा खाना चाहिए. क्योंकि उनका काम खत्म हो गया है. क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर संविधान की शपथ लेकर सासंद बने और टीवी पर आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तेलंगाना पुलिस की एक असामाजिक करतूत को सही ठहरा दिया है. पुरुषों के अलावा बहुत सी महिलाएं भी उस पब्लिक ओपिनियन को बनाने में लगी हैं और अपने बनाए ओपिनियन की आड़ में इस एनकाउंटर को सही ठहरा रही हैं.
  • हिन्दी प्रदेश को कचरे के ढेर में बदलने के लिए एक और तैयारी पूरी : नागरिकता संशोधन विधेयक
    रवीश कुमार
    जिस तरह से धारा 370 की राजनीति कश्मीर के लिए कम हिन्दी प्रदेशों को भटकाने के लिए ज़्यादा थी उसी तरह से नागरिकता संशोधन बिल असम या पूर्वोत्तर के लिए हिन्दी प्रदेशों के लिए ज़्यादा है. इन्हीं प्रदेशों में एक धर्म विशेष को लेकर पूर्वाग्रह इतना मज़बूत है कि उसे सुलगाए रखने के लिए ऐसे मुद्दे लाए जाते हैं ताकि वह अपने पूर्वाग्रहों को और ठोस कर सके. लगे कि जो वह सोच रहा है उसके लिए ही किया जा रहा है. इसकी भारी क़ीमत देश चुका रहा है.
  • नागरिकता देने में धार्मिक आधार पर भेदभाव क्यों?
    रवीश कुमार
    राष्ट्रवाद की चादर में लपेटकर सांप्रदायिकता अमृत नहीं हो जाती है. उसी तरह जैसे ज़हर पर चांदी का वर्क चढ़ा कर आप बर्फी नहीं बना सकते हैं. हम चले थे ऐसी नागरिकता की ओर जो धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करती हो, लेकिन पहुंचने जा रहे हैं वहां जहां धर्म के आधार पर नागरिकता का फैसला होगा. नागरिकता को लेकर बहस करने वाले लोग पहले यही फैसला कर लें कि इस देश में किस-किस की नागरिकता अभी तय होनी है
  • क्या आज का भारत हाजी हबीब के लिए नागरिकता रजिस्टर का विरोध करेगा?
    रवीश कुमार
    असम की आबादी साढ़े तीन करोड़ ही है. नागरिकता रजिस्टर के नाम राज्य ने 1600 करोड़ फूंक दिए. राज्य के करीब 4 साल बर्बाद हुए. 2019 के अगस्त में जब अंतिम सूची आई तो मात्र 19 लाख लोग उसमें नहीं आ सके. इनमें से भी 14 लाख हिन्दू हैं. बाकी 5 लाख के भी कुछ रिश्तेदार भारतीय हैं और कुछ नहीं. इन सबको फॉरेन ट्रिब्यूनल में जाने का मौका मिलेगा. उसके बाद तय होगा कि आप भारत के नागरिक हैं या नहीं. वहां भी केस को पूरा होने में छह महीने से साल भर कर समय लग सकता है.
  • नागरिकता कानून देश का डीएनए बदलने की कोशिश
    प्रियदर्शन
    नागरिकता संशोधन बिल एक खतरनाक बिल है. यह बिल भारतीय राष्ट्र राज्य की मूल अवधारणा पर चोट करता है. यह उस प्रस्तावना की खिल्ली उड़ाता है जो हर भारतीय नागरिक को धर्म, जाति, भाषा या किसी भी भेदभाव से परे हर तरह की समता का अधिकार देती है. क्योंकि यह बिल पहली बार धर्म के आधार पर कुछ लोगों के लिए नागरिकता का प्रस्ताव करता है, और इसी आधार पर कुछ लोगों को बाहर रखे जाने की बात करता है. यह क़ानून इस देश के डीएनए को बदलने की कोशिश है.
  • गुजरात के 11 लाख नौजवानों को मेरा पत्र, नागरिकता का नवजीवन मुबारक
    रवीश कुमार
    गांधी जी कहते थे साधन की पवित्रता साध्य से ज़्यादा ज़रूरी है. हम सभी गांधी नहीं हो सकते मगर उनके बताए रास्ते पर थोड़ा थोड़ा चल सकते हैं. आपने अपने अनेक ट्विट में अपने आंदोलन को गांधीवादी कहा है, उम्मीद है हिंसा न होने के अलावा आप अपने नारों में भी शुचिता रखेंगे.
  • बिना इंटरनेट कश्मीर में पत्रकारिता सूनी और डीयू में कैसे जी रहे हैं शिक्षक
    रवीश कुमार
    कश्मीर में आम लोगों के लिए 120 दिनों से इंटरनेट बंद है. पांच अगस्त से इंटरनेट बंद है. कश्मीर टाइम्स की अनुराधा भसीन ने दस अगस्त को सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि बगैर इंटरनेट के पत्रकार अपना मूल काम नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें छूट मिलनी चाहिए. इस केस को लेकर पहली सुनवाई 16 अगस्त हुई और नवंबर के महीने तक चली. बहस पूरी हो चुकी है और फैसले का इंतज़ार है. मगर बगैर इंटरनेट के कश्मीर के पत्रकार क्या कर रहे हैं. वे कैसे खबरों की बैकग्राउंड चेकिंग के लिए तथ्यों का पता लगा रहे हैं. दुनिया में यह अदभुत प्रयोग हो रहा है. न्यूयार्कर को इसी पर रिसर्च करना चाहिए कि बगैर इंटरनेट के अखबार छप सकते हैं. कश्मीर के न्यूज़ रूम में इंटरनेट बंद है लेकिन सरकार ने पत्रकारों के लिए एक मीडिया सुविधा केंद्र बनाया है.
  • रवीश कुमार का ब्‍लॉग : JNU ने छात्रों के बीच एक सपना दिखाया है कि यूनिवर्सिटी JNU जैसी होनी चाहिए
    रवीश कुमार
    हर दौर में जेएनयू बरकार रहे. जेएनयू को बदनाम करने की कोशिशें चलती रहेंगी लेकिन इस यूनिवर्सिटी ने वाकई छात्रों के बीच एक सपना दिखाया है कि यूनिवर्सिटी जेएनयू जैसी होनी चाहिए.
  • विशेष तौर पर सक्षम लोगों से समाज का सलूक कैसा
    रवीश कुमार
    तीन दिसंबर को International Day of Persons with Disabilities के तौर पर मनाया जाता है. 1992 में संयुक्त राष्ट्र ने यह दिन इसलिए तय किया था ताकि इसके बहाने आम लोगों और सरकारों के बीच अलग से शारीरिक और मानसिक तौर पर सक्षमता को लेकर समझ बने और उनके हिसाब से अधिकारों की समझ समाज में बने. ताकि अगर जब हम देखें कि कोई इमारत, कोई सड़क या बाज़ार या दफ्तर इस लिहाज़ से न हो तो पहला सवाल ये दिमाग में आए कि इसका न होना, संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है. कुछ दिन पहले मैं कैलिफोर्निया गया था. वहां के मांटेरे में एक पब्लिक बस देखी. मैं हैरान हो गया पूरी प्रक्रिया को देखकर.
  • मोदी जी देखिए उद्योगपति हर्ष गोयनका गोविंद प्रसाद की कविता ट्वीट कर रहे हैं...
    रवीश कुमार
    यह गुड साइन नहीं है. उद्योगपति गोरख पांडे की कविता पढ़ने लग जाएं...क्या पता जोश में कोई बग़ावत कर बैठे. यह सामान्य कविता नहीं है. यह जनता के लिए लिखी गई है. जब मालिक पढ़ने लगे तो समझना चाहिए कि इस बार मुक्ति की पुकार ऊपर से आ रही है. सूट-बूट वाले अपनी टाई ढीली कर रहे हैं. बोलना चाहते हैं...
  • चुभने लगी है फ़ीस की सूई छात्रों को, अब IIMC के पत्रकारों ने किया आंदोलन
    रवीश कुमार
    इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (IIMC), नई दिल्ली के छात्र ट्यूशन फीस, हॉस्टल और मेस चार्ज में बढ़ोत्तरी के खिलाफ कैंपस में 3 दिसंबर 2019 से हड़ताल कर रहे हैं.
  • PM नरेंद्र मोदी की पेशकश को सार्वजनिक कर शानदार चाल चली शरद पवार ने
    स्वाति चतुर्वेदी
    शरद पवार हमारे देश के सबसे शातिर और चतुर राजनेताओं में से एक हैं, और हर शब्द बेहद सावधानी से बोलते हैं. मोदी की ओर से 'मिलकर काम करने' के लिए कथित रूप से पिछले माह की गई पेशकश को लेकर सार्वजनिक रूप से TV इंटरव्यू में उनका बोलना सोची-समझी रणनीति थी.
  • क्या कॉर्पोरेट जगत सरकार से डरा हुआ है?
    रवीश कुमार
    एक प्रश्न है. 20 अंकों का दीर्घ उत्तरीय प्रश्न है. भय का माहौल है यह बोलने से साबित होता है या नहीं बोलने से साबित होता है. क्योंकि राहुल बजाज के बोलने के बाद कहा जाने लगा कि भय का माहौल होता तो आप बोल नहीं पाते. चूंकि आप बोल सके इसलिए भय का माहौल नहीं है. आप बोल पा रहे हैं इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अमित शाह विस्तार से जवाब दे रहे हैं. इससे साबित होता है कि भय का माहौल नहीं है.
  • हम जो समाज बना रहे हैं...
    प्रियदर्शन
    तेलंगाना रेप केस पर सदमे और गुस्से में आने से पहले सोचिए कि क्या आपके भीतर सदमे और गुस्से में आने का अधिकार बचा है? हम लगातार एक ऐसा समाज बना रहे हैं जो स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के लिए लगभग अमानवीय हुआ जा रहा है. अगर सिर्फ़ स्त्रियों की ही बात करें तो वे हमारे समाज में उपभोग के सामान में बदली जा रही हैं. विज्ञापन उद्योग उनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करता है, मनोरंजन उद्योग उनका ख़ूब खुल कर इस्तेमाल करता है. क्रिकेट और कारोबार तक की दुनिया में उनका एक सजावटी इस्तेमाल है.
  • राहुल बजाज के 'डर के माहौल' वाले बयान के बाद रवीश कुमार की चिट्ठी, CII FICCI के नाम
    रवीश कुमार
    राहुल बजाज के बयान को मामूली बताने के लिए अभी तक कुछ अख़बारों में विज्ञापन दे देना था जैसे टेक्सटाइल वालों ने विज्ञापन देकर बताया था कि कैसे उनका सेक्टर बर्बाद हो गया है. तुरंत बयान दें कि सब ठीक है और भारत सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाला देश है. जब आपकी कार की स्पीड साठ से उतर कर बीस पर आती है तब आपको पता चलता है कि कार सुपर स्पीड से चल रही है.
  • रवीश कुमार का ब्लॉग :  नोटबंदी के बाद से ही इकॉनमी पर 'दूरगामी' की बूटी पिला रही है सरकार
    रवीश कुमार
    नोटबंदी एक बोगस फ़ैसला था. अर्थव्यवस्था को दांव पर लगा कर जनता के मनोविज्ञान से खेला गया. उसी समय समझ आ गया था कि यह अर्थव्यवस्था के इतिहास का सबसे बोगस फ़ैसलों में से एक है लेकिन फिर खेल खेला गया. कहा गया कि दूरगामी परिणाम होंगे. तीन साल बाद उन दूरगामियों का पता नहीं है.
  • हैदराबाद रेप कांड की राजनीति और राजनीतिक समाज की धूर्तता
    रवीश कुमार
    24,212 बलात्कार और यौन हिंसा के मामले इस साल के पहले छह महीने में दर्ज हुए हैं. यह आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट में राज्यों के हाईकोर्ट और पुलिस प्रमुखों ने दिया. इसमें बच्चियों, किशोरियों के साथ बच्चे भी हैं लेकिन लड़कियों की संख्या अधिक है. यानी हर दिन बलात्कार और यौन हिंसा के 132 मामले होते हैं. 18 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ. क्या आप इन्हें सांप्रदायिक बना सकते हैं? जो सड़ चुके हैं उनका कुछ नहीं किया जा सकता. जो लोग ऐसी घटना के अपराधियों के मज़हब के सहारे ये खेल खेलते हैं उनका चेहरा कई बार बेनक़ाब हो चुका है.
  • रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पर शेयर की एक ज़रूरी अपील
    रवीश कुमार
    आज मैं एक लड़की, एक ज़िम्मेदार नागरिक और एक पुलिस अधिकारी होने के नाते कुछ प्रिवेंटिव एक्शन व ज़रूरी कदम सभी को सजेस्ट करना चाहती हूं, जो हर हालत में हर लड़की और उनके परिजनों तक पहुंचें.
  • अर्थव्यवस्था का बुरा हाल, गिरती विकास दर बढ़ती मुश्किलें
    रवीश कुमार
    इस साल जीडीपी की दूसरी तिमाही के आंकड़े आ गए हैं. जीडीपी दर पिछली तिमाही से भी घट गई है. 5 प्रतिशत से घट कर 4.5 प्रतिशत पर आ गई है. पिछली 26 तिमाही में यह सबसे खराब प्रदर्शन है. इसके पहले 2012-13 की मार्च तिमाही में जीडीपी 4.3 प्रतिशत हो गई थी. उस वक्त यानी 2012-13 में जीडीपी एक दशक में सबसे कम थी.
  • गोडसे को महान बताने वालों की मानसिकता क्या है?
    रवीश कुमार
    क्या आपको याद है कि भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा को भारतीय जनता पार्टी ने टिकट क्यों दिया था? साध्वी प्रज्ञा को टिकट देना बीजेपी के लिए सत्याग्रह था. अदालत के सत्य का इंतज़ार किए बग़ैर सत्याग्रह करने का यह अंदाज़ गांधी जी के सत्याग्रह की कल्पना में नहीं ही होगा. अमित शाह की कल्पना में था. आप जानते हैं कि साध्वी प्रज्ञा पर मालेगांव धमाके मामले में मामला चल रहा है और वे अभी ज़मानत पर हैं. अदालती केस को फर्जी कहने की परंपरा रही है और कई बार केस फर्जी होते भी हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि असली केस में लोग फर्जी तरीके से रिहा भी हो जाते हैं. मगर 17 मई को प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में साध्वी प्रज्ञा को टिकट दिए जाने को सत्याग्रह की बात अमित शाह ने कही थी.
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