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  • अरुण जेटली के बजट भाषण से लगा, हम भारत के लोग, टैक्स चोर हैं
    यह कहना सही नहीं लगता कि‍ नागरिक देश के लिए अपना योगदान नहीं देते. आरोप तो यह है कि देश की व्यवस्थाएं ही इस कर से देश की सेवा पूरे ईमान से नहीं कर पातीं. थोड़ा-सा व्यंग्य आपने हम पर कर दिया, चलिए, थोड़ा-सा हम भी आप पर कर देते हैं. बजट में हिसाब बराबर हुआ.
  • आम बजट 2017 के लुभावनेपन को डसता आर्थिक सर्वेक्षण का यथार्थ : 10 अहम सवाल
    आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य सरकारों द्वारा लोकलुभावन योजनाओं की होड़ की आलोचना करते हुए कहा गया कि भ्रष्टाचार और लालफीताशाही की वजह से गरीब जनता को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता. इस बार के बजट को सरकार ने 10 हिस्सों में बांटा है, जिसमें क्रियान्वयन के अहम सवालों का जवाब फिर नदारद है...
  • क्या एक साल में दस लाख खेत तालाब बनाने का वित्त मंत्री का दावा सही है?
    गांव-गांव घूमने वाला स्थानीय मीडिया भी क्या 5 से 10 लाख कृषि तालाब बनने की परिघटना को नहीं देख पाया? राष्ट्रीय मीडिया और तमाम अखबारों के पत्रकार चुनिंदा मौकों पर गांवों का दौरा करते रहते हैं, क्या उन्होंने भी नहीं देखा कि भारत एक साल के भीतर दस लाख तालाब बनाने के लक्ष्य को हासिल कर रहा है? ऐसा कैसे हो सकता है.
  • नोटबंदी के असर से परेशां अर्थव्यवस्था व आम आदमी, बजट में चाहिए राहत
    केंद्रीय बजट क्या होगा, इसका सीधा असर हमारे-आपके घरेलू बजट पर पड़ता है. इस बार आम बजट पर आम आदमी से लेकर उद्योग जगत की पेशानी पर हर बार के मुकाबले कुछ अधिक बल हैं.
  • नोटबंदी की नाकामी से परेशान दिखेगा बजट : पार्ट 2
    जिस दिन नोटबंदी का ऐलान हुआ था तब पता नही चल पा रहा था कि सरकार के मन में क्या है. लेकिन उसके कारणों को अब जरूर समझा जा सकता है. सबको पता है कि अपनी सरकार शुरू से ही जिस तरह की मुश्किल में पड़ी है उससे निजात के लिए उसे बस ढेर सारे पैसे की जरूरत थी, उसी से वादे पूरे होने थे. लेकिन नोटबंदी के जरिए ढेर सारा काला धन बरामद करने में सरकार फेल हो गई
  • बजट पर सबसे कम ध्यान रहा इस साल - भाग एक
    आमतौर पर देश के सालाना बजट पर सोचने विचारने का काम डेढ़ दो महीने पहले से शुरू हो जाता था. लेकिन इस साल नोटबंदी ने देश को इस कदर उलझाए रखा कि यह काम रह ही गया. वैसे नवंबर के दूसरे हफ्ते में नोटबंदी करते समय सरकार के सामने इस साल का बजट ही रहा होगा. सबको पता है कि पिछले साल बजट बनाने में सरकार कितनी मुश्किल में पड़ गई थी.
  • क्या उम्मीदों को पूरा करेगा आने वाला आम बजट 2017...?
    यह भी रोचक है कि बजट पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद आ रहा है, और ऐसे संकेत दिए गए हैं कि इन पांच राज्यों से संबंधित कोई विशिष्ट घोषणाएं नहीं की जाएंगी. लेकिन फिर भी, कुल मिलाकर इस बजट से देश के हर व्यक्ति को बड़ी उम्मीदें हैं, क्योंकि विमुद्रीकरण के बाद घरों के और व्यापार के बजट में आए भूचाल के बाद अब देश के बजट से ही स्थिति संभलने की उम्मीद है.
  • 1 फरवरी को पेश होने की वजह से 'खास' बजट में क्या-क्या है मुमकिन
    इस बार का बजट कैसा होना चाहिए, इसके अनुमान के लिए हमारे पास फिलहाल दो सबसे प्रमुख तत्व हैं. इनमें से एक आर्थिक है, तो दूसरा विशुद्ध राजनीतिक. आर्थिक के केंद्र में है - विमुद्रीकरण के बाद बनी देश की आर्थिक तस्वीर. राजनीतिक फ्रंट पर तात्कालिक रूप में पांच राज्यों के चुनाव हैं.
  • सरकारी कुप्रबंधन से रिज़र्व बैंक की साख पर संकट : 11 अहम सवाल...
    नोटबंदी पर सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं तथा आरटीआई के तहत आई सूचनाओं को कानून की कसौटी पर यदि परखा जाए तो स्पष्ट है कि आठ दशक में पहली बार भारत के केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता, स्वतंत्रता और दक्षता में ह्रास हुआ है.
  • नोटबंदी पर गरीबों की दुहाई देकर क्या कहना चाहते हैं पीएम मोदी
    नोटबंदी से क्या हासिल हुआ, यह 30 दिसंबर 2016 की तय समय-सीमा के दस दिन के बाद भी न रिजर्व बैंक बताने को तैयार है, न सरकार.
  • बजट 2016 : वादे पूरे करने के लिए नहीं किए गए ठोस उपाय
    यह बीजेपी सरकार का तीसरा बजट है, जो पार्टी के घोषणापत्र तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का सालाना दस्तावेज भी माना जा सकता है। राजनीतिक आग्रहों से इस बार के बजट के थीम को गांव, गरीब और किसान के लिए रखा गया है...
  • हकीकत को छिपाकर ख्वाब दिखाता बजट 2016
    विद्वानों के सोच-विचार से ही आसन्न संकट से निकलने का कोई रास्ता पकड़ में आ सकता है, वरना कहीं ऐसा न हो कि आर्थिक दुर्घटना की स्थिति में हम अफसोस मनाएं कि पहले सोचा जाना चाहिए था। वैसे संकट सिर्फ विश्लेषकों को दिख रहा है, और सरकार का काम फीलगुड से चल ही रहा है।
  • रेल बजट : सुविधा, सफाई, तकनीक और विजन 2020...
    सुरेश प्रभु जैसे पेशेवर और कुशल मंत्री से रेल बजट में विज़न की ठोस शुरुआत की उम्मीद थी, जो राजनीति के बैरियर से रुक गई लगती है। रेलमंत्री ने कहा कि मंदी के दौर से गुज़र रही दुनिया में रेलवे में सुधार की काफी गुंजाइश है, जिसकी शुरुआत करने में प्रभु अपने दूसरे बजट में भी विफल रहे हैं।
  • 'प्रभु की रेल' और आम आदमी की पिटती पैसेंजर ट्रेन...
    जनकल्याणकारी बजट वही है, जिसमें आम लोगों के लिए पूरी-पूरी गुंजाइश रखी गई हो, हालांकि अच्छी बात यह है कि इस बार किराया न बढ़ाने का संकेत ही काफी होगा। कम से कम यही काफी होगा कि 'अच्छे दिन' आएं न आएं, बुरे तो नहीं ही आएंगे। जैसे दिन गुज़र रहे हैं, वैसे ही गुज़रते रहेंगे।
  • क्या हमारे देश में अमीरी घटाए बगैर घट सकती है गरीबी...?
    जाट आंदोलन से तबाही के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री जब कह रहे थे कि सारे गरीबों को नौकरियां दे देंगे तो इस बात पर हूटिंग हुई। जनता अगर अब अविश्वसनीय वायदों के चक्कर में आने से इंकार कर रही है तो समझ जाना चाहिए कि वाजिब वायदे भी संकोच के साथ करने का समय आ गया है।
  • देश की माली हालत को लेकर ऊहापोह में तो नहीं है सरकार...?
    गुरुवार को 800 अंकों की गिरावट के कारणों पर विश्लेषक रटे-रटाए कारण ही बोलते रहे। यहां गौर करने लायक सबसे खास बात यह है कि यह बजट पेश होने का महीना है। यानी यह अंदेशा क्यों नहीं जताया जा सकता कि बजट की दिशा मोड़ने के आसान तर्क मिल गए हैं।
  • अगर आपके पास पैसा है भी, तो इस वक्त हरगिज़ मत कीजिए निवेश : अजय बग्गा
    अजय बग्गा के अनुसार, निवेशकों के लिए इस समय सरकारी बैंक विकल्प होना ही नहीं चाहिए। उन्होंने कहा, "यह फायदा देने वाला सौदा नहीं, फंसाने वाला जाल साबित होगा... सो, अगर आपके पास सरकारी बैंक के शेयर हैं भी, तो उन्हें इस वक्त बेच देने में ही समझदारी है..."
  • बजट से पहले शेयर बाजार धड़ाम : सवाल तो बनते हैं...
    हालांकि वित्त मंत्री हाल के सालों में इस बात को कहते रहे हैं कि बाज़ारों के गिरने से देश की आर्थिक व्यवस्था का कोई संकेत नहीं मिलता है लेकिन साथ ही ये बात भी हक़ीकत है कि बाज़ारों के गिरने से आर्थिक माहौल में बड़ी उथल-पुथल होती है।
  • सुधीर जैन : इस बार बजट के तराजू पर होंगे गांव और शहर
    बजट का खाका बनकर तैयार हो गया होगा। बजट पेश होने में सिर्फ तीन हफ्ते ही बचे हैं। इस लंबे चौड़े दस्तावेज में तथ्यों और आंकड़ों में किसी गलती को ठीक करने के लिए बहुत सारे अफसरों की निगाह से गुजारना पडता है। प्रूफ रीडिंग और छपाई का काम भी वक्त मांगता है।
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