NDTV Khabar
होम | बजट ब्लॉग

बजट ब्लॉग

  • सरकारी कुप्रबंधन से रिज़र्व बैंक की साख पर संकट : 11 अहम सवाल...
    नोटबंदी पर सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं तथा आरटीआई के तहत आई सूचनाओं को कानून की कसौटी पर यदि परखा जाए तो स्पष्ट है कि आठ दशक में पहली बार भारत के केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता, स्वतंत्रता और दक्षता में ह्रास हुआ है.
  • नोटबंदी पर गरीबों की दुहाई देकर क्या कहना चाहते हैं पीएम मोदी
    नोटबंदी से क्या हासिल हुआ, यह 30 दिसंबर 2016 की तय समय-सीमा के दस दिन के बाद भी न रिजर्व बैंक बताने को तैयार है, न सरकार.
  • बजट 2016 : वादे पूरे करने के लिए नहीं किए गए ठोस उपाय
    यह बीजेपी सरकार का तीसरा बजट है, जो पार्टी के घोषणापत्र तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन का सालाना दस्तावेज भी माना जा सकता है। राजनीतिक आग्रहों से इस बार के बजट के थीम को गांव, गरीब और किसान के लिए रखा गया है...
  • हकीकत को छिपाकर ख्वाब दिखाता बजट 2016
    विद्वानों के सोच-विचार से ही आसन्न संकट से निकलने का कोई रास्ता पकड़ में आ सकता है, वरना कहीं ऐसा न हो कि आर्थिक दुर्घटना की स्थिति में हम अफसोस मनाएं कि पहले सोचा जाना चाहिए था। वैसे संकट सिर्फ विश्लेषकों को दिख रहा है, और सरकार का काम फीलगुड से चल ही रहा है।
  • रेल बजट : सुविधा, सफाई, तकनीक और विजन 2020...
    सुरेश प्रभु जैसे पेशेवर और कुशल मंत्री से रेल बजट में विज़न की ठोस शुरुआत की उम्मीद थी, जो राजनीति के बैरियर से रुक गई लगती है। रेलमंत्री ने कहा कि मंदी के दौर से गुज़र रही दुनिया में रेलवे में सुधार की काफी गुंजाइश है, जिसकी शुरुआत करने में प्रभु अपने दूसरे बजट में भी विफल रहे हैं।
  • 'प्रभु की रेल' और आम आदमी की पिटती पैसेंजर ट्रेन...
    जनकल्याणकारी बजट वही है, जिसमें आम लोगों के लिए पूरी-पूरी गुंजाइश रखी गई हो, हालांकि अच्छी बात यह है कि इस बार किराया न बढ़ाने का संकेत ही काफी होगा। कम से कम यही काफी होगा कि 'अच्छे दिन' आएं न आएं, बुरे तो नहीं ही आएंगे। जैसे दिन गुज़र रहे हैं, वैसे ही गुज़रते रहेंगे।
  • क्या हमारे देश में अमीरी घटाए बगैर घट सकती है गरीबी...?
    जाट आंदोलन से तबाही के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री जब कह रहे थे कि सारे गरीबों को नौकरियां दे देंगे तो इस बात पर हूटिंग हुई। जनता अगर अब अविश्वसनीय वायदों के चक्कर में आने से इंकार कर रही है तो समझ जाना चाहिए कि वाजिब वायदे भी संकोच के साथ करने का समय आ गया है।
  • देश की माली हालत को लेकर ऊहापोह में तो नहीं है सरकार...?
    गुरुवार को 800 अंकों की गिरावट के कारणों पर विश्लेषक रटे-रटाए कारण ही बोलते रहे। यहां गौर करने लायक सबसे खास बात यह है कि यह बजट पेश होने का महीना है। यानी यह अंदेशा क्यों नहीं जताया जा सकता कि बजट की दिशा मोड़ने के आसान तर्क मिल गए हैं।
  • अगर आपके पास पैसा है भी, तो इस वक्त हरगिज़ मत कीजिए निवेश : अजय बग्गा
    अजय बग्गा के अनुसार, निवेशकों के लिए इस समय सरकारी बैंक विकल्प होना ही नहीं चाहिए। उन्होंने कहा, "यह फायदा देने वाला सौदा नहीं, फंसाने वाला जाल साबित होगा... सो, अगर आपके पास सरकारी बैंक के शेयर हैं भी, तो उन्हें इस वक्त बेच देने में ही समझदारी है..."
  • बजट से पहले शेयर बाजार धड़ाम : सवाल तो बनते हैं...
    हालांकि वित्त मंत्री हाल के सालों में इस बात को कहते रहे हैं कि बाज़ारों के गिरने से देश की आर्थिक व्यवस्था का कोई संकेत नहीं मिलता है लेकिन साथ ही ये बात भी हक़ीकत है कि बाज़ारों के गिरने से आर्थिक माहौल में बड़ी उथल-पुथल होती है।
  • सुधीर जैन : इस बार बजट के तराजू पर होंगे गांव और शहर
    बजट का खाका बनकर तैयार हो गया होगा। बजट पेश होने में सिर्फ तीन हफ्ते ही बचे हैं। इस लंबे चौड़े दस्तावेज में तथ्यों और आंकड़ों में किसी गलती को ठीक करने के लिए बहुत सारे अफसरों की निगाह से गुजारना पडता है। प्रूफ रीडिंग और छपाई का काम भी वक्त मांगता है।
«123456»

Advertisement