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बजट ब्लॉग

  • क्या हमारे देश में अमीरी घटाए बगैर घट सकती है गरीबी...?
    जाट आंदोलन से तबाही के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री जब कह रहे थे कि सारे गरीबों को नौकरियां दे देंगे तो इस बात पर हूटिंग हुई। जनता अगर अब अविश्वसनीय वायदों के चक्कर में आने से इंकार कर रही है तो समझ जाना चाहिए कि वाजिब वायदे भी संकोच के साथ करने का समय आ गया है।
  • देश की माली हालत को लेकर ऊहापोह में तो नहीं है सरकार...?
    गुरुवार को 800 अंकों की गिरावट के कारणों पर विश्लेषक रटे-रटाए कारण ही बोलते रहे। यहां गौर करने लायक सबसे खास बात यह है कि यह बजट पेश होने का महीना है। यानी यह अंदेशा क्यों नहीं जताया जा सकता कि बजट की दिशा मोड़ने के आसान तर्क मिल गए हैं।
  • अगर आपके पास पैसा है भी, तो इस वक्त हरगिज़ मत कीजिए निवेश : अजय बग्गा
    अजय बग्गा के अनुसार, निवेशकों के लिए इस समय सरकारी बैंक विकल्प होना ही नहीं चाहिए। उन्होंने कहा, "यह फायदा देने वाला सौदा नहीं, फंसाने वाला जाल साबित होगा... सो, अगर आपके पास सरकारी बैंक के शेयर हैं भी, तो उन्हें इस वक्त बेच देने में ही समझदारी है..."
  • बजट से पहले शेयर बाजार धड़ाम : सवाल तो बनते हैं...
    हालांकि वित्त मंत्री हाल के सालों में इस बात को कहते रहे हैं कि बाज़ारों के गिरने से देश की आर्थिक व्यवस्था का कोई संकेत नहीं मिलता है लेकिन साथ ही ये बात भी हक़ीकत है कि बाज़ारों के गिरने से आर्थिक माहौल में बड़ी उथल-पुथल होती है।
  • सुधीर जैन : इस बार बजट के तराजू पर होंगे गांव और शहर
    बजट का खाका बनकर तैयार हो गया होगा। बजट पेश होने में सिर्फ तीन हफ्ते ही बचे हैं। इस लंबे चौड़े दस्तावेज में तथ्यों और आंकड़ों में किसी गलती को ठीक करने के लिए बहुत सारे अफसरों की निगाह से गुजारना पडता है। प्रूफ रीडिंग और छपाई का काम भी वक्त मांगता है।
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