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बात रुपए पैसे की : सामान्य सी लगने वाली 6 गलतियां, जो आपको डुबा सकती हैं...

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बात रुपए पैसे की : सामान्य सी लगने वाली 6 गलतियां, जो आपको डुबा सकती हैं...

फाइनैंशल प्लानिंग : सामान्य सी लगने वाली 6 गलतियां, जो आपको डुबा सकती हैं... (प्रतीकात्मक फोटो)

खास बातें

  1. पैसा कम कमाते हों या अच्छा खासा, पैसे का मैनेजमेंट बेहद जरूरी
  2. कर्ज कम से कम लें, रिटायरमेंट की प्लानिंग करें, टैक्स प्लानिंग भी करें
  3. ऐसी ही कुछ जरूरी बातों पर आइए आज चर्चा करें
नई दिल्ली:

कहते हैं, पैसा हाथ का मैल है. लेकिन यह भी सच है कि हर कोई 'इस' हाथ के मैल को अपने पास रखना चाहता है और अपनी जरूरत और इच्छानुसार इस्तेमाल करना चाहता है. ऐसे में कई बार यह भी होता है कि जाने अनजाने कुछ ऐसी गलतियां हम कर बैठते हैं कि पैसा मुट्ठी से रेत की तरह फिसलने लगता है. यदि कुछ आदतों को न अपनाया जाए और कुछ आदतों पर लगाम न लगाई जाए तो फाइनैंशली आप मुश्किल में पड़ सकते हैं.

चलिए ऐसे ही कुछ जरूरी बिन्दुओं पर आज चर्चा करें:

कहीं ऐसा तो नहीं कि आपका कुल खर्च आपकी कुल आय से अधिक है? आपकी खर्च की टैंडेंसी क्या है? क्या आप अपनी कमाई को पूरा का पूरा खर्च डालते हैं? यदि आप उन लोगों में से हैं जिन्हें अपनी जीवनशैली को बनाए रखने के लिए अक्सर पर्सनल लोन लेना पड़ता है तो वह दिन दूर नहीं जब आप जल्द ही कर्ज के जंजाल में फंस जाएंगे. आदर्श स्थिति (व्यावहारिक भी) यह है कि अपनी कुल मासिक आय में से एक निश्चित रकम ही अपने दैनिक खर्चों और अन्य खर्चों के लिए रखी जाए, और आय में से एक निश्चित हिस्सा सेविंग व इन्वेस्टमेंट के लिए अलग रखी जाए. इस रकम को आप खर्च नहीं करें, बल्कि निवेश या बचत के किसी न किसी रूप में लगाएं. बुजुर्गों का यह उसूल, चादर देखकर पांव फैलाएं, वित्तीय योजना बनाते समय बेहद काम का सूत्र साबित होता है.

रिटायरमेंट की प्लानिंग की है? वैसे तो हममे से ज्यादातर लोग कहते हैं कि वह कभी रिटायर नहीं होना चाहते. पर वास्तविक जीवन में हम सब जानते हैं कि उम्र का एक दौर ऐसा भी आता है जब हम मेहनत करके कमा नहीं सकते हैं. ऐसे में सही वक्त पर की गई रिटायरमेंट प्लानिंग बुढ़ापे में काम ही आएगी. अपनी सालाना आय का कुछ हिस्सा या मासिक किस्त के तौर पर या तिमाही या छमाही, जो भी आपके लिए कर पाना सरल और संभव हो, रिटायरमेंट प्लानिंग के नाम पर बचाएं. इसे किसी सुरक्षित पेंशन फंड में डालें. यदि आप नौकरीशुदा हैं तो हो सकता है कि आपका ग्रैच्युटी फंड हो, ग्रैच्युटी फंड है या नहीं, यह आपकी कंपनी (सरकारी या गैर सरकारी) के नियम पर निर्भर करता है, ऐसे में यह भी आपके बुढ़ापे के लिए एक मजबूत सहारा साबित हो सकता है. साथ ही कुछ पैसा पीपीएफ, पब्लिक प्रॉविडेंट फंड जैसे ऑप्शन में भी डाल सकते हैं. (यह भी पढ़ें- सातवां वेतन आयोग : डबल हुई ग्रैच्युटी, इस पैसे का समझदारी भरा इस्तेमाल ऐसे करें)


कहीं आपको कर्ज लेने की आदत तो नहीं? कहा जा सकता है कि जरूरत पड़ने पर ही कर्ज लिया जाता है. यह सही है कि कर्ज पैसे की कमी पर ही लिया जाता है लेकिन ऐसे कर्ज सही नहीं ठहराए जा सकते जब आप अपनी एक गाड़ी पर ऑटो लोन जारी रहने के साथ ही दूसरी गाड़ी एक और ऑटो लोन लेकर खरीदना चाहें. क्योंकि हरेक लोन बाद में चुकाया भी जाना है और हरेक लोन पर ब्याज की निश्चित दर लगती है जो आपको अपनी कुल आय में से ही चुकाना है. दिन प्रतिदिन के खर्चों के लिए पर्सनल लोन लेना लंबे समय के लिए कर्ज के जंजाल में फंसाए रख सकता है.

देखा गया है कि नियमित नौकरीशुदा लोग आपातकालीन फंड को लेकर उदासीन रहते हैं. जबकि, यह एक गंभीर और महत्वपूर्ण कदम है. क्या आपने इमर्जेंसी फंड बनाया है? नौकरी जाने, सैलरी कटने या फिर अर्थव्यवस्था की उथल पुथल के दौर में यही आपातकालीन फंड आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. स्वास्थ्य संबंधी जरूरत के लिए अचानक कैश की जरूरत पड़ सकती है. किसी कारण अचानक लंबी या महंगी यात्रा करनी पड़ सकती है. ऐसे में यही आपातकालीv रकम आपके लिए सहारे की लाठी साबित होगी. दरअसल इमर्जेंसी फंड नकदी का वह स्टॉक होता है जिसे आप खर्च में नहीं लाते हैं और तुरंत पड़ने वाली किसी बड़ी जरूरत के समय इस्तेमाल कर सकते हैं. इस फंड को इग्नोर करना या हल्के में लेना सही फैसला नहीं कहा जा सकता.

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आपने जो कुछ कमाया हैऔर बचाया है वह एक झटके में आपके हाथ से निकल सकता है यदि आपने कोई इंश्योरेंस कवर नहीं लिया है. इसी के साथ जो भी इंश्योरेंस पॉलिसी लें, वह आपकी जरूरतें कवर करता हो. किसी तरह के डैमेज या चोट लगने की स्थिति में यही इंश्योरेंस कवर आपके काम आता है. हेल्थ इंश्योरेंस चोट लगने या बीमारी की दशा में आपको लंबे चौड़े मेडिकल बिलों के बोझ से बचाएगा. साथ ही, ऑटो, हाउस या अन्य प्रकार के इंश्योरेंस आपको इन चीजों के डैमेज या चोरी की दशा में काम आ सकते हैं. ऐसे में इंश्योरेंस जरूरी है कि सही लिया जाए और जरूर ही लिया जाए.

वित्तीय योजना न बनाना सबकुछ गंवाने की दिशा में एक कदम है, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी. अपने शॉर्ट टर्म, मिडल टर्म और लॉन्ग टर्म लक्ष्य तय करें और उसी के हिसाब से सेविंग और इंवेस्टमेंट भी करें. इसके लिए किसी फाइनैंशल प्लानर की मदद भी ले सकते हैं. साथ ही समय समय पर अपने लक्ष्य की दिशा में अपनी खुद की प्रोग्रेस भी चेक करते चलें. क्या कमी है और कितना बेहतर कर रहे हैं, उसी के हिसाब से अपनी कोशिशों में परिवर्तन आदि करें. अपने पति या पत्नी को भी पैसे संबंधी मामलों से अपडेट रखें और उनसे डिस्कस करके फैसले लेना हमेशा बेहतर होगा. टैक्स प्लानिंग भी आपकी फाइनैंशल प्लानिंग का हिस्सा होनी चाहिए.

 
(प्रतीकात्मक फोटो)


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