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डिजिटल मीडिया विज्ञापन में पारंपरिक मीडिया का हिस्सा मार रहा है

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नई दिल्ली:

डिजिटल मीडिया में विज्ञापन पर खर्च पिछले कुछ साल में तेजी से बढ़ा है और यह रुझान अभी जारी रह सकता है क्योंकि इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या बहुज तेजी से बढ़ रही है।

बावजूद इसके पत्र पत्रिकाओं व टेलीविजन के विज्ञापन बाजार के लिए फौरी तौर पर कोई खतरा नहीं है। यह बात विशेषज्ञों ने कही है।

आईआईएफएल इंस्टीच्यूशनल इक्विटीज की एक रपट के मुताबिक मध्यम अवधि में विज्ञापन बजट में टीवी और प्रिंट का योगदान अधिक रहेगा जबकि डिजिटल विज्ञापन की भूमिका पूरक की रहेगी। लेकिन डिजिटल विज्ञापन तेजी से अपना विस्तार कर रहा है।

रपट में कहा गया कि कुल विज्ञापन खर्च में डिजिटल माध्यमों में विज्ञापनों पर का हिस्सा सात प्रतिशत तक पहुंच गया है जो 2003 में यह एक प्रतिशत था।

आईआईएफएल की रपट में कहा गया कि डिजिटल माध्यमों के उभार से दीर्घकाल में पत्र पत्रिकारों को विज्ञापन आय का उल्लेखनीय नुकसान होगा। इसमें क्षेत्रीय भाषाओं की पत्र पत्रिकाओं की तुलना में अंग्रेजी अखबरों और पत्रिकाओं का नुकासान अधिक होगा। साल 2003-07 के दौरान प्रिंट मीडिया में विज्ञापन खर्च की वृद्धि दर में तेज गिरावट आयी और यह सालाना 16 प्रतिशत से घटकर मात्र 4.5 प्रतिशत रह गई है।

यह नरमी भारतीय भाषाओं के मुकाबले अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं के मामले में ज्यादा है। हालांकि टीवी विज्ञापनदाताओं के लिए पसंदीदा विकल्प बना रहेगा क्योंकि इसके दर्शकों की संख्या, उनका विस्तार और विविधता बहुत अधिक है।

आईआईएफएल इक्विटीज के बिजल शाह और जयकुमार दोषी के मुताबिक इंटरनेट मीडिया का पत्र पत्रिकाओं के मुकाबले टेलीविजन असर कम होगा। पिछले 10 साल में विज्ञापन पर हुए खर्च के विश्लेषण से पता चलता है पत्र पत्रिकाओं के विज्ञापनों पर खर्च आर्थिक वृद्धि के प्रति ज्यादा लोचदार है, यानि आर्थिक वृद्धि तेज होने पर विज्ञापन ज्यादा आता है और कम होने पर कम आता है।

आम चुनाव के बाद सरकार का विज्ञापन पर होने वाले खर्च में धीरे-धीरे कमी आएगी ऐसे में यदि आर्थिक वृद्धि में तेजी नहीं आई तो 2014-15 में पिंट्र मीडिया पर होने वाला खर्च हल्का ही रह सकता है।

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