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मंडी में हो रही किसानों से कमीशन की वसूली

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मंडी में हो रही किसानों से कमीशन की वसूली
नई दिल्ली:

हमारे देश में किसानों की हालत बहुत दयनीय मानी गई है और शायद इसीलिए किसानों पर इनकम टैक्स नहीं लगता यानी हमारे देश में खेती से होने वाली आमदनी को टैक्स से मुक्त रखा गया है। लेकिन जरा देखिए देश की राजधानी में किसानों के साथ क्या हो रहा है।

देश की सबसे बड़ी मंडी आजादपुर में किसानों से उनकी उपज बिकवाने के बदले में आढ़ती उनसे कमीशन वसूलते हैं, जिसको आढ़त कहते हैं। आढ़त यानी आढ़ती का वह कमीशन, जो उसको किसान और खरीदार का सौदा करवाने के एवज में मिलता है।

वैसे तो पूरे देश में किसान से कहीं भी कमीशन नहीं लिया जाता, लेकिन कुछ समय पहले तक दिल्ली की आजादपुर मंडी और बाकी मंडियों में किसानों से छह फीसदी तक का कमीशन वैध था। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह तय हुआ कि दिल्ली में भी अब किसानों से कोई कमीशन नहीं लिया जाएगा। कमीशन केवल खरीदारों से लिया जा सकता है, वह भी छह फीसदी तक।

दिल्ली के बख्तावरपुर गांव के किसान राजपाल ने बताया कि वह मंडी में आढ़ती को छह फीसदी आढ़त देने को मजबूर हैं। राजपाल ने कहा कि उनको पता है कि कानूनन आढ़त खरीदार से ही ली जा सकती है, फिर भी वह आढ़ती को कमीशन देने को मजबूर हैं। अगर वह आढ़ती का विरोध करेंगे, तो आढ़ती कह देगा कि आप अपना माल मेरे यहां से उठाओ और कहीं और बेच लो। सारे आढ़ती ही कमीशन वसूलते हैं। यदि बेचने में ज्यादा देर हुई, तो सब्जियों के खराब होने का भी डर रहता है।

किसानों के हितों की रक्षा के लिए मंडी समिति यानी एपीएमसी है। एपीएमसी सदस्य बिजेंद्र त्यागी कहते हैं कि उन्होंने खुद इस बारे में समिति में शिकायत की है, लेकिन अफसर कार्रवाई करने को तैयार ही नहीं हैं। त्यागी बताते हैं कि मंडी में क्या हो रहा है, यह सबको पता है, लेकिन फिर भी सब कुछ जारी है। एपीएमसी के सदस्य राजेंद्र शर्मा के मुताबिक किसानों से अवैध आढ़त वसूली सब्जियों में छह फीसदी तक है, जबकि फलों में यह 12 फीसदी तक है। किसानों से तो अवैध वसूली हो ही रही है, साथ ही खरीदार से भी चुंगी के नाम पर बिना किसी लिखा-पढ़ी के वसूली की जा रही है, जिसको चुंगी कहते हैं।

राजेंद्र शर्मा के मुताबिक कुल मिलाकर सालाना करीब 1,000 करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार अकेले आजादपुर मंडी में हो रहा है। एपीएमसी दिखावे के लिए कोई कार्रवाई कभी-कभार कर देती है, लेकिन सरकार की कोई मंशा इस भ्रष्टाचार को रोकने की नजर नहीं आती। उल्लेखनीय है कि इस साल फरवरी में जब आढ़तियों पर किसान की बजाय खरीदार से कमीशन वसूलने का दबाव बना, तो आढ़तियों ने मंडी में हड़ताल कर दी थी।

सरकार ने आलू, प्याज पर स्टॉक लिमिट लगाने का ऐलान किया था, जिसका महीने भर बाद भी अता पता नहीं। सरकार ने हाल ही में एपीएमसी कानून में बदलाव कर फल−सब्जी को डी−लिस्ट करने के बात कही थी, लेकिन आढ़तियों के दबाव में मंडियां पुराने ढर्रे पर चल रही हैं।

कहा जा रहा है कि पुरानी मंडियों में काम जैसा चल रहा है, वैसा चलता रहेगा और नई मंडियां बनाई जाएंगी, जिससे किसान अपना माल बिना आढ़ती की भूमिका के मंडी में बेच पाए और महंगाई कम हो पाए। जाने कब मंडी बनेगी, कहां बनेगी, कौन बनाएगा, कौन चलाएगा... यह विडंबना ही है कि हम किसान को अन्नदाता कहते हैं। जय जवान, जय किसान का नारा लगाते हैं, चुनावों में किसानों से खूब लुभावने वादे करते हैं, लेकिन हालत यह है कि किसान अपनी उपज बेचने के लिए भी कमीशन दे रहा है।

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