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देश में सर्वाधिक एफडीआई का सच क्या है? एक विश्लेषण

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देश में सर्वाधिक एफडीआई का सच क्या है? एक विश्लेषण

प्रतीकात्मक चित्र

खास बातें

  1. 15 साल में देश के भीतर करीब 28 लाख करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी निवेश
  2. विदेशी कंपनियां अक्सर देश से ही कमाये पैसे को ही दोबारा लगाती हैं
  3. पिछले 16 साल में एफडीआई के नाम 50% पूंजी सिंगापूर-मॉरिशस के रास्ते आई
नई दिल्ली:

भारत में तमाम क्षेत्रों में विदेशी निवेश यानी एफडीआई के लिए नियमों में छूट देने और निवेश की सीमा बढ़ाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत आज देश की सबसे खुली अर्थव्यवस्था है। इससे देश में विदेशी पैसा आएगा और लोगों को नौकरियां मिलेंगी लेकिन, एफडीआई का सच क्या है?

सोमवार को वित्तमंत्री जेटली के बयान और प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट से विदेशी निवेश को लेकर एक बहुत आशावादी तस्वीर बनी। भारत ने नौ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई और नियमों को आसान किया है। इसी के साथ सरकार ने देश में रिकॉर्ड एफडीआई लाने का दावा किया है।

भारत में पिछले 16 सालों में करीब 424.16 बिलियन डॉलर यानी 28.5 लाख करोड़ रुपये का विदेशी निवेश हुआ है। वाणिज्य मंत्रालय की वेबसाइट कहती है कि इस साल यानी 2015-16 में 55 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश आया यानी करीब 3,72,075 करोड़ रुपये। जबकि पिछले साल यानी 2014-15 में ये आंकड़ा करीब 45 बिलियन डॉलर यानी 3,04,425 करोड़ रुपये। एक साल में ही विदेशी निवेश में करीब 10 बिलियन डॉलर यानी 68 हज़ार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है।


एफडीआई का ग्राफ 2006-07 में अचानक बढ़ा जब भारत में विदेशी मुद्रा 8.9 बिलयन डॉलर से 22.8 बिलियन डॉलर हो गई। अगर कागज़ों पर नज़र डालें को आंकड़ों के हिसाब से एफडीआई के मामले में एक बहुत हौसला बढ़ाने वाले तस्वीर पेश होती है। लेकिन असल हकीकत क्या है? जितना विदेशी निवेश सरकार लाने का वादा करती है क्या उससे हमारा देश अमीर हो रहा है और लोगों को नौकरियां मिल रही है।

एफडीआई पर रिसर्च कर रहे प्रो. के एस चलपति राव का बयान
इंस्टिट्यूट फॉर स्टडीज़ इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट यानी ISID के प्रोफसर और एफडीआई पर रिसर्च कर रहे प्रो. के एस चलपति राव कहते हैं, ‘हमें ये समझना होगा कि एफडीआई आखिर क्या है? उसकी परिभाषा क्या है? एफडीआई की तस्वीर में भारत जैसे देश में कई अस्पष्ट (ग्रे एरिया) हिस्से हैं। मुझे लगता है कि आधे से अधिक पैसा जिसे एफडीआई कहा जाता है वह एफडीआई है ही नहीं।’

प्रो. राव एफडीआई की जिस परिभाषा का ज़िक्र कर रहे हैं असल में वह आम आदमी की समझ में नहीं आती। FDI या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी एक देश में काम कर रही कंपनी या व्यापारिक संस्थान या फर्म की ओर से किसी दूसरे देश की कंपनी में किये गये निवेश को कहते हैं। लेकिन जिस ग्रे एरिया की बात प्रो राव कह रहे हैं उसे समझना ज़रूरी है। एक विदेशी कंपनी अगर बहुत थोड़े वक्त के लिये किसी कंपनी में पैसा लगाती है और बाज़ार के रुख का फायदा उठाकर पैसा कमाकर निकल जाती है तो उसे FDI नहीं कहा जा सकता।

15 साल में देश के भीतर करीब 28 लाख करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी निवेश हुआ
सरकार की अपनी वेबसाइट के मुताबिक पिछले 15 साल में देश के भीतर करीब 28 लाख करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी निवेश हुआ लेकिन रिसर्च बताता है कि इसमें से 57 फीसद हिस्सा ऐसा है जिसे एफडीआई कहे जाने पर ही विवाद है। जो लोग देश में आ रहे विदेशी निवेश और औद्योगिक क्षेत्र पर शोध कर रहे हैं उनका कहना है कि अक्सर एफडीआई के नाम पर जो पैसा लाया जाता है वह हमारे देश की तरक्की के लिए नहीं बल्कि विदेशी कंपनियां अपनी शॉर्ट टर्म मुनाफाखोरी के लिए लाती हैं।

एफडीआई पर रिसर्च कर रहे प्रो. बिश्वजीत धर का बयान
पिछले कई सालों से एफडीआई पर रिसर्च कर रहे प्रो. बिश्वजीत धर कहते हैं कि, ‘एफडीआई को हम लान्गटर्म इन्वेस्टमेंट मानते हैं लेकिन वैसा निवेश अभी आ नहीं रहा है। हमारा रिसर्च बताता है कि करीब 50 फीसद से कम ही है जो लंबे वक्त का निवेश (long term investment) है बाकी पैसा तो सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए है और निवेशक पैसा बना कर निकल जाते हैं।

असल में एफडीआई के पीछे जो सोच या मकसद होता है उसके ज़रिये रोज़गार पैदा करने के अलावा, टेक्नोलॉज़ी हासिल करना, नए उद्योग धन्धे स्थापित करना और फिर उससे निर्यात बढ़ा कर विदेशी मुद्रा की कमाई करना है। उसके अलावा विदेशी कंपनियों के अनुभव से प्रबंधन की कौशल हासिल करना है।
विदेशी कंपनियां अक्सर हमारे देश से ही कमाये गये पैसे को ही दोबारा यहां निवेश करती हैं
लेकिन जिस तरह से एफडीआई का एक बड़ा हिस्सा आता है या फिर उसे एफडीआई कहा जाता है उससे क्या ये लक्ष्य हासिल हो रहे हैं। मिसाल के तौर पर विदेशी कंपनियां अक्सर हमारे देश से ही कमाये गये पैसे को ही दोबारा यहां निवेश करती हैं जिसे एफडीआई के तौर पर दिखाया जाता है। यानी असल में कोई विदेशी पूंजी नहीं आती बल्कि वह निवेश यहीं पर की गई कमाई है। इसके दोबारा निवेश होने से कंपनियां फिर उस पैसे पर अधिक कमाई करती हैं।

इसके अलावा विदेशी कंपनियां जब भारतीय कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदती हैं तो उस रकम को भी विदेशी निवेश में गिना जाता है। इस मर्जर एंड एक्विज़िशन में केवल कंपनी का मालिकाना हक बदलता है। जानकारों के मुताबिक कम से कम शुरुआत में देश को इससे एफडीआई का वास्तविक फायदा नहीं होता। प्रो धर बताते हैं कि 2004 से 2015 तक 10 सालों में विदेशी निवेश का करीब 57 प्रतिशत हिस्सा ऐसा ही पैसा था। इसके अलावा कई बार कंपनियां भारतीय बैंकों से कर्ज़ लेकर उसका निवेश एफडीआई के रूप में कर देती हैं।

इसके अलावा देसी कंपनियां एफडीआई के नाम पर मॉरीशस और सिंगापुर के रास्ते पैसा वापस भारत में लाती हैं उसे भी एफडीआई कहा जाता है। इस पैसे को लेकर काफी विवाद रहा है। सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि पिछले 16 सालों में करीब 49 प्रतिशत एफडीआई सिंगापुर और मॉरीशस से आया।

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एफडीआई से कितनी नौकरियां लोगों को मिली, कोई आंकड़ा नहीं
सरकार एफडीआई के ज़रिये रोज़गार बढ़ाने का दावा करती है लेकिन ये पता करने का कोई ज़रिया नहीं है या कोई ऐसा आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जिससे ये पता चल सके कि एफडीआई से कितनी नौकरियां लोगों को मिली। एफडीआई के पक्षधर और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के राजीव कुमार भी मानते हैं कि ये एक बहुत बड़ी कमी है। कुमार का कहना है कि लोगों को ये जानने का हक है कि विदेशी निवेश से कितने लोगों को नौकरियां मिली लेकिन अभी तक इस तरह का कोई डाटाबेस तैयार नहीं है।

एफडीआई का असल फायदा हासिल करने के लिये विदेशी पूंजी के लिये बाज़ार खोलना काफी नहीं है बल्कि पूरे माहौल भारत के हिसाब से ढालने और लंबे निवेश के लिए ज़मीनी हालात तैयार करने की बड़ी ज़रूरत है। चीन की मिसाल हमारे सामने है जिसने निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाकर विदेशी टेक्नोलॉजी और महारत हासिल की है। और आज वहां सालाना अमेरिका के मुकाबले डेढ़ गुना पेटेंट किए जा रहे हैं।



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