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नोटबंदी है 'सफल राजनीतिक पासापलट' : फ्रांसीसी अर्थशास्त्री गाय सॉरमैन

नोटबंदी 'सफल राजनीतिक तख्तापलट' है. विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी अर्थशास्त्र गाय सॉरमैन ने यह कहा है. उन्होंने यह भी कहा है कि यह भ्रष्टाचार का समूल सफाया करने के अपने उद्देश्य को पूरा करने में विफल रही.

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नोटबंदी है 'सफल राजनीतिक पासापलट' : फ्रांसीसी अर्थशास्त्री गाय सॉरमैन

नोटबंदी है 'सफल राजनीतिक पासापलट' : फ्रांसीसी अर्थशास्त्री गाय सॉरमैन- प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली: नोटबंदी 'सफल राजनीतिक तख्तापलट' है. विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी अर्थशास्त्र गाय सॉरमैन ने यह कहा है. उन्होंने यह भी कहा है कि यह भ्रष्टाचार का समूल सफाया करने के अपने उद्देश्य को पूरा करने में विफल रही. सॉरमैन का मानना है कि भ्रष्टाचार के सफाए के लिए अभी और कदम उठाए जाने की जरूरत है.

सॉरमैन ने कहा, ‘नोटबंदी एक सफल राजनीतिक तख्तापलट था जिसकी बहुसंख्यक भारतीयों ने सराहना की. सरकार ने दिखाया किया कि वह भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर है.’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कालाधन, जाली नोट और भ्रष्टाचार पर एक बड़े प्रहार के तहत पिछले साल आठ नवंबर को 500 और 1000 के नोटों को अमान्य करार करने की घोषणा की थी.

सॉरमैन ने कहा, ‘इसी के साथ उसने वाणिज्यि लेन-देन को बाधित किया है तथा बड़े स्तर पर अर्थव्यवस्था की गति धीमी कर दी लेकिन क्या इसने भ्रष्टाचार रोका? वाकई नहीं.’ ‘इकोनोमिक्स डज नॉट लाइ : ए डिफेंस ऑफ फ्री मार्केट इन टाइम ऑफ क्राइसिस’ समेत कई किताबें लिख चुके इन फ्रांसीसी अर्थशास्त्री ने कहा, ‘खेल के नये नियमों के हिसाब से भ्रष्टाचार के तौर तरीके के बदले गए हैं.’ नोटबंदी के पश्चात भाजपा नीत राजग सरकार ने कई स्थानीय निकायों और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव जीता.

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सॉरमैन ने यह भी कहा कि सरकार भ्रष्टाचार की मूल वजह यानी अत्यधिक विनियमन के खिलाफ कदम उठा नहीं पायी यानी, इन विनियमों की वजह से किसी भी स्तर पर नौकरशाहों को अदम्य ताकत मिल जाती है. हालांकि उन्होंने मोदी सरकार की इस समझ के लिए सराहना की कि वृद्धि को बढ़ावा देने का सबसे अच्छा तरीका भारतीय उद्यमियों, बड़ी कंपनियों और नये एवं छोटे पूंजीपतियों को कल्पना एवं नवोन्मेष की आजादी देना है.

हालांकि उनका कहना था कि बुनियादी ढांचे की कमी, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय नौकरशाही से मदद नहीं मिलती. उन्होंने कहा, ‘कभी कभी मोदी अर्थव्यवस्था को अनुमान के हिसाब मदद पहुंचाने के बजाय राजनीतिक और प्रतीकात्मक लाभ लेने में ज्यादा रूचि लेते हुए जान पड़ते हैं.’
 


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