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मंत्रालय चाहता है कैग केजी-डी6 की वित्तीय लेखापरीक्षा तक ही सीमित रहे

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  1. कैग और निजी क्षेत्र की रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच केजी डी6 गैस क्षेत्र की लेखापरीक्षा को लेकर उठे मतभेद के बाद समझा जाता है कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने कैग को क्षेत्र के कार्य निष्पादन की नहीं बल्कि इस पर हुए खर्च की लेखापरीक्षा तक ही सीमित रहने की सलाह दी ह
नई दिल्ली: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) और निजी क्षेत्र की रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच केजी डी6 गैस क्षेत्र की लेखापरीक्षा को लेकर उठे मतभेद के बाद समझा जाता है कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने कैग को क्षेत्र के कार्य निष्पादन की नहीं बल्कि इस पर हुए खर्च की लेखापरीक्षा तक ही सीमित रहने की सलाह दी है।

रिलायंस के साथ लेखापरीक्षा को लेकर मतभेद खड़े होने के बाद कैग ने केजी डी6 की लेखापरीक्षा रोक दी। यह मतभेद क्षेत्र की लेखापरीक्षा के विस्तार और दायरे के मुद्दे को लेकर खड़े हुए हैं। समझा जाता है कि पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसी सप्ताह कैग को एक पत्र लिखकर लेखापरीक्षा के दायरे पर स्थिति स्पष्ट की है।

सूत्रों के अनुसार मंत्रालय ने कैग को पत्र लिखकर आग्रह किया है वह केजी डी6 ब्लॉक के 2008-09 से लेकर 2011-12 के खर्च की लेखापरीक्षा सी एण्ड एजी (डीपीसी) अधिनियम 1971 की धारा 20 के तहत करे।

मंत्रालय के मुताबिक लेखा परीक्षण का दायरा और तरीका धारा 25.5 और 25.6 और सरकार के साथ आरआईएल ने जो उत्पादन बंटवारा अनुबंध किया है उसके परिशिष्ट सी की व्याख्या के अनुरूप होगा।

अनुबंध के इन प्रावधानों में सरकार को एक लेखा परीक्षक नियुक्त करने का अधिकार है जो लागत, व्यय, खर्च, प्राप्ति और आय से जुड़े सभी रिकॉर्ड और दस्तावेज की जांच और लेखा परीक्षण करेगा। इसमें सभी शुल्कों और रिण के औचित्य की जांच का अधिकार है। यह एक तरह से पूरी तरह वित्तीय लेखा परीक्षा होगी।

कैग इसके अलावा कार्य निष्पादन लेखा परीक्षण करना चाहता है जिसके तहत सरकारी संसाधान के इस्तेमाल में किफायत, दक्षता और संसाधनों के इस्तेमाल की कारगरता को भी देखा जाएगा।

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रिलायंस का इस बात पर जोर रहा है कि कैग को केवल वित्तीय लेखापरीक्षा ही करनी चाहिये। सरकारी लेखापरीक्षक को कार्य निष्पादन की लेखापरीक्षा नहीं। यही वजह है कि रिलायंस ने जनवरी में संबंधित दस्तावेज देने से भी इनकार कर दिया था।

इसके बाद कैग ने क्षेत्र की लेखापरीक्षा का काम रोक दिया। मंत्रालय ने रिलायंस को लिखित में आश्वासन दिया था कि लेखापरीक्षा समझौते के अनुरूप ही होगी। समझा जाता है कि मंत्रालय अब मामले को सुलझाने में लगा है।


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