'जुमलों वाला नहीं, कायाकल्प करने वाला' चाहिए रेल बजट

नई दिल्ली : रेल बजट 2015 से ठीक पहले रेलमंत्री सुरेश प्रभु को हर कोई सलाह देता नजर आ रहा है, और सोशल मीडिया पर ऐसे ही संदेशों की बाढ़-सी आई हुई है... सो, आइए एक नज़र डालते हैं, उन सुझावों और प्रतिक्रियाओं पर, जो आम जनता ने रेलमंत्री तक पहुंचाने की कोशिश की है...

माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर @mamtabhatt ने लिखा है, "रेल बजट से हमारी क्या उम्मीदें हैं, टॉयलेट्स क्लीन हों... स्वच्छ भारत अभियान को इस दिशा में भी काम करना चाहिए..."

ट्विटर पर ही @SauravShekhar के मुताबिक, "रेल बजट में पीपीपी द्वारा भारी निजी निवेश की जरूरत है... तभी रेलवे की हालत सुधरेगी..." जबकि @rawatneer54 का रेलमंत्री से आग्रह है, "जनरल डिब्बे में भी चार्जर लगवाइए..."

उधर, @TewariAlok लिखते हैं, "हमें रेल से मुफ्त का कुछ नहीं चाहिए, लेकिन ट्रेनों की संख्या ज़्यादा होनी चाहिए, आरक्षण आसानी से मिलना चाहिए... ट्रेनें समय से चलें तथा स्टेशन और ट्रेनें साफ-सुथरे हों..."

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वैसे, सोशल मीडिया पर ऐसे लोग भी काफी तादाद में हैं, जिन्हें रेल बजट से ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं, और ऐसे ही एक यूज़र @Akaash111 का कहना है, आम यात्रियों को कुछ नहीं मिलने वाला, क्योंकि रेलवे के पास निवेश के लिए पैसा ही नहीं है...

ट्विटर पर लोगों ने उपेक्षा करने का भी आरोप लगाया है, और ऐसे ही एक शख्स का ट्वीट अब तक भारतीय रेलवे की ओर से हिमाचल प्रदेश की उपेक्षा के बारे में है... @MyHimachal यूज़र हैंडल का इस्तेमाल करने वाले एक शख्स ने लिखा, "क्या आपको मालूम है कि एक इंच कितना होता है, आजादी के बाद हिमाचल को उतना भी रेलवे ट्रैक नहीं मिला है... क्या हम आज उम्मीद करें...?" एक अन्य यूज़र ने व्यंग्य करते हुए लिखा है, "जुमलों वाला रेल बजट जल्द ही टीवी स्क्रीन पर आएगा... पॉपकॉर्न के साथ इसे देखना आनंद भरा होगा..."

पिछले रेल बजट की घोषणाओं पर कटाक्ष-सा करते हुए @shuvankr ने कहा है, "यह मोदी सरकार का दूसरा रेल बजट है, लेकिन बुलेट ट्रेन कहां है...?"

एक अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर रणधीर झा ने लिखा है, "यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के भक्तों, रेलवे के बढ़े किरायों के लिए तैयार हो जाओ..." फेसबुक पर ही अजय ब्रह्मात्मज ने लिखा है, "खेल बजट, रेल बजट... घाम बजट, आम बजट... जेब खाली, आमदनी सूखी करता, तमाम बजट... उम्र हुई पचपन, समस्याएं हुईं छप्पन, चाहे जितना डोलाया, अब तक न मेरे काम आया बजट..."

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