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कंप्यूटर जैसे तेज दिमाग वाले बिहार के वशिष्ठ नारायण सिंह ने नासा में किया था काम, जानिए उनके बारे में

बिहार के रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी.

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कंप्यूटर जैसे तेज दिमाग वाले बिहार के वशिष्ठ नारायण सिंह ने नासा में किया था काम, जानिए उनके बारे में

Vashishtha Narayan Singh: डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह मानसिक बीमारी से जूझ रहे थे.

नई दिल्ली:

महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) का पटना में निधन हो गया. उनकी उम्र 74 साल थी. वशिष्ठ नाराय़ण 40 साल से मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया से पीड़ित थे. आरा के बसंतपुर के रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह (Mathematician Vashishtha Narayan Singh) के नाम कई उपलब्धियां हैं. गरीब परिवार से आने वाले वरिष्ठ नारायण का जीवन बेहद संघर्ष भरा रहा लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते रहे. वशिष्ठ नारायण सिंह ने सन् 1962 बिहार में मैट्रिक की परीक्षा पास की. उस दौरान उनकी मुलाकात अमेरिका से पटना आए प्रोफेसर कैली से हुई. प्रोफेसर कैली वशिष्ठ नारायण से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें बरकली आ कर शोध करने का निमंत्रण दिया. जिसके बाद 1963 में वे कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में शोध के लिए गए. वशिष्ठ नारायण ने ‘साइकिल वेक्टर स्पेस थ्योरी' पर शोध किया.

नासा में काम करने के बाद लौटे भारत
1969 में उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बने. उन्होंने नासा में भी काम किया, लेकिन वह 1971 में भारत लौट आए. भारत वापस आने के बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर, आईआईटी बंबई और आईएसआई कोलकाता में काम किया. वशिष्ठ नारायण की शादी वंदना रानी सिंह से 1973 में हुई थी. शादी के कुछ समय बाद वह मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया से पीड़ित हो गए.

आंइस्टीन को दी थी चुनौती
वरिश्ठ नारायण ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी. कहा जाता है कि जब नासा में अपोलो की लॉन्चिंग से पहले 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था. 


मानसिक बीमारी से जूझ रहे थे डॉ वशिष्ठ 
वह छोटी-छोटी बातों पर काफी गुस्सा करते, कभी दिनभर पढ़ते तो कभी रात भर जागते रहते थे. 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा इसके बाद उनका इलाज हुआ. लम्बे समय तक वे गायब रहे. करीब पांच साल तक गुमनाम रहने के बाद उनके गांव के लोगों ने उन्हें छपरा में देखा को वे उन्हें गांव वापस ले आए. उन्हें बिहार सरकार ने ईलाज के लिए बेंगलुरु भेजा था. जहां मार्च 1993 से जून 1997 तक इलाज चला. इसके बाद से वे गांव में ही रह रहे थे. कई संस्थाओं ने डॉ वशिष्ठ को गोद लेने की पेशकश की थी, लेकिन उनकी माता को ये मंजूर नहीं था.

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