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अखिलेश शर्मा की कलम से : अभी खत्म नहीं हुआ बिहार चुनाव

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अखिलेश शर्मा की कलम से : अभी खत्म नहीं हुआ बिहार चुनाव

बिहार में पहले दो चरण के मतदान हो चुके हैं

पहले दो चरण के मतदान के बाद महागठबंधन ने जीत के दावे कर नीतीश कुमार के शपथग्रहण समारोह की तैयारियाँ भी शुरू कर दीं। उन्होंने मान लिया है कि बीजेपी इन दो चरणों में इतनी बुरी तरह पिछड़ गई है कि बाकी के तीन चरणों में वो चाहे कितनी ही मेहनत कर ले, बराबरी तो दूर, सम्मानजनक हार से भी दूर है। कई राजनैतिक विश्लेषक भी इस आकलन से सहमत नजर आ रहे हैं लेकिन क्या ज़मीनी हकीकत वाकई ऐसी है?

पहले दो चरणों में महागठबंधन की अजेय बढ़त के दावों के पीछे कई कारण गिनाए जा रहे हैं। यादव वोटों में टूट नहीं हुई, नीतीश और लालू के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफ़र हुए, कुशवाहा वोट एकमुश्त एनडीए को नहीं मिले, आरक्षण पर मोहन भागवत के बयान ने ईबीसी और दलित वोटों को बुरी तरह से बांट दिया, बीजेपी का अंदरूनी असंतोष बढ़ा, बिहारी बनाम बाहरी के मुद्दे ने बीजेपी को अपने होर्डिंग बदलने पर मजबूर किया और उसे स्थानीय नेताओं के फोटो लगाने पड़े और संभावित हार के मद्देनज़र पीएम मोदी की सोलह अक्टूबर की तीन रैलियों को रद्द करना पड़ा।

ऐसा लंबे समय बाद हुआ कि बीजेपी परसेप्शन या धारणा की लड़ाई में पिछड़ी है। वरना कोई कारण नहीं है कि जिस बीजेपी को विधानसभा चुनाव शुरू होने से पहले आगे दिखाया जा रहा था, सिर्फ अस्सी सीटों के चुनाव के बाद पराजित घोषित कर दिया जाए। पहले दो दौर के मतदान में बीजेपी के पिछड़ने और इससे पूरा चुनाव हारने की धारणा बनने में बीजेपी का ख़राब प्रबंधन जितना ज़िम्मेदार है उससे कहीं अधिक श्रेय महागठबंधन की चुनावी रणनीति संभाल रहे प्रशांत किशोर और जेडीयू सांसद के सी त्यागी को दिया जा रहा है। बीजेपी के भीतर मौजूदा नेतृत्व से खार खाए बैठे एक धड़े ने भी इस धारणा को जमकर हवा दी।

पटना से लेकर दिल्ली तक मीडिया के एक हिस्से में जो बात कानाफूसी और अफ़वाह से शुरू हुई, धीरे-धीरे उसने खबर की शक्ल ले ली। बीजेपी का आरोप है कि कुछ संवाददाताओं ने हार-जीत के दावे राजनीतिक दलों के हवाले से करने की औपचारिकता को छोड़, ऐसा करने की ज़िम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने यहाँ तक कह दिया कि समर्थक पत्रकारों से माहौल बनवा कर महागठबंधन महाभूल कर रहा है क्योंकि चुनाव मीडिया नहीं जनता जिताती है।

जमीन पर ऐसा नहीं दिख रहा कि यादव वोट चट्टान की तरह महागठबंधन के साथ खड़ा है। ये सही है कि वो लालू प्रसाद के साथ पूरी तरह से है लेकिन जहाँ एनडीए ने मज़बूत यादव उम्मीदवार उतारे, इनके वोट एनडीए को भी मिलते नजर आ रहे हैं। महागठबंधन ने लालू के परंपरागत माई यानी मुस्लिम यादव गठजोड़ को टिकट बांटने में तरजीह दी है और ६४ यादव और ३३ मुस्लिम यानी कुल ९७ उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इसके जवाब में एनडीए ने अगड़ी जाति के अपने समर्थन को मज़बूत करने के लिए ८७ अगड़ों को टिकट दिया है। इनमें ३० राजपूत हैं। जबकि महागठबंधन के अगड़ी जातियों के ४१ उम्मीदवार हैं। आरजेडी ने सिर्फ पांच अगड़ों को टिकट दिए और इनमें कोई भूमिहार नहीं है और ब्राह्मण सिर्फ एक है।

अति पिछड़ों को लुभाने की दोनों ही गठबंधनों ने कोशिश की है। एनडीए ने ३१ अति पिछड़ों को टिकट दिया। इनमें बीजेपी के अकेले २५ उम्मीदवार हैं। जबकि महागठबंधन के २२ अति पिछडे उम्मीदवार हैं और लालू प्रसाद १०१ उम्मीदवारों में सिर्फ ५ अति पिछड़े हैं।

जमीन पर लालू-नीतीश के यादव-मुस्लिम-कुर्मी वोट एक-दूसरे को ट्रांसफ़र होते दिख रहे हैं। मगर महागठबंधन को असली समस्या उन सीटों पर है जहां बड़ी संख्या में बाग़ी उम्मीदवार खड़े हैं। सिर्फ सौ-सौ सीटें लड़ने का मतलब है उन सीटों पर ताक़तवर नेताओं का असंतोष झेलना जिन्हें टिकट नहीं मिला और जहां जेडीयू या आरजेडी दूसरे नंबर पर आए। महागठबंधन को कुशवाह वोटों में विभाजन का सीधा फायदा जरूर मिला है।

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बिहार चुनाव का फैसला अति पिछड़ों और दलित-महादलितों के हाथ में आ गया है। अति पिछड़े वर्ग के वोटों पर एक मुश्त अधिकार का दावा कोई नहीं कर रहा। आरक्षण पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान से इनमें भ्रम फैला। मगर बीजेपी धीरे-धीरे उन तक ये संदेश पहुँचा रही है कि भागवत ने आरक्षण खत्म करने की बात नहीं कि बल्कि जिन्हें नहीं मिल रहा, उन तक इसका लाभ पहुँचाने पर जोर दिया है।

करीब ढाई करोड़ युवा मतदाता चुनाव में ख़ासा उत्साह दिखा रहा है और ये जाति की राजनीति से ऊपर उठ कर चुनाव की हवा को मोड़ने में सक्षम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैलियों में उमड़ी भीड़ को इस उत्साह से जोड़ा जा रहा है। इसीलिए बिहार चुनाव को सिर्फ दो चरणों के बाद खत्म मान लेना जल्दबाज़ी होगी।


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