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सुशांत सिन्हा का ब्लॉग : बिहार विधानसभा चुनाव का 'दलित फैक्टर'

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सुशांत सिन्हा का ब्लॉग : बिहार विधानसभा चुनाव का 'दलित फैक्टर'

जीतनराम मांझी, रामविलास पासवान और अमित शाह (फाइल फोटो)

पटना: बिहार चुनाव में लगभग महीने भर का वक्त बचा है ... कायदे से तो अब तक सब तय हो जाना चाहिए था लेकिन NDA के लिए ऐसा है नहीं। चुनावी आंच पर मुद्दों की हांडी तो चढ़ा दी गई है लेकिन अभी यही नहीं तय हो पाया है कि पकेगा क्या और हांडी में क्या कितना डलेगा... मतलब बीजेपी और उसके सहयोगी दल न तो सीएम पद के उम्मीदवार का नाम तय कर पाए हैं और न ही यह कि कौन कितनी सीट पर लड़ेगा। अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों है। इसको समझने के लिए आपको बिहार चुनाव का दलित फैक्टर समझना होगा... और साथ ही यह समझना होगा कि क्या महादलित महाजीत की वजह बन सकता है?

पहले बिहार चुनाव का दलित फैक्टर समझिए। बिहार की कुल आबादी में 15.9% दलित हैं। और राज्य में 18.44% वोटर दलित हैं। यानि सारे दलित वोट को मिला दें तो कमोबेश यादव वोट बैंक की बराबरी का मामला बन जाता है। इसमें भी SC कोटे के वोट का 70% हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है। यानि एक प्रभावी वोट बैंक। बिहार में कुर्मी, मुसलमान और यादव वोट बैंक को अगर आरजेडी, कांग्रेस और जेडीयू अपने हिस्से में मान कर चल रहे हैं तो बीजेपी अगड़ी जातियों और व्यापारी वर्ग के वोट पर दांव लगाए बैठी है। ऐसे में सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय कर सकता है इस बार।

वैसे तो दलित लगभग हर चुनाव में अपना मसीहा तलाशता है। पहले कांग्रेस पर भरोसा किया, वहां मुंह की खाई तो लालू यादव की आरजेडी का दामन थामा। वहां भी बहुत कुछ नहीं मिला तो नीतीश कुमार की जेडीयू का रुख किया। नीतीश कुमार ने भी  SC कैटेगरी की 22 जातियों में से 21 को महादलित घोषित कर अपनी तरफ से कोशिशें शुरू कीं लेकिन उनके रास्ते में उनका ही प्यादा आ खड़ा हुआ। मांझी ने लगभग 8 महीने के कार्यकाल में अपना सारा फोकस कमोबेश इस बात पर रखा कि वह कैसे महादलित का चेहरा बन सके। इसी कोशिश के तहत उन्होंने कुर्सी से हटते हटते भी कई फैसले महादलितों के हक में लिए और पासवान जाति को भी महादलित की लिस्ट में शामिल कर दिया।

ऐसे में इस बार लड़ाई दिलचस्प हो गई। बीजेपी न सिर्फ मांझी को साथ लेकर एक दलित चेहरे को सम्मान देने की बात कर रही है बल्कि मांझी से कुर्सी छीने जाने को भी दलित के अपमान का मुद्दा बना रही है। इस बीच बीजेपी के लिए दिक्कत यह है कि उसे तय करना है कि उसके लिए दलित वोट ज्यादा कौन लाएगा, रामविलास पासवान या जीतन राम मांझी।  बीजेपी की यह दुविधा क्यों है इसे समझाने के लिए एक और आंकड़ा आपके सामने रखते हैं...

बिहार विधानसभा में कुल आरक्षित सीटें 38 हैं। इसमें से 2005 में JDU को 15 सीटें मिली थीं और 2010 में 19 सीटें। यह याद रखिएगा कि इन चुनावों में मांझी JDU के साथ थे। अब BJP का हिसाब किताब देख लीजिए। BJP के खाते में 2005 में 12 सीटें आईं थीं और 2010 में 18,  यानि NDA गठबंधन ने पिछले चुनाव में 38 में से 37 सीटें जीती थीं। RJD को 2005 में 6 सीटें मिली थीं जो 2010 में घटकर एक रह गई थी। 2005 में 2 सीट जीतने वाली LJP ने तो 2010 में इन सीटों पर खाता तक नहीं खोला और कांग्रेस का भी यही हाल था।

यानि सीधे-सीधे हिसाब यह है कि बीजेपी के पास यह तय करने के लिए कोई आंकड़ा नहीं है कि JDU से अलग होने के बाद जीतन राम मांझी कितना बड़ा चेहरा बन गए हैं दलित वोट बैंक के लिए और क्या रामविलास पासवान लालू यादव से अलग होकर अपना पारंपरिक पासवान वोट बैंक फिर से हासिल कर पाएंगे। हांलाकि इस बीच यह भी याद रखिए कि दूसरे गठबंधन को भी यह तय करना है कि दलित वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए उसके पास क्या है। इसको अगर चेहरों के लिहाज से समझिए तो तस्वीर ऐसी दिखेगी..

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LJP के पास रामविलास पासवान का चेहरा है जो 4.5% पासवान वोट पर पकड़ का दावा करते हैं। मांझी जी का हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा यानि 'हम' के पास सिर्फ जीतन राम मांझी का ही आसरा है क्योंकि वह 5.5% मुसहर जाति के वोट पर असर डाल सकते हैं। इसके अलावा सत्तारूढ़ JDU में भी कई दलित चेहरे हैं। हांलाकि नीतीश कुमार दलित चेहरा तो नहीं हैं लेकिन दलितों के लिए बहुत कुछ करने का दावा करके वोट मांगते रहे हैं। उनके अलावा पार्टी में उदय नारायण चौधरी हैं, मंत्री श्याम रजक हैं और एक और चेहरा रमई राम का है।

दिक्कत सिर्फ इतनी है कि इस बार के बिहार के चुनाव में कई चेहरे जो साथ थे वे अब साथ नहीं हैं और कई चेहरे जो साथ नहीं थे वे अब साथ हैं। सच यह भी है कि दिल में दलित के लिए जगह की बात तो सब करते हैं लेकिन दलित को वह कभी नहीं मिल पाता जो उसकी चाह होती है। 1994 से 2000 के बीच तकरीबन 144 लोग मारे गए, जिनमें महिलाएं और बच्चे तक थे। यह साल ऐसे थे जब लालू यादव की पार्टी सत्ता में थी। लालू कुछ नहीं कर पाए। नीतीश 2005 में सत्ता में आए तो सबसे पहले उस दास कमीशन को बिना रिपोर्ट लिए खत्म कर दिया, जो इन हत्याओं की जांच के लिए बनी थी। सबके अपने सियासी दायरे हैं और राजनीतिक जरूरतें। ऐसे में दलित वोटर भी अब राजनीतिक तौर पर पहले से ज्यादा परिपक्व है। वह खुद भी अपने हिसाब से सत्ता की गाड़ी चलाने की उम्मीदें पाले है और इसलिए इस बार यह प्रभावी दलित वोट बैंक किसके हिस्से जाएगा यह अभी कहना मुश्किल है। यानि तय नहीं है कि वोटर किसके चेहरे को दिल में बैठाएगा और किसके चेहरे को आईना दिखाएगा, लेकिन इतना तय है कि दलित वोटर अहम किरदार तो निभाएगा इस बिहार चुनाव में।


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