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कांग्रेस के साथ गठबंधन अखिलेश के लिए बड़े फायदे का सौदा नहीं दिखता

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कांग्रेस के साथ गठबंधन अखिलेश के लिए बड़े फायदे का सौदा नहीं दिखता
अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का हिस्‍सा भले ही अजित सिंह की पार्टी राष्‍ट्रीय लोक दल (रालोद) को नहीं बनाया लेकिन पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में बीजेपी से नाराज जाट समुदाय अपने समर्थन पर पुनर्विचार कर रहे हैं. एक के बाद एक खाप यह कह रही हैं कि हमने 2014 में गलती की और अपनी जड़ों की तरफ लौटने की बात कह रही हैं. यानी कि फिर से जाट पार्टी के रूप में वे रालोद से जुड़ने की मंशा जता रहे हैं. हालांकि पश्चिमी यूपी के इस इलाके में परंपरागत रूप से मायावती का प्रदर्शन भी बेहतर रहा है लेकिन 2014 के आम चुनावों में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली (राज्‍य के कुल वोटों में 20 प्रतिशत हिस्‍सा रहा) लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में बसपा को 29 सीटें मिली थीं. इस बार भी यहां उनके मुख्‍य प्रतिद्वंद्वी अजित सिंह ही दिख रहे हैं.

इस इलाके की आबादी का 17 हिस्‍सा जाटों का है और उनका रालोद का समर्थन बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह के लिए बड़ी चिंता का सबब है. बीजेपी के लिए अगड़ी जातियों के समर्थन का किला पहले से ही दरक रहा है और ऐसे में अजित सिंह की मजबूत स्थ्‍िाति उनके लिए परेशानी खड़ी कर सकती है. वरिष्‍ठ बीजेपी नेताओं के मुताबिक 1998 में रालोद का गठन करने वाले अजित सिंह चुनावों के बाद अमित शाह के साथ डील के मामले में बड़ी चुनौती बन सकते हैं. फिलहाल पश्चिमी यूपी में मायावती और अजित सिंह के दोहरे खतरे को हल्‍के में नहीं लिया जा सकता.

2014 के लोकसभा में पश्चिमी यूपी की सभी 10 सीटों पर बीजेपी विजयी हुई थी. उस दौरान बड़े पैमाने पर जाटों ने मोदी लहर के चलते अजित सिंह का साथ छोड़कर बीजेपी को वोट दिया था.

इसके बावजूद इस बार जब गठबंधन की चर्चाएं हो रही थीं तो अखिलेश यादव और राहुल गांधी के साथ गठबंधन बनाने के लिए अजित सिंह ने सख्‍त रुख अपनाते हुए 40 सीटों की मांग की. अखिलेश ने कांग्रेस से कहा कि यदि वे चाहते हैं तो अपने हिस्‍से की तकरीबन 100 सीटों में से अजित सिंह को दे सकते हैं. कांग्रेस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. नतीजा यह हुआ कि डील खत्‍म हो गई और अजित सिंह गठबंधन का हिस्‍सा नहीं बन सके.

हालांकि अमित शाह ने चुनाव के लिहाज से पार्टियों से डील करने के अलावा अन्‍य दलों से नेताओं को अपने यहां लेकर आए लेकिन अजित सिंह को बातचीत की टेबल पर लाना उनके लिए कठिन चुनौती है. ऐसे में बीजेपी अध्‍यक्ष शाह को चुनाव नतीजों का इंतजार करना होगा और उसके बाद ही रालोद के बारे में निर्णय लेना होगा. ये काफी हद तक इस इलाके में मायावती की पार्टी बसपा के प्रदर्शन पर निर्भर करता है क्‍योंकि यह ध्‍यान रखना चाहिए कि बसपा का कोर जाटव दलित वोट भी इस इलाके में केंद्रित है.

इसके साथ ही यह भी देखने लायक है कि अखिलेश यादव भले ही चाहें जो सब्‍जबाग दिखा रहे हों लेकिन उनके अभियान के सामने भी बड़ी चुनौती है. सपा में मचे घमासान के चलते वह प्रचार अभियान देर से शुरू कर सके. मायावती और बीजेपी उसके पहली ही शुरू कर चुके थे. अखिलेश के सामने शिवपाल यादव की भी चुनौती है क्‍योंकि वह वोटकटवा की भूमिका निभा सकते हैं. यादव परिवार के गढ़ माने जाने वाले इटावा में उन्‍होंने सपा के खिलाफ अपने निर्दलीय प्रत्‍याशियों को खड़ा किया है. उनके अमित शाह के साथ भी अच्‍छे संबंध हैं(अमर सिंह के सौजन्‍य से). उनके कुछ प्रत्‍याशी बसपा के टिकट पर भी खड़े हैं.

इसी वजह से सपा के टिकट पर खड़े होने के बावजूद उन्‍होंने 11 मार्च के बाद अपनी नई पार्टी बनाने का ऐलान किया है. इसी कड़ी में इटावा में शिवपाल के समर्थक एक निर्दलीय प्रत्‍याशी ने कहा, ''वह वर्षों से यहां नेताजी(मुलायम सिंह यादव) के लिए साइकिल का प्रचार कर रहा है. उन्‍होंने हम लोगों के लिए बहुत परेशानियों का सामना किया और अखिलेश को जमीनी सच्‍चाई का पता नहीं है, उनको नजरअंदाज करने पर उतारू हैं. क्‍यों? अपने परिवान की रक्षा करना क्‍या अपराध है?''

अखिलेश को इस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि पार्टी के नाम और चुनाव निशान के अधिकार की लड़ाई जीतने के बाद उनके हौसले बुलंद हैं और युवा शहरी क्षेत्रों में लोग उनके नारे 'काम बोलता है' से आकर्षित हो रहे हैं और उनके कुछ दागी छवि वाले तत्‍वों को पार्टी से हटाने से ग्रामीण तबके के यादव भ्रमित हो गए हैं. वे मुलायम सिंह और शिवपाल को ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जिन्‍होंने उनको सशक्‍त किया. यहां यह भी ध्‍यान रखना चाहिए कि थोड़ी-बहुत अराजक स्थिति से इनकी त्‍यौरियां नहीं चढ़तीं. यहां पर शिवपाल यादव को 'दबंग' नेता के रूप में जाना जाता है. यहां बहुत से ये कह रहे हैं कि वे नए 'छोरे' ने जिस तरह से बुजुर्गों को हाशिए पर धकेला है, इससे वे दुखी हैं.

जमीनी धरातल पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच तालमेल भी अखिलेश यादव के लिए बड़ी चिंता का विषय है. उनके कार्यकर्ताओं ने इस गठबंधन को पसंद नहीं किया है और इसके लिए कोई प्रयास करते भी नहीं दिखते. जहां तक कांग्रेस की बात है तो उसका जमीन पर वजूद ना के बराबर है. भले ही राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच बेहद मधुर संबंध हों लेकिन इसका असर जमीन पर पहुंचता नहीं दिखता क्‍योंकि सपा का काडर उन सीटों पर नाराज हैं जहां ये कांग्रेस को दे दी गई हैं. इस लिहाज से कांग्रेस को जो 100 से अधिक सीटें दी गई हैं वहां पर सपा के टिकट पाने के दावेदार नाराज कार्यकर्ता वोटकटवा की भूमिका निभा सकते हैं. अखिलेश यादव जहां इन सभी समस्‍याओं से जूझ रहे हैं और पिता मुलायम सिंह को अपने पाले में रखने की कोशिशों में लगे हैं वहीं पत्‍नी डिंपल यादव और करीबी चाचा राम गोपाल यादव लखनऊ में पार्टी हेडक्‍वार्टर से चुनावी गतिविधियों को संभाल रहे हैं.

वहीं दूसरी तरफ बीजेपी जिसका बेहतरीन संगठन और वॉर रूम है, उसने अपने चुनाव अभियान में तब्‍दीली की है. इसके तहत ऐसे नए पोस्‍टर पेश किए जा रहे हैं जो वोटरों से एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में वोट देने की बात कह रहे हैं. यह एक ऐसी रणनीति है जिसको इस तरह से गढ़ा जा रहा है कि यदि बीजेपी जीत नहीं सके तो मोदी पर निशाना नहीं साधा जा सके. अमित शाह लखनऊ के बड़े हाई-टेक वॉर रूम को संभालने के साथ मुंबई निकाय चुनावों पर भी नजर रखे हुए हैं. सूत्रों के मुताबिक वहां पर वह कांग्रेसी नेता गुरुदास कामत के संपर्क में भी हैं जोकि मुंबई कांग्रेस चीफ संजय निरुपम के बढ़ते कद से नाराज बताए जाते हैं. शाह उनको बीजेपी में लाना चाहते हैं. इसके साथ ही अमर सिंह के बीजेपी में जाने की चर्चाएं हैं. पार्टी सूत्रों के मुताबिक चुनाव बाद इस पर विषय पर निर्णय लिया जा सकता है क्‍योंकि तभी अमित शाह इस बात का निर्णय करेंगे कि क्‍या उनके आने से बीजेपी को फायदा होगा.

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(स्‍वाति चतुर्वेदी लेखिका और पत्रकार हैं. वह 'द इंडियन एक्‍सप्रेस', 'द स्‍टेट्समैन' और 'द हिंदुस्‍तान टाइम्‍स' में काम कर चुकी हैं.) 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.


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