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चुनावी ब्लॉग

  • फर्रुखाबाद की सियासत पर आलू और मोदी
    उनसे जब सियासी हाल जानने की कोशिश की तो मुस्कुरा दिए बोले हम लोगों को खेती किसानी से फुरसत कहा लेकिन जब मैंने कहा कि लड़ाई किसमें है तो हंसते बोले बीजेपी और गठबंधन में... हमने कहा आप लोगों का वोट किसे जा रहा है...
  • फर्रुखाबाद की ढहती विरासत और सियासी समीकरण का हाल
    लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार सलमान खुर्शीद के घर कायम गंज जाते हुए रास्ते में कई मकबरे दिखे तो शहर के इतिहास की जानकारी लेने की उत्सुकता बढ़ी. फर्रुखाबाद में गुरुगांव मंदिर के ठीक पीछे नवाब मोहम्मद खां बंगश का मकबरा नजर आया.
  • भाजपा-कांग्रेस हारती है न जीतती है, जीतता ज़िले का कुलीन/दंबग है...
    चुनाव में भाग लेने के साथ-साथ उसे समझने की प्रक्रिया भी चलती रहनी चाहिए. हमारा सारा ध्यान सरकार बदलने और बनवाने पर रहता है लेकिन थोड़ा सा ध्यान हमें उन कारणों पर भी देना चाहिए जो राजनीति को तय करते हैं. जिनके कारण राजनीतिक बदलाव असंभव सा हो गया है.
  • यूपी में 74 सीटें अमित शाह ही जीत लेंगे तो बाकी वहां की राजनीति के शाह क्या करेंगे
    उत्तर प्रदेश में 73 सीटों में से एक कम नहीं होगा. 72 की जगह 74 हो सकता है. यह बयान अमित शाह का है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का इंडियन एक्सप्रेस में लंबा इंटरव्यू छपा है. उनके इस दावे से यही निष्कर्ष लगता है कि बसपा और सपा का गठबंधन समाप्त हो चुका है. इस बार फिर बसपा को शून्य आने वाला है और सपा अपने परिवार के नेताओं को ही जिता सकेगी.
  • इटावा की 'घोड़ा चाय' की दुकान और सियासी चर्चा
    मैंने भी कुल्हड़ में चाय की चुस्की लेते पूछा कि जिस चाय की दुकान पर इतनी भीड़ होती हो वहां चुनावी चर्चा न होती हो ये कैसे मुमकिन है. अनिल कुमार गुप्ता बोले कि वो खुद लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं और भारत में नकली चुनाव के नाम से एक किताब भी लिख चुके हैं. उन्होंने इटावा में चाय पिलाने में ही क्रांति नहीं की है बल्कि 1975 में इमरजेंसी के दौरान सरकार से जब बगावत की तो 33 धाराऐं लगाकर इनको जेल में भी डाला गया. अब अनिल कुमार गुप्ता लोकतंत्र सेनानी के तौर पर जाने जाते हैं और चाय की केतली धीमी आंच पर रखते हुए वो गर्व से बताते हैं कि सपा सरकार की शुरू की गई सेनानी पेंशन के बीस हजार रुपये भी हर महीने मिलती है.
  • बहादुरगढ़ का छोटूराम नगर: चुनावों में बदलाव के नाम पर ज़ुल्म जारी रहता है, ज़ुल्मी बदल जाते हैं
    कचरे के बीच कॉलोनी है या कॉलोनी के बीच कचरा, हवा में दुर्गंध इतनी तेज़ है कि बगैर रूमाल के सांस नहीं ले सकते. मक्खियां और मच्छर इस कदर भिनभिना रहे हैं कि मुंह खुलते ही उनके भीतर जाने का ख़तरा है. ज़मीन पर नालियों का पानी और कीचड़ फैला है. अपने साफ-सुथरे जूते को रखें तो रखें कहां? यह बाहर से भीतर आए मेरा नज़रिया था. भीतर रहने वालों ने इसे अलग से देखना कब का बंद कर दिया है. उन्हें पता है कि नालियों और मच्छरों के बिना नहीं बल्कि इनके साथ जीना है.
  • लोकसभा चुनाव 2019 का प्रचार अभियान : हैरानी है, अब तक सिर्फ उर्मिला मातोंडकर रहीं 'सुपरहिट'
    वह नेता कहां है, जो समूचे भारत की बात करे, उन लाखों भारतीयों को आश्वस्त करे, जो मौजूदा निज़ाम में डरा हुआ महसूस करते हैं, कोई सकारात्मक संदेश देकर युवाओं को प्रेरित करे, शासन को सुशासन बनाए, और नई पीढ़ी के लिए सबको साथ लेकर चलने वाले भारत का झंडा बुलंद किए रहे...? नेहरू के उत्तराधिकारी का इंतज़ार जारी है...
  • बीजेपी की नई रणनीति, हिंदुत्व का नया स्वरूप
    लोकसभा चुनाव के लिए दूसरे चरण का मतदान खत्म होते ही बीजेपी ने भी अपनी चुनावी रणनीति का दूसरा चरण शुरू कर दिया है. यह वह चरण है जिसमें बीजेपी अपने तरकश में मौजूद हर तीर का इस्तेमाल कर रही है. इसे हिंदुत्व 2.0 का नाम दिया गया है. यानी मोदी-शाह का वह हिंदुत्व जो वाजपेयी-आडवाणी के हिंदुत्व से बिल्कुल अलग है. तब मंदिर मंडल का दौर था तो इस दौर में मंदिर और मंडल को मिलाकर हिंदुत्व का नया रूप तैयार किया गया है. यह आक्रामक हिंदुत्व है जो खुलकर ध्रुवीकरण करता है.
  • प्रज्ञा ठाकुर को चुनकर मोदी-शाह ने दिखा दिया, जीत के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं...
    भोपाल में दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए BJP की पसंद हैं, 48-वर्षीय साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, जो हत्या, षड्यंत्र रचने और इससे भी ज़्यादा वर्ष 2008 में हुए मालेगांव बम ब्लास्ट केस की आरोपी हैं.
  • क्यों चुनावों में मशीन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए?
    बताया कि ये पर्ची पांच साल तक नहीं मिटेगी. बेहतर है इसे गिना जाना चाहिए. वीवीपैट के अपने खर्चे भी हैं. इसका इस्तेमाल करने पर मतगणना की रफ्तार भी धीमी होती है. फिर बैलेट पेपर ही क्यों नहीं?
  • क्यों ग़ायब हैं किसानों के मुद्दे किसानों के ही देश से...?
    सरकार को यह समझना होगा कि जब ज़रूरत ओपन-हार्ट सर्जरी की हो, तो बैंड-एड देकर इलाज नहीं किया जा सकता. असली मसला तो खेती को बचाने का है, ऐसा हुआ, तो किसान ख़ुद-ब-ख़ुद बच जाएंगे.
  • मायावती के रंग समझना आसान नहीं, विपक्ष के लिए बढ़ गया है सिरदर्द...
    लग रहा है कि जिस तरह की 'लेन-देन की राजनीति' आज तक 'बहन जी' करती रही हैं, वह किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के साथ जा सकती हैं, जो 23 मई को आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा.
  • बिहार के 'लेनिनग्राद' बेगूसराय से कन्हैया ने ठोकी ताल
    बिहार का बेगूसराय इन दिनों तरह-तरह के सराय में बदल गया है. सराय का मतलब होता तो लंबे सफर का छोटा सा ठिकाना, जहां यात्रि अंधेरे होने पर सुस्साते हैं और अगली सुबह अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं. दिल्ली में एक है जुलैना सराय. यूसुफ सराय. बिहार में सबसे अधिक राजस्व देने वाला ज़िला बेगूसराय के एक गांव का लड़का जेएनयू गया था रिसर्च करने. आज उसने बेगूसराय से सीपीआई के उम्मीदवार के नाते पर्चा भर दिया.
  • बीजेपी के संकल्प पत्र से बाकी बड़े नेता ग़ायब क्यों?
    11 अप्रैल को पहला मतदान है. मतदान से ठीक तीन दिन पहले भाजपा का घोषणापत्र आया है. 2014 और 2019 के घोषणापत्र के कवर को ही देखें तो बीजेपी या तो बदल गई है या फिर बीजेपी में सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी रह गए हैं. 2014 में कवर पर 11 नेता थे. इनमें से अटल बिहारी वाजपेयी और मनोहर पर्रिकर अब दुनिया में नहीं हैं. आडवाणी और मुरली मनोहन जोशी को टिकट नहीं मिला है.
  • जनता को छलने वाले चुनावी वादे - लोकपाल से समझें
    लोकसभा चुनाव जीतने के लिए सभी पार्टियों ने लुभावने वायदों की बारिश कर दी है. नेताओं के चुनावी वायदों के पीछे बदलाव की विस्तृत रूपरेखा नहीं होती है इसीलिए सरकार बदलने के बावजूद सिस्टम नहीं बदलता है. चुनावों के बाद इन वायदों का क्या हश्र होता है, इसे लोकपाल मामले से समझा जा सकता है.
  • कांग्रेस के घोषणा-पत्र पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण
    100 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में कुल संपत्तियों का 70 फीसदी एक प्रतिशत आबादी के बाद चला गया है. इस एक प्रतिशत ने सुधार के नाम पर राज्य के पास जमा संसाधनों को अपने हित में बटोरा है. आज प्राइवेट जॉब की स्थिति पर चर्चा छेड़ दीजिए, दुखों का आसमान फट पड़ेगा, आप संभाल नहीं पाएंगे. हम आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं. हमें राज्य के संसाधन, क्षमता और कारपोरेट के अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए. एक की कीमत पर उसे ध्वस्त करते हुए कारपोरेट का पेट भरने से व्यापक आबादी का भला नहीं हुआ.
  • राहुल कहते हैं मार्च 2020 तक 20 लाख केंद्रीय पदों को भर देंगे, मोदी क्यों नहीं कहते ऐसा?
    राहुल गांधी ने शिक्षा और सरकारी नौकरी से संबंधित दो बातें कही हैं. उन्होंने मालदा में कहा कि गांव और कस्बों में सरकारी कालेजों के नेटवर्क को दुरुस्त करेंगे. दूसरा सरकार में आने पर मार्च 2020 तक केंद्र सरकार के खाली पड़े 20 लाख पदों को भर देंगे. डेढ़ साल से नौकरी सीरीज़ और यूनिवर्सिटी सीरीज़ कर रहा हूं.
  • वैज्ञानिक कथाकार नरेंद्र मोदी का राष्ट्र को संबोधन और चुनाव आयोग का समापन
    इसरो और रक्षा अनुसंधान का इस्तमाल नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहे हैं. उनका राष्ट्र के नाम संबोधन करना और कुछ नहीं बल्कि मतदाताओं को प्रभावित करना था. वे पुलवामा के बाद ऐसा कुछ चाहते थे जिससे पांच साल की नाकामी पर चर्चा और सवाल ग़ायब हो जाएं.
  • चुनाव 2019 - मतदाता का हल्का होना लोकतंत्र का खोखला हो जाना है
    मैं फील्ड में कभी यह सवाल नहीं करता कि आप किसे वोट देंगे. इस सवाल में मेरी दिलचस्पी नहीं होती है. मैं यह ज़रूर देखना चाहता हूं कि एक मतदाता किस तरह की सूचनाओं और धारणाओं से ख़ुद को वोट देने के लिए तैयार करता है. बाग़पत ज़िले के कई नौजवानों से मिला. शहरी नौजवानों की तरह किसी ने कहा नहीं या फिर जताया नहीं कि वे मुझे जानते हैं. मैं ऐसे ही नौजवानों के बीच जाना चाहता था जो मुझे ठीक से नहीं जानते हों.
  • गैर-कानूनी चुनावी रथ, रोड शो और बाइक रैलियां- सारे चौकीदार चुप क्यों
    भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत असीमित अधिकार मिले हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. विक्रम सिंह ने चुनाव आयोग को 3 लीगल नोटिस देने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके रोड-शो और बाइक रैली पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की.
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