NDTV Khabar
होम | चुनावी ब्लॉग

चुनावी ब्लॉग

  • विधानसभा चुनाव परिणाम 2017 : उस एक घंटे का रोमांच याद रहेगा...
    नतीजों के दिन कभी इतने रोमांचक नहीं रहे. एक मानी हुई जीत अचानक उतार चढ़ाव में बदल गई. सुबह नौ से दस के बीच बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए होश उड़ा देने वाला रहा होगा. एक पल में बीजेपी आगे निकलती थी तो दूसरे पल में कांग्रेस. कभी बराबर तो कभी आगे पीछे.
  • राहुल गांधी का विश्लेषण करके रखने का वक्त आ गया है
    राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का यह दूसरा दिन है. वैसे उनके पास तेरह साल का राजनीतिक अनुभव है. बहुत कुछ उनके बारे में हम जान समझ चुके हैं लेकिन सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजनीतिक दल के अघ्यक्ष बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी और उनके सामने आने वाली चुनौतियां और जोखिम नए नए होंगे.
  • हां, मुझे मालूम है गुजरात चुनाव का नतीजा
    कुछ पत्रकार ट्विटर पर डोल गए हैं. बैलेंस करने या दोनों ही स्थिति में किसी एक साइड से लाभार्थी होने के चक्कर में अपना पोस्ट बदल रहे हैं, बीच बीच का लिख रहे हैं.
  • लालू यादव की ज़ुबानी, आडवाणी को कैसे किया था गिरफ्तार
    25 सितंबर, 1990 को उस समय BJP के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवादित स्थल पर राममंदिर निर्माण के लिए समर्थन जुटाने की खातिर गुजरात के सोमनाथ से रथयात्रा शुरू की थी, और 23 अक्टूबर को उन्हें बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर गिरफ्तार कर लिया गया था...
  • ग़ज़ब ढा रहे हैं ओपिनियन पोल के व्यापारी...
    चुनावी आंकड़ों के इस सांख्यिकीय विश्लेषण को सैफोलॉजी कहते हैं, और यह काम करने वाले खुद को विज्ञानी कहते हैं. वे खुद को सांख्यिकी और राजनीति विज्ञान का विशेषज्ञ कहलाना चाहते हैं. उनकी मुद्रा किसी भौतिक विज्ञानी या रसायनशास्त्री से कम नहीं होती. लेकिन दिक्कत यह है कि उनके आकलन विज्ञान के आकलन की तरह शुद्ध नहीं होते.
  • मोदी हार सकते हैं लेकिन क्‍या राहुल गांधी की सही में जीत होगी?
    क्या मोदी अपने गृह प्रदेश में हार रहे हैं? इसे आप इस प्रकार पढ़ें, 'क्या गुजरात में मोदी को हराया जा सकता है?' कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोग इस सवाल में रुचि रखते हैं. कुछ परेशान हैं, कुछ उत्साहित हैं और कुछ उदास हैं. यहां तक कि जो लोग मानते हैं कि मोदी को कोई नहीं हरा सकता, वे घबराए हुए लग रहे हैं.
  • गुजरात चुनाव : CD छोड़िए, इन मुद्दों का तो पोस्टर भी नहीं बनता
    जब गुजरात सरीखे राज्य में चुनावी बयार शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे मुल्क में इसलिए बिखरेगी, क्योंकि यह तो सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की साख का मामला है. विपक्ष इसलिए पूरा ज़ोर लगाएगा, क्योंकि गुजरात जीत लिया तो उनका आधा रास्ता तय हो जाएगा. इसलिए दोनों ही स्तरों पर यह प्रतिष्ठा का विषय तो है ही.
  • क्या नया है इस बार गुजरात में...
    गुजरात चुनाव में इस बार नई बात यह है कि हरचंद कोशिश के बाद भी हिंदू मुसलमान का माहौल नहीं बन पाया. दूसरी खास बात ये कि वहां के पूर्व मुख्यमंत्री इस समय देश के प्रधानमंत्री हैं. लेकिन वहां सत्तारूढ़ भाजपा इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे है.
  • कब तक दिया जाता रहेगा आरक्षण का झांसा
    सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, आरक्षण को चुनावी हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल करने में बीजेपी या अन्य राजनीतिक दल भी पीछे नहीं हैं. इससे बड़ी विडंबना नहीं हो सकती कि बीजेपी हार्दिक पटेल के दावों की पोल खोलने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जिस ताजा आदेश का हवाला दे रही है वो उसके अपने ही शासन वाले राज्य राजस्थान का है.
  • जीएसटी की भी थ्योरियां बदलने लगीं...
    जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी.
  • हिमाचल और गुजरात में किस करवट बैठेगा चुनावी ऊंट?
    प्रश्‍न यह उठता है कि क्या हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस बनी रहेगी और गुजरात में बीजेपी बेदखल हो जाएगी? फिलहाल इन दोनों प्रश्‍नों के जो उत्तर नजर आ रहे हैं, वह यह कि दोनों में से किसी के होने की संभावना नहीं है. 68 सीटों वाली हिमाचल की विधानसभा में कांग्रेस ने 2012 में 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी. बीजेपी इससे 10 कम रही थी. कांग्रेस ने अपने 83 वर्षीय जिस नेता को अपने भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया है, वे इस बीच लगातार भ्रष्टाचार के मामलों में चर्चा में रहे हैं.
  • गुजरात विधानसभा चुनाव में क्या कमाल कर पाएंगे राहुल गांधी?
    अभी तक बीजेपी नेताओं को लगता था कि प्रधानमंत्री और अमित शाह की जोड़ी के सामने कोई नहीं टिक सकता. मगर तभी राहुल गांधी की एंट्री होती है. गुजरात में वो भी द्वारका मंदिर से पूजा करने के बाद. 
  • चुनावी सनसनी से अब तक बचा कैसे है गुजरात...?
    गुजरात चुनावी सनसनी फैलाने में शुरू से मशहूर रहा है. एक समय था जब गुजरात को सांप्रदायिक विचारों के क्रियान्वयन की प्रयोगशाला कहा जाता था. गुजरात ही है जहां धर्म आधारित मुद्दों को ढूंढने और ढूंढकर पनपाने के लिए एक से एक विलक्षण प्रयोग हमें देखने को मिले. लेकिन यह भी एक समयसिद्ध तथ्य है कि चुनावी राजनीति में एकरसता नहीं चल पाती.
  • प्रधानमंत्री जी, गुजरात के वे 50 लाख घर कहां हैं...?
    कांग्रेस ने गुजरात की महिलाओं के लिए 'घर नू घर' कार्यक्रम चलाया था कि सरकार में आए तो 15 लाख प्लॉट देंगे और 15 लाख मकान.
  • गुजरात विधानसभा चुनाव : 'मौत का सौदागर' वाली बात कहना कहीं PM की रणनीति का हिस्सा तो नहीं
    गुजरात विधानसभा चुनाव में प्रचार अब धीरे-धीरे चरम पर पहुंच रहा है, और हर तरह के दांव-पेंच आजमाए जा रहे हैं...
  • अब BJP को मुस्लिमों का ज़्यादा ध्यान रखना होगा...
    अब बीजेपी के पास न सिर्फ राज्य को बेहतर तरीके से चलाने की ज़िम्मेदारी आयद होती है, बल्कि यह ज़िम्मेदारी भी उसी की है कि उन पर भरोसा करने वाले, और भरोसा नहीं करने वाले मुस्लिम समाज समेत समूची जनता बेखौफ नई सरकार को अपनी सरकार मान सके, क्योंकि दादरी कांड और मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार को लापरवाही और ढिलाई का कसूरवार बताने का मौका बीजेपी के हाथ से जा चुका है...
  • एग्ज़िट पोल : क्या वाकई किसी की हवा नहीं बन पाई उत्तर प्रदेश में...
    एग्ज़िट पोल वालों ने शतरंज की बाजी बिछा दी है. आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर 11 मार्च को नतीजे आने से पहले ही सभी दल जोड़-तोड़ करने या जोड़-तोड़ न हो सके, इसकी सुरक्षा में लगे नजर आएं. अगर वाकई ऐसा होता दिखता है तो यह एग्ज़िट पोल वालों का ही कमाल होगा.
  • क्‍या यह सनसनीखेज़ राजनीति का दौर है...
    थोड़ी लिखा-पढ़ी की जाती और आंकड़ों को खंगाला जाता तो उत्तर प्रदेश का वह चेहरा सामने आता है, जहां अभी सरकार को बहुत काम करना था. सोचने की बात यह है कि ऐसे चुनावी समय में, जबकि ऐसे संवेदनशील विषय विपक्षी पार्टियों के लिए सरकार को घेरने के मौके तथ्यात्मक और गंभीर तरीके से दे सकते थे, उस वक्त भी यह बहस गधे-घोड़ों में उलझकर रह गई.
  • यूपी में किस-किसका, क्या-क्या लगा है दांव पर...?
    अब जब चुनाव आखिरी दौर में है, तो वे बातें ज़रूर कर ली जानी चाहिए, जिन्हें करने का मौका बाद में नहीं मिलता. ऐसी ही एक बात यह है कि इस चुनाव में किस-किसका क्या-क्या और कितना दांव पर लग गया है.
  • क्या इस बार नेताओं को गलतफहमी का शिकार बना रहे हैं मतदाता...?
    जहां राजनेता समझ रहे हैं कि चुनाव प्रचार के दिनों में वे जनता को बहका रहे हैं, वहीं लोग वास्तव में मतदान के दिन और उसके बाद सरकार बनने की पूरी अवधि के दौरान में नेताओं को इस ग़लतफ़हमी में रखते हैं कि वे उन राजनेताओं से बहुत खुश हैं...?
«123456»

Advertisement