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पंचर साइकिल संग कांग्रेस, परिवारवाद संग बीजेपी...

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पंचर साइकिल संग कांग्रेस, परिवारवाद संग बीजेपी...
सितंबर, 2016 में कांग्रेस पार्टी को मीडिया में ठीक-ठाक फुटेज मिला. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की यात्रा की और '27 साल, यूपी बेहाल' का नारा दिया. बसपा के 'हाथी' और सपा की 'साइकिल' पर हमला बोला. कहा कि पांच साल से 'साइकिल' हिल ही नहीं रही है, पंचर है. केंद्र सरकार की किसान-विरोधी नीतियों पर भी हमला बोला. 'वन रैंक, वन पेंशन' का मामला उठाकर प्रधानमंत्री को घेरा और अब इस मामले को कांग्रेस ऐसे पी गई, जैसे सबको पेंशन मिल गया है. जंतर मंतर के पास ज़हर खाकर जान देने वाले पूर्व सैनिक के घर भी गए, मगर पूर्व सैनिकों के गढ़ उत्तराखंड में सर्वे नहीं कराया कि वहां के कितने पूर्व सैनिकों को 'वन रैंक, वन पेंशन' और सातवें वेतन आयोग का पैसा मिलने लगा है.

कांग्रेस उन महीनों की सारी बातें भूल गई. अब उसे याद नहीं कि यूपी यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने सपा सरकार की आलोचना की थी. उस वक्त मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राहुल के हमले को उदारता से लिया और हंसकर टिप्पणी कर दी. अब कांग्रेस सपा की 'साइकिल' पर बैठने जा रही है. कांग्रेस को बताना चाहिए कि पंचर कब बन गई और कब साइकिल दौड़ने लगी. अब यूपी के विकास के बारे में उसका क्या कहना है.

यही नहीं, अगस्त-सितंबर के दो महीनों में कांग्रेस ने यूपी की चुनावी राजनीति में किनारे लगा दिए गए ब्राह्मण नेतृत्व और मतदाता की खोज की. इस पर खूब लेख लिखे गए और बहसें हुईं. अब वे सारी रणनीतिक बहसें कबाड़ में बदल चुकी हैं. इसका नतीजा यह ज़रूर हुआ कि दूसरे दलों में जहां-तहां से ब्राह्मण नेता पकड़कर लाए जाने लगे. कांग्रेस के गैराज में भी ब्राह्मणवाद के नाम पर बेकार पड़े नेताओं को दूसरे दल वाले उठाकर ले जाने लगे.

बीजेपी ने यूपी की 'सबसे लोकप्रिय और जनाधार वाली' ब्राह्मण नेता रीता बहुगुणा जोशी को शामिल कराया. उत्तराखंड में इनके भाई विजय बहुगुणा, जो कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री रहे, अपने बेटे के साथ बीजेपी में आ गए. वहां बेटे को टिकट मिला, यहां बुआ को मिल ही जाएगा. पूरा खानदान बीजेपी में ट्रांसफर हो गया है. अब तो नारायण दत्त तिवारी भी बीजेपी के हो गए.

बीजेपी न होती तो हम और आप राजनीति में परिवारवाद के मुद्दे को तीव्रता से नहीं जान पाते. बीजेपी के लिए परिवारवाद राजनीति का दुश्मन नंबर एक है और गांधी परिवार इसका सबसे बड़ा प्रतीक. इसीलिए कांग्रेस में कोई चाय वाला नहीं, बल्कि चांदी का चम्मच वाला ही नेता बनता है. लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के परिवारवाद को भी बीजेपी निशाना बनाती है. मगर चुनाव-दर-चुनाव बीजेपी के इस मुद्दे का ढोल फटता जा रहा है.

बीजेपी अपने सहयोगियों के परिवारवाद पर चुप रहती है. अकाली, शिवसेना लोक जनशक्ति पार्टी में भी सीटें उसी तरह से तय हैं, जैसे कांग्रेस और आरजेडी में हैं. टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू भी अपने पुत्र को बढ़ावा दे रहे हैं. बीजेपी ने कभी सुखबीर बादल की दावेदारी पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि उनकी पत्नी और सांसद को दिल्ली में मंत्री बना दिया. उद्धव ठाकरे की दावेदारी पर तो बीजेपी बोल ही नहीं सकती है.

इस बीच समय के साथ संघ परिवार की छत्रछाया में बीजेपी के आंगन में परिवारवाद का कमल खिलने लगा. वैसे तो परिवारवाद का यह फूल बीजेपी की स्थापना के साथ ही आ गया था. राजमाता सिंधिया की बेटी वसुंधरा तो कब से दिल्ली से लेकर राजस्थान तक में बीजेपी की सरकार में मंत्री, मुख्यमंत्री बनती रही हैं. उनकी बहन यशोधरा राजे सिंधिया मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं. वसुंधरा के बेटे भी सांसद हैं, मगर परिवारवाद के कारण मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं पा सके, जहां बादल परिवार के लिए एक सीट रिज़र्व थी! वैसे महाराष्ट्र में गोपीनाथ मुंडे की पुत्री पंकजा मुंडे मंत्री हैं.

बीजेपी के भीतर दिखावे का नाटक खूब होता है कि परिवार के नाम पर टिकट न मांगे. फिर जीतने के नाम पर टिकट दिया जाता है. जीत जाता है तो कहा जाता है कि उसे परिवारवाद के नाम पर मंत्री नहीं बनाया जाएगा. मगर इसी कोटे से पार्टी के संगठन का प्रमुख बन सकता है. हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर युवा मोर्चा के पद को सुशोभित करते रहे. अब उनकी जगह परिवारवाद की प्रतीक पूनम महाजन ने ले ली है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के पुत्र भी सांसद हैं. इस तरह न जाने कितने नाम होंगे.

लेकिन यूपी प्रदेश बीजेपी में 12-15 साल से संगठन में अपनी प्रतिभा साबित कर चुके राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह को लेकर हमेशा विवाद हो जाता है. उन्हें तीन-तीन बार टिकट नहीं मिला. इस बार भी चर्चा है, लेकिन इस बीच बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के पोते को अतरौली से टिकट दिया है. बीजेपी में तीसरी पीढ़ी का कमल खिल गया है. राजस्थान में राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों संवैधानिक प्रमुख परिवारवाद के प्रतीक हैं.

बीजेपी ने परिवारवाद की राजनीति का एक और संस्करण लॉन्च किया है. दूसरे दलों से परिवारवाद का आयात करने की खोज बीजेपी ने की है. बीजेपी ने  दो-दो राज्यों से बहुगुणा परिवार का आयात कर नया रिकॉर्ड कायम किया है. उत्तराखंड में एक आर्या परिवार भी आयात हुआ है. बाप-बेटे को कांग्रेस से लाकर बीजेपी में टिकट दिया गया है. अब नारायण दत्त तिवारी के साथ उनके बेटे रोहित शेखर भी आ ही जाएंगे. वह कब से तिवारी जी की टोपी पहनकर फोटो अपलोड कर रहे हैं. तिवारी परिवार भी हो ही गया.

कायदे से देखेंगे तो बीजेपी के अंदर कई परिवार हो गए हैं. सिंधिया परिवार, मुंडे परिवार, महाजन परिवार, बहुगुणा परिवार, रमन परिवार, राजनाथ परिवार, कल्याण परिवार, ठाकुर परिवार, आर्या परिवार, तिवारी परिवार. पहले से एक गांधी परिवार भी है! मेनका गांधी और वरुण गांधी!

इन सब परिवारों वाले संघ परिवार की बीजेपी के बादल परिवार, ठाकरे परिवार, पटेल परिवार, पासवान परिवार और नायडू परिवार के साथ ख़ूब बनती है. बीजेपी को अपने और इनके परिवारवाद से कोई दिक्कत नहीं है. कुछ राज्यों में तो बीजेपी ने करीब-करीब पूरी की पूरी कांग्रेस का आयात कर लिया है. अरुणाचल, असम और उत्तराखंड इनमें प्रमुख हैं.

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दरअसल भारतीय राजनीति में आदर्श और विचारधारा एक तमाशा है. संगठन और कार्यकर्ता सबसे बड़ा मिथक. जनता को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. राजनीतिक दल इंटरनेट की तरह ओपन प्लेटफॉर्म हैं. कोई भी बीजेपी से आईपी अड्रेस खरीद कर अपनी वेबसाइट बना सकता है. दूसरे दलों के साथ भी यही है. कांशीराम ने अपने परिवार को भी कभी राजनीतिक लाभ नहीं लेने दिया, मगर बसपा ने भी परिवारों को टिकट तो दिए ही हैं, इसलिए परिवारवाद के नाम पर अपना समय बर्बाद न करें.

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