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रवीश कुमार : इस वक्त बिहार चुनाव से भी अहम हैं एर्नाकुलम के पंचायत चुनाव...

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रवीश कुमार : इस वक्त बिहार चुनाव से भी अहम हैं एर्नाकुलम के पंचायत चुनाव...
आम्रपाली-सुपरटेक, अंबानी-अदानी या टाटा-बिड़ला किसी राजनीतिक दल को प्रायोजित कर दें तो क्या होगा...? क्या ऐसा हो सकता है...? कभी हमने सोचा है कि ऐसा हो गया तो लोकतंत्र का क्या होगा...? क्या अभी कॉरपोरेट का राजनीतिक दलों के भीतर दखल नहीं है...? क्या हमारे नेताओं की पहचान खास कॉरपोरेट के करीब होने को लेकर नहीं है...? दबी ज़ुबान में हम जानते ही हैं कि फलां नेता किस कंपनी का बंदा है, लेकिन यही सब औपचारिक तौर पर होने लग जाए तो क्या होगा...? अगर कंपनियां पार्टी बना लें या कोई पार्टी किसी कंपनी की हो जाए तो क्या होगा...? जैसे बिहार में इस बार सहयोगी दलों ने मुख्य दलों की सीट पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, अगर उसी तरह कोई कंपनी कांग्रेस या बीजेपी के टिकट पर मैदान में प्रत्याशी उतार दे तो क्या होगा...? अपवादस्वरूप ऐसा हुआ भी है, लेकिन खुलकर होने लगे तो लोकतंत्र के सवालों को लेकर सोचना चाहिए...

अंग्रेज़ी दैनिक 'इंडियन एक्सप्रेस' के शाजू फिलिप ने केरल से एक रिपोर्ट फाइल की है, जो हमें लोकतंत्र और चुनाव के संबंधों को लेकर नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है। केरल का एक जिला है एर्नाकुलम, जहां 5 नवंबर को पंचायत चुनावों के लिए वोट डाले जा रहे हैं। गांव का नाम है किझाक्कांबलम, जहां अन्ना-किटेक्स ग्रुप ऑफ कंपनीज़ ने 19 वार्डों में अपने उम्मीदवार उतारे हैं। कंपनी ने पंचायत चुनाव के लिए एक टीम बनाई है, जिसका नाम है ट्वेंटी-ट्वेटी। आप इसे एक पार्टी ही समझिए। अब पार्टियों के नाम आईपीएल की तर्ज पर होने लगें तो रोने मत लगिएगा।

किझाक्कांबलम में जो हो रहा है, उस पर देश की नज़र होनी चाहिए। यह बिहार चुनाव से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। पहली बार कोई कंपनी अपने कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत एक टीम बनाकर चुनाव लड़ रही है। मैं कॉरपोरेट कानून का ज्ञाता नहीं हूं, इसलिए नहीं बता सकता कि कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत खर्च होने वाले पैसे पर छूट के जो प्रावधान हैं, वे राजनीतिक गतिविधियां चलाने के लिए हैं या नहीं। पंचायत का चुनाव घोर राजनीतिक गतिविधि है।

अन्ना-किटेक्स केरल की सबसे बड़ी गारमेंट कंपनी है। किझाक्कांबलम में उसका कारखाना लगा है। कंपनी का दावा है कि राजनीतिक दल उसके विकास के कार्यों में बाधा डाल रहे हैं। कंपनी इस पंचायत को 2020 तक आदर्श पंचायत बनाना चाहती है। वैसे भारत सरकार भी काफी रुपया खर्च कर देश भर में आदर्श पंचायत बना रही है। प्रधानमंत्री ने तो सांसदों को आदर्श ग्राम योजना शुरू करने की बात की है। भले ही कई जगहों पर यह योजना कागज़ी साबित हो रही है, लेकिन इसकी सोच में तो कोई कमी नहीं दिखती है, इसलिए कंपनी का आदर्श बनाने का दावा नैतिकता के पैमाने से उच्च कोटि का नहीं ठहरता है।

कंपनी के प्रतिनिधि जैकब ने 'इंडियन एक्सप्रेस' से कहा है कि उन्होंने सीपीएम से भी मिलकर चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी, मगर कामयाब नहीं हो सके। लोगों की राय लेने के बाद कंपनी ने अपने स्तर पर उम्मीदवारों का चुनाव किया है। उम्मीदवारों में लेफ्ट से लेकर कांग्रेस में नेता-कार्यकर्ता रह चुके लोग हैं। जैकब का कहना है कि कंपनी ने गांव की सड़कों से लेकर पानी आपूर्ति तक में काफी निवेश किया है, लेकिन कांग्रेस के प्रभुत्व वाली पंचायत ने उसके विकास के कई कामों को रोक दिया है। रिपोर्ट में इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि फिर कांग्रेस के रहते कंपनी ने गांव में बाकी चीज़ें कैसे कर लीं।

पंचायत के निर्वतमान अध्यक्ष जौली बेबी का कहना है कि कंपनी पंचायत पर अपना नियंत्रण कायम करना चाहती है, ताकि कंपनी के हित के लिए मनमानी कर सके। पंचायत ने कंपनी को कुछ मामलों में लाइसेंस नहीं दिया है। बेबी का कहना है कि पानी और दलदल ने भूमि को प्रदूषित किया है, जबकि कंपनी इस आरोप को नकारती है, और कहती है कि कई सरकारी एजेंसियों ने उन्हें क्लीन चिट दी है।

केरल में जो हो रहा है, वह सामान्य घटना नहीं है। कंपनियां अगर कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत किए जाने वाले कार्यों के बदले पंचायतों पर कब्ज़ा कर लें तो क्या होगा। कंपनी के प्रभुत्व वाले कॉरपोरेट के साथ राजनीतिक दल कैसे बर्ताव करेंगे। मुद्दों को लेकर दोनों का संबंध कैसा होगा। क्या राजनीतिक दल बाहर कर दिए जाएंगे। एक समय होता था, जब नेताओं ने बाहुबलियों की मदद ली, बाद में बाहुबलियों ने कहा कि हमारी मदद से विधायक बनते हैं, तो हम ही क्यों न बन जाएं। कई साल और कई चुनाव लगाकर जनता ने राजनीति की ज़मीन बाहुबलियों से वापस ली है। अभी भी राजनीति का बड़ा हिस्सा इन बाहुबलियों के कब्ज़े में है। क्या कंपनियां भी अब ऐसा करने जा रही हैं।

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यह घटना कई नए सवाल पैदा करती है। राजनीति में भी बुराई है। राजनीतिक दल के बहुत से उम्मीदवार या नेता भ्रष्ट होते हैं, दागी और बागी होते हैं। मुखिया से लेकर जिला पंचायत के सदस्य पैसे लेकर वोट देते हैं या दिलवाते हैं। इन सबके बावजूद लोकतंत्र तो है ही। फिर कॉरपोरेट के आने से लोकतंत्र पर क्या असर पड़ेगा, इसे लेकर सोचा जाना चाहिए। कंपनियों में काम करने वाला कोई भी कंपनी हित के बाहर नहीं बोल सकता है। आप बीजेपी में रहते हुए शत्रुघ्न सिन्हा की तरह पार्टी की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन क्या आप ऐसा किसी कंपनी का उम्मीदवार बनने पर कर सकते हैं। यह भी सही है कि व्हिप के कारण अब पार्टी के ज़्यादातर सांसद भी कंपनी के कर्मचारी की तरह ही व्यवहार करने लगे हैं। सब कुछ पार्टी के लिए करते हैं और पार्टी के लिए चुप रहते हैं या बोलते हैं।

केरल के इस गांव में जो बुनियाद पड़ रही है, उसे लेकर सचेत रहने की ज़रूरत है। कंपनियों के संसाधन के आगे जनता के हित टिक नहीं सकेंगे। सड़क, बिजली, पानी और स्कूल सरकार की ज़िम्मेदारी हैं। बेहतर है सरकार ही निभाए। जैसे-जैसे सरकार इन दायित्वों से भागेगी, दूसरे आएंगे। दूसरे आएंगे तो अपना दावा करेंगे। लेकिन लोकतंत्र का क्या। क्या किसी कंपनी की बनाई टीम या मंच या पार्टी का उम्मीदवार जनाकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सकता है, इसलिए थोड़ा दक्षिण की तरफ भी देख लीजिए, बिहार तो हइये है...


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