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आरा का औरंगज़ेब और उसका दोस्त राहुल

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आरा का औरंगज़ेब और उसका दोस्त राहुल
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पीले टी शर्ट में मोहम्मद औरंगजेब है और हल्के नीले रंग वाला राहुल। औरंगज़ेब कम बोलता है और राहुल बहुत अच्छा बोलता है। राहुल खुल कर औरंगजेब से ठिठोली कर लेता है और औरंगज़ेब राहुल की ठिठोली पर चुपके से हंस लेता है। राहुल ने कहा कि हम हिन्दू मुसलमान नहीं कर सकते। हम तो औरंगज़ेब के घर भी जाकर खाते हैं और उसकी जेब से नाश्ता निकाल कर खा लेते हैं। दिल्ली और मुंबई में सांप्रदायिक हिंसा को लेकर बहस हो रही है। आरा के औरंगज़ेब और राहुल काफी हैं बताने के लिए कि हिन्दुस्तान का भविष्य सुरक्षित है। ये लड़के उस हिंसा का सामना कर लेंगे जो कभी गाय तो कभी सुअर के नाम पर मुल्क की जवानियों को हत्यारा बना रही हैं।
 

औरंगज़ेब और राहुल तक नहीं पहुंचता अगर कार से उतर कर बरगद के इस पेड़ के नीचे नहीं आता। सब अपनी सिर गड़ाकर पढ़ाई कर रहे थे। सोचता रहा कि बरगद के नीचे समूह बनाकर पढ़ते छात्रों की यह तस्वीर बिहार के आरा में ही क्यों दिखी? क्या किसी शहर में अपने आप कोई संस्कृति बन जाती है या कोई अपने हाथों से गढ़ जाता है? आरा के महाराजा कॉलेज से लेकर जैन कॉलेज के हर कोने में अकेले और समूह बनाकर पढ़ते इन छात्रों ने कब खोज लिया होगा मिलकर पढ़ने का यह तरीका? तालाब से लेकर पुरानी चर्चों के पिछवाड़े मैंने तमाम शहरों में प्रेमी जोड़ों को बैठे देखा है। आरा में प्रेमी नज़र नहीं आए। पढ़ाकू नज़र आए।
 

हर जगह लड़के मिलकर अध्ययन कर रहे हैं। कई जगहों पर कोचिंग की संस्कृति पनप जाती है। आरा में भी होगी लेकिन यहां सबने महंगी कोचिंग का रास्ता निकाल लिया होगा। खुद से पढ़ रहे हैं। एकाग्रता की तलाश में घर से निकलकर शहर में भटक रहे हैं। ये ग़रीब और साधारण घरों के लड़के हैं जो रेलवे के ड्राईवर, गार्ड और टीटी के लिए अपना पसीना बहा रहे हैं। केंद्रीय सचिवालयों में क्लर्की के ख़्वाब को अच्छी नौकरी समझकर पूरा करना चाहते हैं। इनके पास आई ए एस या आई आई टी बनने के लिए महंगी कोचिंग का साधन नहीं है। ये दिल्ली या कोटा नहीं जा सकते। इसलिए पेड़ के नीचे जमा हुए हैं।
 

सुबह के सात बजे रहे होंगे जब मैं आरा के महाराजा कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ आरा हाउस की शूटिंग कर रहा था। जहाँ छिपे अंग्रेज़ों से बाबू वीर कुंवर सिंह ने लोहा लिया था। 1857 से पहले की बनी इस इमारत में अंग्रेज़ बिलियर्ड्स खेला करते थे। इस इमारत में तहखानों की भरमार है। आम तौर पर ऐसी इमारतें प्रेमियों के काम आती हैं मगर हर कोने के एकांत पर छात्रों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। वे ज़मीन पर बैठकर चुपचाप पढ़ाई कर रहे थे। कोई बातचीत या हंसी मज़ाक़ की आवाज़ सुनाई नहीं दी।
 

इस तस्वीर को देखिये। महाराजा कॉलेज की बन रही इमारत के पोर्टिको के ऊपर बनी जगह में इस लड़के के खुद को टिका दिया है। बिहारी छात्र नौकरी की साधना के लिए दब पढ़ने चलता है तो खुद को दीन-दुनिया से काट लेता है। नीचे की इस तस्वीर में पोर्टिको पर बैठा यह लड़का अंग्रेजी रट रहा था। अपने भविष्य को जीतने में लगा था।
 

मेरे ज़हन में इन तस्वीरों से आरा की वो छवि बनी है जिसे खुद यहां के समाज ने गढ़ा है। ये वो आरा नहीं है जिसे भोजपुरी सिनेमा ने उज्जड़ उदंड बनाकर पेश किया है। परीक्षा में चोरी के क़िस्सों से बिहार की छवि को दशकों नुक़सान हुआ है। जबकि मध्य प्रदेश से लेकर गुजरात तक नक़ल से जूझ रहे हैं। मध्य प्रदेश में तो मैट्रिक की परीक्षा में भाग लेने वाले आधे विद्यार्थी फ़ेल हो जाते हैं। हर साल वहां चार से पांच लाख विद्यार्थी फ़ेल होते हैं।

बिहार में चोरी के क़िस्सों पर पर्दा नहीं डालना चाहिए लेकिन ये भी तो एक तस्वीर है कि नौजवान शहर के कोने कोने में फैल कर पढ़ाई कर रहे। बरगद के नीचे बैठे ये नौजवान आज के बुद्ध है जो आधुनिक व्यवस्था की दी हुई गार्ड और टी टी की नौकरी की साधना में लगे हैं। इस तस्वीर से इन नौकरियों के प्रति सम्मान बढ़ता है। अक्सर लोग समझते हैं कि ये नौकरियां मुफ़्त की होती हैं। आरा वालों से पूछिये कैसे मिलती हैं।
 

छात्रों का यह समूह अलग अलग मोहल्लों से आता है। जिसका जो विषय मज़बूत होता है वो मास्टर बन जाता है। व्हाट्स अप के ज़रिये अगले दिन के विषय की सूचना दी जाती है। सब पहले से पढ़कर आते हैं और एक दूसरे को पढ़ाते हैं। जिसे नौकरी मिलती है वो सबको पार्टी देता है। नौकरी से आकर भी अपने दोस्तों को पढ़ाता है। ऐसी तस्वीर दुनिया को दिखेगी तो बिहार ही नहीं दुनिया को बदल देगी।


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