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यूपी में किस-किसका, क्या-क्या लगा है दांव पर...?

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यूपी में किस-किसका, क्या-क्या लगा है दांव पर...?

यूपी विधानसभा चुनाव 2017 के लिए अब सिर्फ दो चरण का मतदान शेष है...

उत्तर प्रदेश, यानी यूपी विधानसभा चुनाव का पांचवां दौर भी निपट गया. वहां जो कुछ होना है, लगभग हो ही चुका है, सो, वहां की अटकलें-अंदाज़े लगाने पर अब कोई ज्यादा ऐतराज़ नहीं करेगा. फिर भी नैतिकता के लिहाज़ से अनुमान लगाने से अभी हफ्ताभर और बचना चाहिए. लेकिन अब जब चुनाव आखिरी दौर में है, तो वे बातें ज़रूर कर ली जानी चाहिए, जिन्हें करने का मौका बाद में नहीं मिलता. ऐसी ही एक बात यह है कि इस चुनाव में किस-किसका क्या-क्या और कितना दांव पर लग गया है.

समाजवादी पार्टी
एसपी पांच साल से राज्य में सत्तासीन है, सो, उसका बहुत कुछ दांव पर होना स्वाभाविक है. कई और कारणों से भी उसका कुछ ज्यादा ही दांव पर लगा है. एक कारण यह है कि उसके युवा मुखिया ने पार्टी की पूरी कमान अपने हाथ में लेने के लिए आखिरी दम तक बड़ी जद्दोजहद की. बड़े-बड़े नेताओं की नाराज़गी मोल लेकर अखिलेश यादव अकेले दम मैदान में उतरे हैं. कांग्रेस से गठबंधन का बड़ा फैसला भी उन्हीं का है, सो, उनका दांव और भी बड़ा हो गया. अब चूंकि दांव अकेले का है, सो वह जीते, तो देश के सबसे बड़े राज्य, यानी यूपी के एकछत्र नेता ही नहीं साबित होंगे, देश की राजनीति को भी छूने लगेंगे. इस लिहाज़ से हिसाब लगाएं तो समाजवादी पार्टी का मुखिया होने के नाते उनके पास पाने को ढेर सारा है. और अगर कुछ खोया तो वह ज्यादा दिखाई नहीं देगा. तब बस, यह माना जाएगा कि सत्ता के प्रति होने वाले स्वाभाविक विरोध का प्रबंधन वह नहीं कर सके. हालांकि इस तरह का विरोध देखने में अब तक आया नहीं है.

बीएसपी
पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी, यानी बीएसपी को हराकर ही समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी. पांच साल पहले बीएसपी की सरकार भी भरेपूरे बहुमत की सरकार थी. उसके पहले भी कई बार वह यूपी में शासन कर चुकी है. अपने एक निश्चित और ठोस जनाधार के कारण वह इस बार अपनी हैसियत से भी ज्यादा दांव लगाने से आखिर क्यों चूकती. इस चुनाव में मायावती की रैलियों में वैसी ही टूट पड़ती भीड़ फिर दिखी है. अब यह अलग बात है कि मीडिया प्रबंधन में वह कुछ कमज़ोर दिखाई दीं. हालांकि अभी यह कह पाना मुश्किल है कि इस मामले में उनकी तरफ से दांव पर कम लगा है, क्योंकि बाद में हो सकता है कि यह विश्लेषण हो रहा हो कि उनके मामले में मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता ज्यादा दांव पर लगा दी.

बीजेपी
पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, यानी बीजेपी की हालत कुछ ज्यादा ही बुरी थी. उसके पास खुद को दिलासा देने की यही बात बची थी कि उसकी हालत कांग्रेस से कम बुरी रही. लेकिन इस बार के चुनाव में प्रदेश बीजेपी से ज्यादा राष्ट्रीय बीजेपी, बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खुद को दांव पर लगा दिया है. दांव का भारीभरकमपन देखें तो कोई भी कह सकता है यूपी के चुनाव में बीजेपी का ज़रूरत से ज्यादा दांव पर लगा है. और इसका तर्क ढ़ूढें तो वह यही बनेगा कि उसके लिए यह चुनाव यूपी की बजाय 2019 के लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से ज्यादा मायने रखता है. लेकिन सिर्फ इतने से काम के लिए इतना सारा दांव पर लगा देने का तर्क तलाशा जाएगा तो वाकई समझने में मुश्किल आएगी.

कांग्रेस
दांव के मामले में कांग्रेस ने तो सुरखित खेलने की हद ही कर दी. 27 साल से यूपी की सत्ता से बेदखल कांग्रेस के पास इस बार एक मौका था. यूपी के चुनाव की तैयारियों की शुरुआत भी उसने सबसे पहले कर दी थी. इस बार उसे प्रशांत किशोर जैसे चुनाव प्रबंधक की सेवाएं भी हासिल हो गई थीं. राहुल गांधी की एक महीने की किसान यात्रा ने कुछ-कुछ माहौल भी तैयार कर लिया था. लेकिन उसके चुनाव प्रबंधक ने शुरू से ही सिर्फ 100 सीटों पर सीमित दांव लगाने की सिफारिश की थी. आखिर प्रशांत किशोर के प्रयासों से ही 100 सीटों की कीमत पर समाजवादी पार्टी से गठबंधन का दाव चला गया. नौ महीने पहले प्रशांत किशोर ने तीन 'पी' यानी प्रशांत, प्लानिंग और प्रियंका नाम से चुनावी डिज़ाइन बनाया था. उस लिहाज़ से देखें तो कार्ड के रूप में प्रियंका गांधी को आगे के लिए बचाकर भी रख लिया गया और 100 सीटों पर पहले से ज्यादा फोकस भी हो गया. यूपी जैसे विशाल प्रदेश में सभी 403 सीटों पर नहीं लड़ने से पार्टी और उसने अपने स्थानीय नेताओं का खर्चा बचा लिया, सो अलग. यानी इस चुनाव में अगर किसी का सबसे कम दांव पर लगा है तो वह कांग्रेस ही दिखती है. और पाने के लिए उसके पास बिहार की तरह सारी संभावनाएं मौजूद हैं.

आरएलडी
भले ही राष्ट्रीय लोकदल, यानी आरएलडी सिर्फ पश्चिमी यूपी तक सीमित मानी जाती हो, लेकिन गठबंधन की राजनीति में उसकी हैसियत खासी रही है. पहले बात हो रही थी कि कांग्रेस-एसपी गठबंधन के बाद कांग्रेस अपनी हिकमत लगाकर आरएलडी को भी गठबंधन में ले आएगी. लेकिन कांग्रेस-एसपी गठबंधन मुकम्मल होने में इतना वक्त लग गया कि आरएलडी का धैर्य चुक गया होगा. कांग्रेस-एसपी गठबंधन के ऐलान के पहले ही आरएलडी ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया था, सो, गठबंधन की गुंजाइश ही नहीं बची थी. अब रही बात कि आरएलडी का कितना दांव पर लगा है, तो इसका आकलन जरा मुश्किल है, क्योंकि बिना गाजे-बाजे वाले इस चुनाव में आरएलडी का प्रचार ज्यादा दर्ज नहीं हो पाया. मीडिया की उपेक्षा के शिकारों में उसका नाम सबसे ऊपर रखा जा सकता है. यानी उसकी साख, संसाधन या भविष्य ज्यादा दांव पर लगा नहीं दिखता. लेकिन खुदा न खास्ता, किन्हीं दो बड़े दलों में कांटे की टक्कर हो गई और किसी को बहुमत के लिए पांच-दस सीटों की कमी पड़ गई, तो अजित सिंह और जयंत के घरों के बाहर मेला भी लग सकता है. भले ही यह बहुत दूर की बात हो, लेकिन जब सारे विकल्पों को देख रहे हैं, तो नगण्य संख्या वाली संभावनाओं की गणना फिलहाल रोचक तो है ही.

मीडिया
अपनी साख को लेकर कुछ साल से गर्दिश में चल रहे मीडिया के पास यह मौका था कि अपनी साख की बहाली की कोशिश कर लेता. लेकिन जब चुनाव पांच राज्यों में हों और जिनमें यूपी जैसा राज्य शामिल हो, तो साख की बहाली का काम आगे के लिए मुल्तवी कर दिया गया लगता है. अपनी-अपनी पसंद के दलों के पक्ष में और उसके प्रतिद्वंद्वी दल की छवि को मटियामेट करने की कवायद में टीवी और अखबारों ने निसंकोच और ठोककर काम किया. अपनी अपनी चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों के अनुमानों को प्रचारित करके अपने-अपने दलों की हवा बनाने का काम सीना ठोककर पहली बार हुआ है. इस आधार पर कहा जा सकता है कि इन चुनावों में सबसे ज्यादा दांव पर मीडिया का ही लगा है. हालांकि इस बार ज्यादातर मीडिया किसी के पक्ष में लहर या आंधी चलवाने में पूरी तौर पर कामयाब होता नहीं दिखा, सो, तय है कि उसे चुनाव नतीजे आने के पहले ही अपनी साख बचाने का प्रबंध कर लेने की ज़रूरत पड़ेगी. यह मौका उसे मतदान का समय खत्म होने के बाद जारी किए जाने वाले एग्ज़िट पोल नाम के विलक्षण पर्व पर मिलेगा. अब तक तो इन ओपिनियन पोलों की पोल वोटों की गिनती के दिन खुलती थी, लेकिन यह ऐसा अनोखा चुनाव साबित होने जा रहा है कि ये कंपनियां अपने ही ओपिनियन पोलों पर लीपापोती कर रही होंगी. इस चुनाव का सबसे मज़ेदार दृश्य ओपिनियन पोल वालों की भाव-भंगिमाएं देखना ही होगा.

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सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं...

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