अहमदाबाद से ऊना पहुंचे दलित अस्मिता मार्च में जन्मे कई नारे, नए मंथन के संकेत

अहमदाबाद से ऊना पहुंचे दलित अस्मिता मार्च में जन्मे कई नारे, नए मंथन के संकेत

ऊना में अस्मिता मार्च के दौरान नारे लगाते दलित

खास बातें

  • दलितों ने मैला न ढोने का संकल्प लिया
  • जानवरों को दफनाने का काम भी नहीं करेंगे
  • गाय के मुद्दे को लेकर दलित और मुस्लिम साथ आए
ऊना (गुजरात):

अहमदाबाद से चले दलित अस्मिता मार्च के साथ कई नारे भी ऊना पहुंचे और इन नारों के पीछे उत्पीड़न का दर्द भी था और अपने सम्मान और बराबरी के हक का दावा भी. 'गाय नी पुछड़ू तमी राखो, अमें अमारी ज़मीन आपो' ये नारा सबसे अधिक आक्रामकता के साथ लगाया गया, जिसमें दलितों का संदेश साफ था- हम अब मैला ढोने और जानवरों को दफनाने का काम नहीं करेंगे.

जानवरों की खाल निकालने वाले दलित समुदाय के लोग कह रहे हैं कि अब वह ये काम नहीं करेंगे और उनकी मांग है कि सरकार हर दलित परिवार को 5 एकड़ जमीन दे. दलितों का कहना है कि वह गाय की पूंछ नहीं चाहते अपने हक की ज़मीन चाहते हैं.. 'गाय की पूछ उन्हें (गैर दलितों को) ही हिलाने दो, हमें सिर्फ ज़मीन चाहिए'. 'एक ही साहेब, बाबा साहेब' ये नारा दलित अस्मिता और उसके गर्व से जुड़ा है.

(पढ़ें : दलितों ने ली मैला न उठाने की शपथ, सरकार को दिया महीने भर का वक्त)

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दलित कहते हैं कि वह किसी और को नहीं मानते उनके लिए एक ही साहेब हैं- बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर. 'दलित मुस्लिम भाई भाई'ये सामाजिक बदलाव और सियासी मंथन का प्रतीक रहा. गाय की राजनीति के कारण अब दलित और मुस्लिम दोनों साथ आ गए हैं.. दलितों के रूप में मुसलमानों को एक ताकत मिली है और दलितों का कहना है कि मुस्लिमों से उन्हें वह प्यार और सम्मान मिला जो ऊंची जाति के हिंदुओं ने नहीं दिया. 'गाय तुम्हारी माता है, हमारी नहीं' ये नारा दलितों और मुस्लिमों को साथ लाता है, साथ ही दलितों की उस भावना का भी प्रतीक है जिसमें वह हिंदुओं के प्रति अपने दिल में पनपी घृणा को छुपाना नहीं चाहते.

दलित कहते हैं कि गाय के मर जाने पर उसकी खाल उतारने और दफनाने का काम उन्हें दिया जाता है, तो गरीब दलितों पर हमले क्यों हो रहे हैं? दलितों का कहना है, 'गाय की रक्षा और सेवा करना हिंदुओं का काम है हमारा नहीं'. दूसरी ओर मुसलमानों का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले से पहले विदेश को बीफ का निर्यात बंद होना चाहिए.