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...तो शरद पवार अध्यक्ष नहीं बन सकते और शशांक मनोहर वोट नहीं डाल सकते!

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...तो शरद पवार अध्यक्ष नहीं बन सकते और शशांक मनोहर वोट नहीं डाल सकते!

प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली: यदि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति आर. लोढ़ा समिति के व्यापक सुधारों के सुझावों को मानने के लिए बीसीसीआई को बाध्य कर दिया तो फिर महाराष्ट्र के दिग्गज शरद पवार के लिए खेल प्रशासन का रास्ता बंद हो जाएगा, जबकि वर्तमान अध्यक्ष शशांक मनोहर हो सकता है कि अपना मतदान अधिकार गंवा दें।

समिति ने जो सुधारवादी सुझाव दिए हैं, उनसे व्यापक प्रभाव पड़ेंगे और इससे कई राज्य संघों के अध्यक्ष भी प्रभावित होंगे, जो पिछले लंबे समय से अपने पदों पर आसीन हैं। कुछ सुधार प्रस्तावित राष्ट्रीय खेल विकास संहिता के अनुरूप सुझाए गए हैं।

पहली सिफारिश में कोई भी व्यक्ति 70 साल की उम्र के बाद बीसीसीआई या राज्य संघ पदाधिकारी नहीं बन सकता। इस पर अमल हुआ तो मुंबई क्रिकेट संघ के महत्वाकांक्षी अध्यक्ष शरद पवार, तमिलनाडु क्रिकेट संघ के एन. श्रीनिवासन की बोर्ड में वापसी का रास्ता बंद हो जाएगा। सौराष्ट्र क्रिकेट संघ के प्रमुख निरंजन शाह, पंजाब के शीर्ष पदाधिकारियों एमपी पांडोव और आईएस बिंद्रा के लिए भी अपने राज्य संघों में बने रहना मुश्किल हो जाएगा।

दूसरी सिफारिश में एक राज्य संघ का एक मत होगा और अन्य को एसोसिएट सदस्य के रूप में रेलीगेट किया जाएगा। इसका मतलब है कि बीसीसीआई एजीएम के दौरान ऐसी स्थिति में अध्यक्ष शशांक मनोहर मतदान नहीं कर सकते हैं, क्योंकि महाराष्ट्र का ही मान्यता प्राप्त वोटर होगा। विदर्भ और मुंबई एसोसिएट सदस्य के रूप में रेलीगेट हो जाएंगे।

इसी तरह से निरंजन शाह मतदान नहीं कर पाएंगे, क्योंकि सौराष्ट्र एसोसिएट सदस्य बन जाएगा और गुजरात मुख्य सदस्य। इस तरह से बिहार, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना को भी स्वतंत्र राज्य होने के कारण मतदान का अधिकार मिल जाएगा। राष्ट्रीय क्रिकेट क्लब (एनसीसी) अपना मतदान का अधिकार गंवा देगा।

बीसीसीआई के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, ‘आयोग ने कहा कि वे बीसीसीआई की स्वायत्तता को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते, लेकिन कुछ सुझाव बोर्ड की स्वायत्तता में सीधा हस्तक्षेप हैं। शरद पवार की अध्यक्षता के दौरान बीसीसीआई ने खिलाड़ियों को पेंशन की योजना शुरू की थी। पवार अब भी भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं। आप उन्हें 70 साल से अधिक का होने के कारण रोक नहीं सकते।’ चिंता का एक अन्य कारण दो पदों के बीच ब्रेक भी है।

एक अन्य प्रभावशाली अधिकारी ने कहा, ‘अगर किसी व्यक्ति ने सचिव या कोषाध्यक्ष के रूप में अच्छा काम किया है, तो फिर आप प्रशासक के रूप में उसे अच्छा काम करने से क्यों रोकना चाहते हो। साथ ही आप कार्यकाल को सीमित कैसे कर सकते हो। हम सरकार से सहायता नहीं लेते। चयन समिति का आकार घटाकर तीन सदस्यों का कर दिया गया है। तीन चयनकर्ता चार से पांच महीने में 27 रणजी ट्राफी टीमों पर कैसे ध्यान दे सकते हैं।’


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