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नौ साल में हुईं 19 सर्जरी...शायना के जज्बे को नहीं जला पाया तेजाब...

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नौ साल में हुईं 19 सर्जरी...शायना के जज्बे को नहीं जला पाया तेजाब...
नई दिल्ली: शायना की यादें ताजा हो जाती हैं... जब वह उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में शांति निकेतन पब्लिक स्कूल जाती थी, जहां वह कभी शिक्षिका थी. नौ साल पहले अंतिम बार स्कूल गई थीं और इसके बाद से अब तक 30 वर्षीय शायना की 19 सर्जरी हो चुकी हैं.
 
shaina ghaziabad

वह 2009 का अगस्त का महिना था. एक बच्चे के नर्सरी में एडमिशन पर चर्चा करने के लिए दो व्यक्ति शायना के दफ्तर में आए थे. जब शायना ने उन्हें फार्म देने के लिए मुड़कर कैबिनेट खोला तभी उन्होंने एक स्टील का टिफिन बॉक्स खोला और उस पर एसिड (तेजाब) फेंक दिया. यह एक आदमी के शादी के प्रस्ताव से इनकार करने का बदला था. इस घटना ने शायना का पूरा जीवन बदल दिया.
 
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शायना पर हमला अचानक हो गया था और इस घटना ने शिक्षकों को जड़वत कर दिया था. यही कारण था कि चिकित्सा सहायता में देरी हुई. कुछ ने सुझाव दिया कि शायना के शरीर पर पानी डाला जाए तो किसी ने कहा दूध डालो. शायना याद करती है कि वह अत्यधिक कष्टदायक दर्द था. उसकी कमीज एक जले हुए कागज की तरह शरीर से छूटकर गिर गई थी. एक शिक्षिका उसके लिए  एक शॉल लाई और फिर उसे अस्पताल ले जाया गया.
 
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शायना तब छोटी थी. कक्षा 10 पास हो गई थी और एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में बहुत अच्छी तरह से काम कर रही थी. स्कूल के संस्थापक ने उसे अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी दे दी थीं. वह तब शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहती थी.
 
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शायना कहती है कि "जिन लोगों ने मुझे इस हाल में पहुंचाया वे अब सलाखों के पीछे हैं. घटना के डेढ़ साल बाद हमलावरों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी." उसके स्कूल के मालिक ने उसके लिए एक वकील की व्यवस्था करने में मदद की थी.
 
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शायना का घर उसके विद्यालय से पांच मिनट की दूरी पर है. उसके माता-पिता नवाबुद्दीन और शमीम बानो ने उसे हर वक्त मदद की.

हालांकि सरकार एसिड हमले के पीड़ितों के लिए शल्य चिकित्सा के व्यय का भुगतान करती है, लेकिन ऑपरेशन के बाद की देखभाल पर होने वाला खर्च इसमें शामिल नहीं होता. शायना के पिता एक फैशन ब्रांड स्टोर में टेलर के रूप में काम करते थे. उन्होंने शायना की देखभाल पर होने वाले खर्च का भुगतान करने के लिए अपना घर बेच दिया. काफी कम वेतन और परिवार में सात बच्चे. इस पर शायना की देखभाल, इलाज पर लाखों का खर्च.. उन्होंने अपनी हैसियत से काफी अधिक व्यय किया.

आज एक छोटे कमरे वाले किराये के मकान में रह रहे शायना के माता-पिता बिस्तर तक ही सीमित हैं. हालांकि नवाबुद्दीन और उनकी पत्नी अभी भी काम कर रही हैं. वे अपने बिस्तर पर ही कुशन कवरों को सिलाई करते हैं और शायना उन्हें पैक करने व बेचने में मदद करती है.
 
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शायना की आंखों की चार सर्जरी हुईं. आइब्रो और पलकें बनाई गईं. नाक की चार सर्जरी हुईं. हाथ की दो शल्य चिकित्सा और होंठ की एक सर्जरी हुई. हाथों के संचालन के लिए चार और दो गर्दन के संचालन के लिए दो सर्जरी हुईं. अब शायना ने बुर्का त्याग दिया है. एसिड हमले के कई सालों बाद तक उसने उसे देखकर लोगों के चेहरे पर डर देखा. और इसीलिए अपना चेहरा झुपाए रखा.
 
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काफी कोशिशों के बावजूद शायना की बांयी आंख में रोशनी नहीं आ सकी. उसको उम्मीद है कि बांयी आंख में दृष्टि वापस लाने के लिए वह पर्याप्त पैसा इकट्ठा कर सकेगी. वह पारिवारिक आय बढ़ाने के लिए चिप बनाना चाहती है और अपने भाई की मदद करती है. इलाज पर खर्च होने वाली राशि 2.5 लाख है, जो कि बड़ी है, लेकिन शायना को यकीन है कि यह होगा.
 
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हालांकि एसिड हमले ने शायना को शारीरिक और भावनात्मक रूप से तोड़ दिया है, लेकिन इसके बावजूद शायना उन सभी लोगों की मदद में पीछे नहीं रहती जो उसकी तरह पीड़ित हैं.
 
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दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा के पास रहने वाली शायना सप्ताह में दो बार अपने घर से दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल तक 25 किमी की यात्रा करती है. यह वह जगह है जहां उसका उपचार हुआ था. वह दो ऑटो बदलती है, एक मेट्रो लेती है और फिर अस्पताल तक पैदल जाती है. अब वह अन्य एसिड-हमले के पीड़ितों की सहायता के लिए अस्पताल में अपने संपर्कों का उपयोग करती है.
 
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वर्ष 2013 में शायना ने आत्महत्या करने का प्रयास किया था. वह बालकनी से कूद गई थी. आघात, दर्द और एक अज्ञात भविष्य के डर से वह अवसाद में थी. वह बच गई लेकिन इससे उसके जख्मी शरीर का एक पैर और टूट गया.
 
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आज शायना सकारात्मकता से भरी है. वह कहती है "आपको जीवन केवल एक बार मिला है, और यह आप पर निर्भर है कि आप जीवन को कैसा बनाना चाहते हैं." वह कहती है "किसी ने मुझ पर एसिड फेंक दिया और मेरा जीवन लगभग समाप्त हो गया. लेकिन मैंने खुद को संभाल लिया. मैं चाहूंगी कि अन्य एसिड हमला पीड़ित भी इसी तरह से सोचें और आगे बढ़ें."


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