आम आदमी पार्टी के पांच साल : उतार चढ़ाव से गुजरता रहा सफर

आम आदमी पार्टी (आप) पांच साल पहले काफी धूम-धड़ाके के साथ राजनीतिक परिदृश्य पर आयी थी लेकिन उसका विकास उस कंपनी के स्टॉक की भांति रहा जिसका आईपीओ शेयर बाजार में ब्लॉकबस्टर था लेकिन उसकी तकदीर हर साल उतार चढ़ाव से गुजरती रही.

आम आदमी पार्टी के पांच साल : उतार चढ़ाव से गुजरता रहा सफर

दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली:

आम आदमी पार्टी (आप) पांच साल पहले काफी धूम-धड़ाके के साथ राजनीतिक परिदृश्य पर आयी थी लेकिन उसका विकास उस कंपनी के स्टॉक की भांति रहा जिसका आईपीओ शेयर बाजार में ब्लॉकबस्टर था लेकिन उसकी तकदीर हर साल उतार चढ़ाव से गुजरती रही. पांच साल पहले जब इस पार्टी का गठन किया गया था तब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने खुद को आम आदमी के शुभंकर के रूप में पेश किया था और उन्होंने लोगों की आकांक्षाओं पर सवार होकर शीघ्र ही दिल्ली विधानसभा में महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की और फिर विधानसभा पर काबिज हो गयी. केजरीवाल ने शीघ्र ही खुद को भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता से नेता के रूप में स्थापित किया और उनकी अपील शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में थी. लेकिन अब केजरीवाल का प्रभाव क्षीण होता जान पड़ता है और वह राष्ट्रीय राजधानी में सिमट कर रह गये हैं.

अमेरिका के तथ्यान्वेषी संस्थान प्यू रिसर्च सेंटर के हाल के सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2015 में केजरीवाल के पक्ष में भारतीयों के बीच 60 फीसद अनुकूल राय थी जो 2017 में घटकर 39 फीसदी रह गयी. पिछले पांच सालों में 'आप' ने चार विधानसभा चुनाव (दिल्ली में 2013 और 2015 में तथा 2017 में पंजाब और गोवा में) लड़े लेकिन वह दिल्ली में ही जोरदार मौजदूगी कायम कर पायी.

ऐसा जान पड़ता है कि अन्य राज्यों में हार से उसकी राष्ट्रीय आकांक्षाएं धूल-धुसरित हो गयीं. कांग्रेस का विकल्प बनने की उसकी योजना औंधे मुंह गिरी और पंजाब में कांग्रेस से उसे करारी शिकस्त मिली. आप ने पहले घोषणा की थी कि वह गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ेगी. केजरीवाल और उनकी टीम ने कई बार राज्य में प्रचार भी किया. लेकिन अब वह वहां महज कुछ सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

VIDEO: आम आदमी पार्टी के पांच साल पूरे

जहां तक पार्टी के मामलों की बात है तो केजरीवाल ने उस पर अपनी कड़ी पकड़ बनाए रखी है. उनके पुराने साथी याद करते हैं कि एक समय था जब आप के पोस्टर पर नौ चेहरे- केजरीवाल, सह संस्थापक प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, श्रम मंत्री गोपाल राय, पार्टी नेता कुमार विश्वास, संजय सिंह, पंकज गुप्ता और इल्यास होते थे. लेकिन आज केजरीवाल ही पार्टी का एकमात्र चेहरा हैं.

केजरीवाल के कामकाज के तौर तरीके पर सवाल खड़ा करने के बाद भूषण और यादव पार्टी से निकाल दिये गये. हाशिये पर धेकेले जाने के बाद काजमी पार्टी से निकल गये. विश्वास का वर्तमान नेतृत्व के साथ खटास का संबंध है. अब नये राजनीतिक संगठन स्वराज इंडिया के अध्यक्ष यादव ने कहा कि आप स्वच्छ राजनीति, सुशासन, टिकाऊ विपक्ष जैसे अपने आदर्शों पर विफल रही है.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)

 
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