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डीडीए ने दिव्यांग अधिकारी को किया अपमानित, नियुक्ति के एक घंटे बाद हटाया

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डीडीए ने दिव्यांग अधिकारी को किया अपमानित, नियुक्ति के एक घंटे बाद हटाया

अधिकारी ऋषिराज भाटी को डीडीए ने ज्वाइन करने के एक घंटे बाद ही हटा दिया.

नई दिल्ली: देश में विकलांगों का सम्मान होना चाहिए और उनकी बराबरी हक और दर्जा मिलना चाहिए इसलिए खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द  इस्तेमाल करने की बात कही. लेकिन केंद्र सरकार के विभाग डीडीए ने एक विकलांग शख्स को पहले नियुक्त किया और फिर उसकी लाचारी का हवाला देते हुए केवल एक घंटे में पद से हटा दिया.

डॉ ऋषिराज भाटी बीते 26 साल से दिल्ली सरकार के अलग-अलग विभागों में काम कर रहे हैं. दिल्ली ट्रांसको के जनसंपर्क विभाग में 16 साल काम किया.  हाल ही में दिल्ली विकास प्राधिकरण के डायरेक्टर जनसंपर्क नियुक्त हुए. उन्होंने 10 जनवरी को जिम्मा संभाला और एक घंटे के भीतर उनको पद से हटा दिया गया क्योंकि वे विकलांग हैं.

डॉ ऋषिराज भाटी के मुताबिक '10 जनवरी को दोपहर को मैंने जिम्मा संभाला और एक घंटे में ही मुझे कह दिया गया कि आप यहां काम नहीं कर पाएंगे और आपको वापस जाना होगा क्योंकि आप विकलांग हैं. यह बहुत ही अपमानित करने जैसा है' ऋषिराज के मुताबिक इस पद के लिए निकले विज्ञापन में कहीं भी शारीरिक क्षमता वाली बात नहीं लिखी थी. ऋषिराज पोलियो के शिकार हैं लेकिन सालों से अपना काम सामान्य तौर पर कर रहे हैं.

डीडीए ने दिल्ली ट्रांसको को खत लिखकर बताया 'आपको सूचित किया जाता है कि डीडीए में डायरेक्टर (जनसंपर्क) का पद स्वभावतः फील्ड वर्क वाला होता है जिसमे अधिकारी को डीडीए की विभिन्न साइट्स पर मौजूद होना होता है, जैसे डीडीए पार्क, तोड़फोड़ वाली साइट, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, बायो डायवर्सिटी पार्क वगैरह. जिसमें अफसर की बड़े पैमाने पर बाहर की ड्यूटी होती हैं. जिसमें शारीरिक काम भी होता है. इस पद के साथ जुड़ी जिम्मेदारी को देखते हुए श्री ऋषिराज भाटी को परेशानी हो सकती है और ये डीडीए के हित में भी नहीं होगा. इसलिए ऋषिराज भाटी को तुरंत उनके पिछले विभाग दिल्ली ट्रांसको में वापस भेजा जा रहा है.'

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डीडीए के अध्यक्ष यानी एलजी अनिल बैजल और उपाध्यक्ष उदयप्रताप सिंह से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने इस मसले पर कुछ नहीं कहा.

सवाल यह नहीं कि डॉ ऋषिराज भाटी जनसंपर्क निदेशक पद की जिम्मेदारी संभालने के लायक हैं या नहीं. निदेशक स्तर के अधिकारी का जिम्मा काम करवाना होता है, खुद कोई शारीरिक मेहनत करना नहीं. बल्कि सवाल यह है कि नियुक्ति के बाद इस तरह से दलील देकर पद से हटाना इस शख्स के आत्मसम्मान के साथ खिलवाड़ नहीं है? क्या डीडीए जैसे सरकारी विभाग में नियुक्ति इस तरह से होती है कि पहले नियुक्ति कर ली और बाद में दूसरी बातें याद आईं?


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