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ये सिर्फ तस्वीरें नहीं आपदा के दौरान मानव संघर्ष की कहानियां हैं

फोटो संग्रह के बारे बताते हुए अंशु गुप्ता एनडीटीवी से कहते हैं कि उनकी इस यात्रा की शुरुआत कॅालेज के दिनो से हुई जब 1991 में उत्तरकाशी में आये भूकंप से देश दहल गया था.

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ये सिर्फ तस्वीरें नहीं आपदा के दौरान मानव संघर्ष की कहानियां हैं

आपदा के दौरान खींची गई तस्वीरों की फोटो गैलरी लगाई गई है.

नई दिल्ली:

'गूंज' पिछले दो दशकों में अपने आपदा-राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए पूरे देश भर में जाना जाता है. इसी कड़ी में गूंज ने पिछले 2 दशकों से जमीनी हकीकत से मिली सीख व आपदा मिथकों और इसकी वास्तविकताओं पर आधारित एक प्रदर्शनी का आयोजन किया इसमें 45 तस्वीरें हैं जिन्हें गूंज के संस्थापक और रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित अंशु गुप्ता ने खुद खींची हैं. भारत भर में आपदाओं को करीब से देखने व अपनी व्यक्तिगत यात्रा के दौरान ये तस्वीरें लीं गईं हैं जो आपको कश्मीर से लेकर केरल, असम से लेकर गुजरात तक आपदाओं से रुबरु कराती हैं. इस प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य इन आपदाओं के इर्द गिर्द घूनने वाले मिथकों, साक्ष्य के साथ इसकी वास्तविकता और इन आपदाओं को लेकर पनपी गलतफहमी को दूर करना है. गूंज की सह- संस्थापक मीनाक्षी गुप्ता कहती है कि इसका मतलब एक प्रतिध्वनि या तरंग. एक ऐसा सामाजिक उद्यम जिसे बहुत सारे पुरस्कारों से नवाज़ा गया है. गूंज पूरे ग्रामीण भारत के बड़े पैमाने पर विकास कार्यों को पूरा करने के लिए शहरों के कम उपयोगी सामान का इस्तेमाल करता है. प्रतिवर्ष 4000 टन से अधिक सामग्री के साथ काम करते हुए गूंज इस सामग्री को एक संसाधन के रूप में, ग्रामीण समुदायों को गरिमा के साथ एक समानांतर मुद्रा के रूप में पहुंचाता है. गूंज के काम से आपदा-राहत और पुनर्वास कार्य में व्यवस्थित परिवर्तन हुए हैं. इतना ही नहीं गूंज ने मासिक धर्म स्वच्छता के सबसे वर्जित समझे जाने वाले मुद्दे को भी सबके सामने रखा है और एक व्यवहारिक समाधान के रूप में साफ सूती कपड़ा प्रदान किया है. 

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फोटो संग्रह के बारे बताते हुए अंशु गुप्ता एनडीटीवी से कहते हैं कि उनकी इस यात्रा की शुरुआत कॅालेज के दिनो से हुई जब 1991 में उत्तरकाशी में आये भूकंप से देश दहल गया था. पिछले 20 सालों में आई अनेक आपदाओं में सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक होने के नाते उनकी कोशिश रही है कि चित्रों के माध्यम राहत कार्यों के दृश्य और अदृश्य पहलुओं को करीब से देखा जाए. ख़ासकर आपदा के शिकार लोगों को हमें क्या देना चाहिए और उनके लिए हकीकत में किसकी आवश्यकता है. 

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उन्होंने आगे कहा कि यह प्रदर्शनी सभी लोगों को देखना चाहिए ख़ासकर उन लोगों को जिन्होंने कभी आपदा-राहत और पुनर्वास के काम में योगदान दिया है या ऐसे कामों से जुड़ा रहा है. यह प्रदर्शनी आपदाओं को लेकर लोगों के बीच एक बेहतर समझ और सहानुभूति बनाने में मददगार होगा.” साल 2019 में गूंज के 2 दशक के समारोहों के एक हिस्से के रूप में आयोजित की गई ये प्रदर्शनी गूंज के काम से पूरी दुनिया, इसके प्रतिबिंब, अंतर्दृष्टि और सीखने के साथ साझा करता है. 

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