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होली पर विशेष : गुलाल ने कैदियों के जीवन में भर दिए कई रंग

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होली पर विशेष : गुलाल ने कैदियों के जीवन में भर दिए कई रंग

जेल और कैदी, इन दोनों ही शब्दों से हमारा समाज तय दूरी बनाकर रखना चाहता है। लेकिन इस सच्चाई को पूरी मनोस्थिति से कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि न तो जेल इस दुनिया के बाहर की चीज है और न ही कैदी किसी बाहरी दुनिया के प्राणी हैं। यह सब हमारी सामाजिक व्यवस्था का ही एक हिस्सा हैं।

जेल में जो बंद है, कोई जरूरी नहीं कि वो प्रवृति से अपराधी है, अथवा उसमें सुधार की कोई गुंजाइश ही नही है, बल्कि अधिकतर मामलों में सुधार की गुंजाइश होती है। अगर जरूरत है तो बस उनके मन और आत्मा के स्तर पर सुधार के प्रयास करने की। अपराध को कम करने के लिए जरूरी है कि अपराधी को सुधारने की दिशा में काम किया जाए।
 


जेलों और कैदियों के बीच हस्तक्षेप के माध्यम से अपराध रोकने की दिशा में काम कर रही एनजीओ 'अंतरक्रान्ति' द्वारा जारी एक रपट में कई ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं जो अपराधियों के सुधार की दिशा में एक नजीर की तरह हैं। सितम्बर 2015 में रिहा हो चुके आठ कैदियों के साथ अंतरक्रान्ति ने नेचुरल हर्बल गुलाल बनाने का काम स्टार्ट-अप के रूप में शुरू किया। यह पूरा का पूरा प्रोजेक्ट उन आठ कैदियों, जिनमें से कुछ पर मर्डर इत्यादि के गंभीर आरोप भी रहे हैं के साथ शुरू हुआ। संस्था के प्रयासों से उनके जीवन में अतुलनीय परिवर्तन आया है।

संस्था ने यह प्रकल्प 2010 में 'फेस्टिवल्स ऑफ़ इंडिया' सीरीज़ के साथ दिल्ली के तिहाड़ जेल से शुरू किया गया, जिसमें कैदियों को दीये व राखी बनाना सिखाया जाता था और समय के साथ अब यह प्रकल्प काफी बड़ा हो चुका है। सन 2010 में जब इस प्रोजेक्ट को शुरू किया गया था, तब कुल 500 किलो गुलाल कैदियों द्वारा बनाया गया था, जबकि वर्तमान में यह 7000 किलो तक पहुंच चुका है।
 


चूंकि इस प्रक्रिया में जेल और कैदी दोनों जुड़े रहे हैं, इसलिए अरारोट जैसे खाद्य पदार्थों से बना व इको-फ्रेंडली आकर्षक पैकिंग में पैक यह गुलाल गुणवत्ता आदि के लिहाज से ध्यान में रखा जाता है कि यह त्वचा के लिए है, इसलिए हानिकारक बिल्कुल न हो।

तिहाड़ की जेल संख्या 5 में डकैती और लूट जैसे मामलों में बंद विपिन जब से इस कार्य से जुड़े तब से और अब रिहाई के बाद भी वे गुलाल बनाने के काम में लगकर बेहतर समाजिक जीवन जी रहे हैं। विपिन बताते हैं, 'हम वह गुलाल बनाते हैं जिसमें केसर, चन्दन, गुलाब जैसे गुणकारी पदार्थ हों। गुलाल बेशक लोगों के चेहरे का रंग एक दिन के लिए बदलने के लिए जाना जाता हो, लेकिन इसने हमारे और हमारे जैसे कई साथियों के जीवन का रंग बदल दिया है।

 
आश्चर्य की बात है कि गुलाल बनाने से जुड़े इस प्रोजेक्ट के इंचार्ज बिहार निवासी हत्या के अपराध में लम्बे समय तक तिहाड़ में बंद रहे और इसी दौरान वे गुलाल बनाने वाली टीम में कौशल विकास यूनिट के जेल संख्या-5 में इंचार्ज भी रहे। जेल संख्या-5 में ही एक नेत्रहीन कैदी जिनको 2010 में 5 साल की हुई थी, इस दौरान जेल में ही 2011 से वह गुलाल बनाने के काम से जुड़ गए।

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आज की तारीख में उनकी कमाई का एक बड़ा स्त्रोत गुलाल बनाना ही है। कैदियों से जुड़कर उनके सुधार की दिशा में काम वाले स्वामी विशालानंद कहते है, 'समाज में अपराध के लिए जिम्मेदार अपराधी को सजा दे देने भर को ही पर्याप्त मान लिया जाता है, जबकि यह पर्याप्त नहीं है। आज यह सोचना ज्यादा जरूरी है कि सजा पा रहे अपराधी के मन से अपराध की प्रवृति को ख़त्म करके उसे समाज की मुख्यधारा के पुन: कैसे प्रतिष्ठित किया जाए?

जब तक इस दिशा में बड़े स्तर पर पहल नहीं होगी, अपराध कम नहीं किया जा सकता है। एक अपराध के लिए किसी को ताउम्र अपराधी की दृष्टि से देखने की बजाय उन उपायों पर काम करने में हमारा यकीन है, जिनसे उनके जीवन स्तर में न सिर्फ सुधार हो बल्कि वे अपने को समाज में बेहतर ढंग से स्थापित भी कर सकें। गुलाल बनाने के माध्यम से कैदियों को इस कार्य में लगाने का हमारा उद्देश्य उनको समाज में पुनर्स्थापित कर प्रतिष्ठा दिलाना ही है।



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