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रिसर्च के लिए जुनून की ज़रूरत: प्रो. वहाजुद्दीन अल्वी साहब

‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी साहित्य के समक्ष चुनौतियां' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय शोधार्थी संगोष्ठी का आयोजन हिंदी विभाग के अनुसंधान परिषद द्वारा जामिया मिल्लिया इस्लामिया में किया गया.

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रिसर्च के लिए जुनून की ज़रूरत:  प्रो. वहाजुद्दीन अल्वी साहब

संगोष्ठी में मौजूद वक्ता

नई दिल्ली: ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी साहित्य के समक्ष चुनौतियां' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय शोधार्थी संगोष्ठी का आयोजन हिंदी विभाग के अनुसंधान परिषद द्वारा जामिया मिल्लिया इस्लामिया में किया गया. कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और जाने–माने आलोचक प्रो. अनिल राय ने कहा कि शोधार्थियों को मौलिक व प्रामाणिक शोध कार्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए अच्छे अनुसंधान करने के लिए मौलिक कार्यों की ओर ध्यान देने की आवश्यक है. इस तरह के अनोखी पहल की शुरुवात करने व इस प्रकार के संगोष्ठियों की योजना बनाने के लिए विभागीय अध्यापकों तथा हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो. हेमलता महिश्वर जी की सराहना की.

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वहीं हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो. हेमलता महिश्वर ने इस प्रकार के आयोजन को शोधार्थियों के लिए सीखने का एक मंच बताया. उन्होंने कहा कि इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए विभागीय शोधार्थियों ने इस तरह के संगोष्ठियों का आयोजन करने का यह दूसरा प्रयास किया है. उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर देते हुए कहा कि इस संगोष्ठी की पूरी योजना शोधार्थियों द्वारा निर्मित की गई है और इस संगोष्ठी का पूरा आयोजन उन्होंने ही किया है जो एक सराहनीय कार्य कहा जा सकता है.

भाषा और मानविकी संकाय के डीन, प्रो. वहाजुद्दीन अल्वी साहब ने कहा कि ऐसी संगोष्ठी शोधार्थियों के लिए लाभदायक है. किसी भी विषय पर शोध करने के लिए जूनून की आवश्यकता होती है. जूनून के अभाव में ज्ञान प्राप्त कर पाना संभव नहीं हो सकता और शोध की प्रामाणिकता तभी संभव हो सकती है जब शोधार्थी पूरी लगन और मेहनत के साथ अपने कार्यों को अंजाम दे सके.

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संगोष्ठी के संयोजक डॉ. विवेक दुबे ने कहा कि अनुसन्धान परिषद का यह आयोजन, एक ऐसा आयोजन है, जिसमें शोधार्थियों की रचनात्मक और समीक्षात्मक क्षमता को समझने और उसे परखने के लिए एक आकार मिलेगा. वहीं, विभाग के वरिष्ठतम अध्यापक प्रो. महेन्द्रपाल शर्मा ने कहा कि इस तरह की संगोष्ठी किसी भी विभाग लिए सरहनीय कार्य हो सकती है. इससे निश्चित तौर पर हमारे शोधार्थियों के लिए बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है. इस सत्र का संचलन सदानंद वर्मा ने किया.

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उद्घाटन सत्र के बाद पर ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी साहित्य के समक्ष चुनौतियां' विषय पर कुल छ: सत्रों में 17 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए. जिसमें अध्यक्ष के रूप में शोधार्थियों ने तथा पर्यवेक्षक के रूप में विभागीय अध्यापकों ने विविध सत्रानुसार अपनी-अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं से कार्यक्रम को सफल बनाने में महती भूमिका निभाई. संगोष्ठी में भाग लेने वाले शोधार्थियों में जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्व विद्यालय, मिजोरम विश्व विद्यालय, पंजाब विश्व विद्यालय, कश्मीर विश्व विद्यालय, हैदराबाद विश्व विद्यालय, अलीगढ़ विश्व विद्यालय, जौनपुर विश्व विद्यालय, आदि संस्थानों के शोधार्थियों ने अपने-अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए. 

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