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जानिए क्यों मनाते हैं रंग पंचमी त्यौहार और इससे जुड़ी मान्यताएं

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जानिए क्यों मनाते हैं रंग पंचमी त्यौहार और इससे जुड़ी मान्यताएं
रंग पंचमी त्यौहार हिन्दू पंचांग के अनुसार, चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि मनाया जाता है. देखा जाए तो यह रंगों के त्यौहार होली का विस्तार है, जो उत्तर भारत, विशेषकर हिंदी भाषी क्षेत्र, में लोकप्रिय है. उत्तर भारत में होली की शुरुआत श्री पंचमी से ही हो जाती है, जो कि चैत्र माह की पंचमी तिथि तक चलती रहती है. इसलिए रंगपंचमी को होली का अंतिम दिन भी कहा जाता है. मथुरा, वृंदावन, इंदौर, जयपुर, उदयपुर और गुजरात के द्वारका में यह पर्व विशेष उल्लास से मनाया जाता है.  
विविधताओं के देश भारत में होली को लेकर भी अनेक विविधताएं मिलती हैं. भारत में कई स्थानों पर होली के बाद रोजाना होली खेली जाती है, कहीं 5 दिन बाद तक तो कहीं 7 दिन बाद तक. कुछ स्थानों पर होली के पांचवें दिन यानी चैत्र कृष्ण पंचमी को रंग पंचमी का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है.  
पारंपरिक रिवाजों के अनुसार, रंगपंचमी के दिन कई स्थानों पर लोग होली की तरह ही एक-दूसरे के शरीर पर रंग व गुलाल डालकर यह पर्व मनाते हैं. कहते हैं, होली के दिन प्रदीप्त हुई अग्नि को 5 दिन तक लगातार प्रज्वलित करने वायुमंडल के रज-तम कणों का विघटन होता है और ब्रह्मांड में संबंधित देवता का रंग रूपी सगुण तत्व कार्यानुमेय संबंधित विभिन्न स्तरों पर अवतरित होता है. इसलिए उसका आनंद एक प्रकार से रंग उड़ा कर रंगपंचमी के दिन मनाया जाता है. इसलिए यह त्यौहार रज-तम के विघटन से अनिष्ट शक्तियों के उच्चाटन व कार्य की समाप्ति का प्रतीक भी है.

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