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Kartik Purnima 2019: 12 नवंबर को है कार्तिक पूर्णिमा, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा

कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) का विशेष महत्‍व है. मान्‍यता है कि इस दिन महादेव ने त्रिपुरासुर नाम के राक्षस का वध किया था. इसी खुशी में देवताओं ने देव दीपावली (Dev Deepawali) मनाई थी. इसी दिन गुरु नानक जयंती (Guru Nanak Jayanti) भी होती है.

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Kartik Purnima 2019: 12 नवंबर को है कार्तिक पूर्णिमा, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा

Kartik Purnima: कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान करना शुभ माना जाता है

नई दिल्‍ली:

कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) सभी पूर्णिमाओं में श्रेष्‍ठ मानी जाती है. मान्‍यता है कि इस दिन भगवान शिव ने देवलोक पर हाहाकार मचाने वाले त्रिपुरासुर नाम के राक्षस का संहार किया था. उसके वध की खुशी में देवताओं ने इसी दिन दीपावली मनाई थी. हर साल लोग कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली (Dev Deepawali) मनाते हैं.  हिन्‍दू मान्‍यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान विष्‍णु ने मत्‍स्‍यावतार लिया था.  इस दिन गंगा समेत अन्‍य पवित्र नदियों में स्‍नान करन पुण्‍यकारी माना जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर दीपदान करना भी विशेष फलदायी होता है. यही नहीं कार्तिक मास की पूर्णिमा (Purnima) को ही सिख धर्म के संस्‍थापक और पहले गुरु नानक देव (Guru Nanak Dev) का जन्‍म हुआ था. उनके जन्‍मोत्‍सव को गुरु नानक जयंती (Guru Nanak Jayanti) के रूप में मनाया जाता है. 

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कार्तिक पूर्णिमा कब है?
हिन्‍दू कैलेंडर में आठवें महीने का नाम कार्तिक है. कार्तिक महीने की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है. ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा हर साल नवंबर के महीने में आती है. इस बार कार्तिक पूर्णिमा 12 नवंबर 2019 को है.


कार्तिक पूर्णिमा की तिथि और शुभ मुहूर्त (Kartik Purnima Date, Time)
कार्तिक पूर्णिमा की तिथि:
12 नवंबर 2019
पूर्णिमा तिथि आरंभ: 11 नवंबर 2019 को शाम 06 बजकर 02 मिनट से 
पूर्णिमा तिथि समाप्‍त: 12 नवंबर 2019 को शाम 07 बजकर 04 मिनट तक 

कार्तिक पूर्णिमा का महत्‍व (Kartik Purnima Significance)
हिन्‍दू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) का विशेष महत्‍व है. कार्तिक मास को दामोदर के नाम से भी जाना जाता है और दामोदर भगवान विष्‍णु का ही एक नाम है. हिन्‍दू कैलेंडर के सभी 12 महीनों में से कार्तिक मास को सबसे पवित्र और शुभ माना जाता है. इस दौरान लोग पूरे महीने गंगा तथा अन्‍य पवित्र नदियों में स्‍नान करते हैं. कार्तिक मास के पवित्र स्‍नान की शुरुआत शरद पूर्णिमा से होती है और इसका समापन कार्तिक पूर्णिमा के दिन होता है. मान्‍यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्‍नान करने से पुण्‍य प्राप्‍त होता है. शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए भी कार्तिक पूर्णिमा का दिन बेहद अच्‍छा माना जाता है.

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कार्तिक पूर्णिमा से चार दिन पहले देवउठनी या प्रबोध‍िनी एकादशी के दिन से सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है. कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले बैकुंड चतुर्दशी मनाई जाती है. मान्‍यता है कि इसी दिन भगवान विष्‍णु ने महादेव शिव की पूजा की थी और उन्‍हें एक हजार कमल पुष्‍प अर्पित किए थे. कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही देव दीपावली भी होती है. मान्‍यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नाम के राक्षस का वध किया था. यह वजह है कि कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा (Tripurari Purnima) के नाम से भी जाना जाता है. कहते हैं कि त्रिपुरासुर ने देवताओं को हराकर उनके सिंहासन पर कब्‍जा कर लिया था. जब वह मारा गया तो देवताओं ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीवाली मनाई. देवताओं ने उसके वध की खूशी में दीए जलाए. यही वजह है कि इस दिन मंदिरों और गंगा के घाटों में दीपक जलाए जाते हैं. 

कार्तिक पूर्णिमा की पूजा विधि (Kartik Purnima Puja Vidhi)
- कार्तिक पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र नदी में स्‍नान करें. मान्‍यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्‍नान करने से पुण्‍य की प्राप्‍ति होती है. अगर पवित्र नदी में स्‍नान करना संभव नहीं तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्‍नान करें. 
- रात्रि के समय विधि-विधान से भगवान विष्‍णु और मां लक्ष्‍मी की पूजा करें. 
- सत्‍यनारायण की कथा पढ़ें, सुनें और सुनाएं. 
- भगवान विष्‍णु और मां लक्ष्‍मी की आरती उतारने के बाद चंद्रमा को अर्घ्‍य दें. 
- घर के अंदर और बाहर दीपक जलाएं. 
- घर के सभी सदस्‍यों में प्रसाद वितरण करें. 
- इस दिन दान करना अत्‍यंत शुभ माना जाता है. किसी ब्राह्मण या निर्धन व्‍यक्ति को भोजन कराएं और यथाशक्ति दान और भेंट देकर विदा करें. 
- कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर दीपदान करना भी बेहद शुभ माना जाता है.

कार्तिक पूर्णिमा का कथा (Kartik Purnima Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर नाम का एक राक्षस था. उसके तीन पुत्र थे - तारकक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली. भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिक ने तारकासुर का वध किया. अपने पिता की हत्या की खबर सुन तीनों पुत्र बहुत दुखी हुए. तीनों ने मिलकर ब्रह्माजी से वरदान मांगने के लिए घोर तपस्या की. ब्रह्मजी तीनों की तपस्या से प्रसन्न हुए और बोले कि मांगों क्या वरदान मांगना चाहते हो. तीनों ने ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने को कहा. 
 
तीनों ने मिलकर फिर सोचा और इस बार ब्रह्माजी से तीन अलग नगरों का निर्माण करवाने के लिए कहा, जिसमें सभी बैठकर सारी पृथ्वी और आकाश में घूमा जा सके. एक हज़ार साल बाद जब हम मिलें और हम तीनों के नगर मिलकर एक हो जाएं, और जो देवता तीनों नगरों को एक ही बाण से नष्ट करने की क्षमता रखता हो, वही हमारी मृत्यु का कारण हो. ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया.

तीनों वरदान पाकर बहुत खुश हुए. ब्रह्माजी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया. तारकक्ष के लिए सोने का, कमला के लिए चांदी का और विद्युन्माली के लिए लोहे का नगर बनाया गया. तीनों ने मिलकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया. इंद्र देवता इन तीनों राक्षसों से भयभीत हुए और भगवान शंकर की शरण में गए. इंद्र की बात सुन भगवान शिव ने इन दानवों का नाश करने के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया. 

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इस दिव्य रथ की हर एक चीज़ देवताओं से बनीं. चंद्रमा और सूर्य से पहिए बने. इंद्र, वरुण, यम और कुबेर रथ के चाल घोड़े बनें. हिमालय धनुष बने और शेषनाग प्रत्यंचा बनें. भगवान शिव खुद बाण बनें और बाण की नोक बने अग्निदेव. इस दिव्य रथ पर सवार हुए खुद भगवान शिव. 

भगवानों से बनें इस रथ और तीनों भाइयों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. जैसे ही ये तीनों रथ एक सीध में आए, भगवान शिव ने बाण छोड़ तीनों का नाश कर दिया. इसी वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाने लगा. यह वध कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ, इसीलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा नाम से भी जाना जाने लगा.



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