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नेपाल में बनेगी महर्षि वेदव्‍यास की 108 फीट ऊंची मूर्ति, महागुरु ने की थी महाभारत और चार वेदों की रचना

महर्षि वेदव्यास (Veda Vyasa) को हिंदू धर्मग्रंथ वेद को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करने का श्रेय दिया जाता है.

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नेपाल में बनेगी महर्षि वेदव्‍यास की 108 फीट ऊंची मूर्ति, महागुरु ने की थी महाभारत और चार वेदों की रचना

महर्षि वेदव्‍यास ने महाभारत की रचना की थी

खास बातें

  1. नेपाल में महर्षि वेदव्‍यास की 108 फुट ऊंची प्रतिमा लगेगी
  2. हिन्‍दू धर्मग्रंथों को विभाजित करने का श्रेय वेदव्‍यास को जाता है
  3. वेदव्‍यास ने ही महाभारत की रचना की थी
नई दिल्‍ली:

पश्चिमी नेपाल के तान्हु जिले के व्यास नगर निगम में महर्षि वेदव्यास (Ved Vyasa) की 108 फुट ऊंची प्रतिमा बनाने की योजना तैयार की गई है. महर्षि वेद व्यास को हिंदू धर्मग्रंथ वेद को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करने का श्रेय दिया जाता है. माना जाता है कि उनका जन्म तान्हु जिले में हुआ था. कहा जाता है कि इसी क्षेत्र के व्यास गुफा में उन्होंने महाभारत की रचना की थी.
प्रस्तावित प्रतिमा का निर्माण जिले के शिव पंच्यान मंदिर में किया जाएगा. इसका उद्देश्य भारत और नेपाल से धार्मिक पर्यटकों को आकर्षित करना है.

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व्यास नगर निगम की उप महपौर मीरा शर्मा ने बताया कि प्रतिमा के निर्माण के लिए 63 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है.


महर्षि वेदव्यास महाभारत के रचयिता थे. महर्षि वेदव्यास का जन्म त्रेता युग के अन्त में हुआ था और वह पूरे द्वापर युग तक जीवित रहे थे. 

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हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास त्रिकालज्ञ थे और उन्होंने दिव्य दृष्टि प्राप्‍त थी. महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया ताकि कम बुद्धि और कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें. महर्षि वेदव्‍यास ने उन ग्रंथों का नाम रखा- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद. वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए. वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पांचवे वेद के रूप में पुराणों की रचना की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है. पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को पढ़ाया. व्यास के शिष्यों ने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन वेदों की अनेक शाखाएं और उप शाखाएं बना दीं. व्यास ने महाभारत की भी रचना की.

महर्षि वेदव्‍यास का जन्‍म आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा को हुआ था. उनके जन्‍मदिवस को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता  है. गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा का विधान है. दरअसल, गुरु की पूजा इसलिए भी जरूरी है क्‍योंकि उसकी कृपा से व्‍यक्ति कुछ भी हासिल कर सकता है. गुरु की महिमा अपरंपार है. गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्‍ति नहीं हो सकती. गुरु को तो भगवान से भी ऊपर दर्जा दिया गया है
 



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