Parivartini (Parsva) Ekadashi 2019: आज है परिवर्तिनी एकादशी, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्‍व

परिवर्तिनी एकादशी को पार्श्व एकादशी के अलावा वामन एकादशी (Vaman Ekadashi), जयझूलनी एकादशी (Jai Jhulni Ekadashi), डोल ग्‍यारस (Dol Gyaras)और जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi) जैसे कई नामों से जाना जाता है.

Parivartini (Parsva) Ekadashi 2019: आज है परिवर्तिनी एकादशी, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्‍व

Parsva Ekadashi 2019: परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी में श्री हरि विष्‍णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है

खास बातें

  • परिवर्तिनी एकादशी का हिन्‍दू धर्म में विशेष महत्‍व है
  • इस दिन भगवान विष्‍णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है
  • मान्‍यता है कि इस व्रत के प्रताप से सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं
नई दिल्‍ली:

परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) या पार्श्व एकादशी (Parsva Ekadashi) का विशेष महत्‍व है. मान्‍यता है कि चौमास यानी कि आषाढ़, श्रावण, भादो और अश्विन में भगवान विष्‍णु सोते रहते हैं और फिर देवउठनी एकादशी के दिन ही उठते हैं. लेकिन इन महीनों में एक समय ऐसा भी आता है जब सोते हुए श्री हरि विष्‍णु अपनी करवट बदलते हैं. यह समय भादो (Bhadra) मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी का होता है. इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं और इस दिन भगवान विष्‍णु के वामन अवतार की पूजा का विधान है. मान्‍यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से भक्‍तों के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं और मृत्‍यु के बाद उन्‍हें स्‍वर्गलोक की प्राप्‍ति होती है. कहते हैं कि परिवर्तिनी एकादशी की कथा पढ़ने या सुनने से हजार अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है.   

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परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) भादो मास के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को आती है. ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक यह हर साल सितंबर के महीने में आती है. इस बार परिवर्तिनी एकादशी 9 सितंबर को है. 

परिवर्तिनी एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त 
परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी की तिथि:
09 सितंबर 2019
एकादशी तिथि प्रारंभ:  08 सितंबर 2019 को रात 10 बजकर 41 मिनट से
एकादशी तिथि समाप्त: 10 सितंबर 2019 को सुबह 12 बजकर 30 मिनट तक
पारण का समय: 10 सितंबर 2019 को सुबह 07 बजकर 04 मिनट से 08 बजकर 35 मिनट तक.

परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी का महत्‍व 
परिवर्तिनी एकादशी को पार्श्व एकादशी के अलावा वामन एकादशी (Vaman Ekadashi), जयझूलनी एकादशी (Jai Jhulni Ekadashi), डोल ग्‍यारस (Dol Gyaras)और जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi) जैसे कई नामों से जाना जाता है. हिन्‍दू धर्म में इस एकादशी का बड़ा महत्‍व है. मान्‍यता है कि इस एकादशी के दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्‍य मिलता है. कहा जाता है कि जो भी इस व्रत को सच्‍चे मन और श्रद्धा भाव से करता है उसे जाने-अंजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है साथ ही मोक्ष की प्राप्‍ति भी होती है.  

परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी की पूजा विधि 
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परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह उठकर स्‍नान करें और स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें.
- अब घर के मंदिर में भगवान विष्‍णु की प्रतिमा, फोटो या कैलेंडर के सामने दीपक जलाएं. 
- अब भगवान विष्‍णु की प्रतिमा को स्‍नान कराएं और वस्‍त्र पहनाएं. 
- इसके बाद विष्‍णु की प्रतिमा को अक्षत, फूल, मौसमी फल, नारियल और मेवे चढ़ाएं. 
- विष्‍णु की पूजा करते वक्‍त तुलसी के पत्ते अवश्‍य रखें. 
- इसके बाद धूप दिखाकर श्री हरि विष्‍णु की आरती उतारें. 
-  परिवर्तिनी एकादशी की कथा सुनें या सुनाएं.
- इस दिन दान करना परम कल्‍याणकारी माना जाता है.
- रात के समय सोना नहीं चाहिए. भगवान का भजन-कीर्तन करना चाहिए. 
- अगले दिन पारण के समय किसी ब्राह्मण या गरीब को यथाशक्ति भोजन कराए और दक्षिणा देकर विदा करें. 
- इसके बाद अन्‍न और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें. 

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परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी व्रत कथा
परिवर्तनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा पढ़ने या सुनने का विधान है. पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था. वह भगवान विष्‍णु का परम भक्त था. विविध प्रकार के वेद सूक्तों से वह उनका पूजन किया करता था. वह नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया. इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए. बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे. फिर श्री हरि विष्‍णु ने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया.

अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली. राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था. उसे दान अवश्य देता था. दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की चाल से अवगत भी करवाया लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया. फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया. भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा.