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जानें कब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था गीता का महान और पवित्र उपदेश

सनातन हिंदू परम्परा में एकादशी का व्रत काफी महत्वपूर्ण मानी गयी है. शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की एकादशियों को मिलाकर वर्ष में कुल चौबीस एकादशियां होती हैं.

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हिन्दू वर्ष का नौवां महीना मार्गशीर्ष जिसे अग्रहायण या अगहन भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में यह पूरा महीना काफी शुभ माना गया है. मान्यता है कि सतयुग में देवताओं ने इसी महीने की पहली तिथि से नववर्ष प्रारम्भ किया था, हालांकि वर्तमान में यह प्रचलित नहीं है. इस महीने के महत्व के बारे में श्रीमदभगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: मासाना मार्गशीर्षोऽयम् अर्थात मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूं.
 
सनातन हिंदू परम्परा में एकादशी का व्रत काफी महत्वपूर्ण मानी गयी है. शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष की एकादशियों को मिलाकर वर्ष में कुल चौबीस एकादशियां होती हैं. मार्गशीर्ष महीने की शुक्लपक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है. मान्यता है कि यह एकादशी मोह का क्षय यानी नाश करती है.

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मोक्षदा एकादशी से शुरु होता है गीता-पाठ का अनुष्ठान
 
द्वापर युग में महाभारत युद्ध शुरु होने से पहले पाण्डुपुत्र अर्जुन को जब मोह और संशय उत्पन्न हुआ था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने मोक्षदा एकादशी के दिन उन्हें श्रीमदभगवद्गीता का महान और सार्वकालिक उपदेश दिया था. यही कारण है कि यह एकादशी 'गीता जयंती' के रुप भी मनाई जाती है.
 
मान्यता है इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करना चाहिए और रोज थोड़ा समय निकाल कर गीता जरुर पढ़नी चाहिए. लोगों का मानना है कि गीतारूपी सूर्य के उज्जवल प्रकाश से अज्ञानरूपी अंधकार नष्ट हो जाता है और मोह का नाश हो जाता है, जैसा कि अर्जुन का हुआ था.


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