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कौन हैं तुलसी? गणेश पूजा में क्यों नहीं चढ़ाई जाती तुलसी? क्या है रविवार को तुलसी ना तोड़ने का कारण

पूजा, यज्ञ, हवन, शादी और मुंडन जैसे अनेकों शुभ काम तुलसी के बिना अधूरे हैं. इसी के साथ तुलसी को लेकर कुछ और मान्यताएं भी हैं. जैसे रविवार के दिन तुलसी नहीं तोड़ी जाती और भगवान गणेश की पूजा में कभी भी तुलसी का इस्तेमाल नहीं किया जाता.

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कौन हैं तुलसी? गणेश पूजा में क्यों नहीं चढ़ाई जाती तुलसी? क्या है रविवार को तुलसी ना तोड़ने का कारण

गणेश पूजा में क्यों नहीं चढ़ाई जाती तुलसी? जानिए कारण

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में तुलसी का बहुत महत्व है. हर शुभ काम में तुलसी का इस्तेमाल किया जाता है. पूजा, यज्ञ, हवन, शादी और मुंडन जैसे अनेकों शुभ काम तुलसी के बिना अधूरे हैं. इसी के साथ तुलसी को लेकर कुछ और मान्यताएं भी हैं. जैसे रविवार के दिन तुलसी नहीं तोड़ी जाती और भगवान गणेश की पूजा में कभी भी तुलसी का इस्तेमाल नहीं किया जाता. यहां जानिए तुलसी कौन हैं? और क्यों उन्हें रविवार तो तोड़ा नहीं जाता और क्यों गणेश की पूजा में इनका इस्तेमाल नहीं होता. 

कौन है तुलसी?
प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार एक धर्मात्मज नाम का राजा हुआ करता था. उसकी एक कन्या थी, जिसका नाम था तुलसी. तुलसी यौन अवस्था में थी. वो अपने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर निकली. कई जगहों की यात्रा के बाद उन्हें गंगा किनारे तप करते हुए गणेश जी दिखे. तप के दौरान भगवान गणेश रत्न से जड़े सिंहासन पर विराजमान थे. उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था. गले में उनके स्वर्ण-मणि रत्न पड़े हुए थे और कमर पर रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था. उनके इस रूप को देख माता तुलसी ने गणेश जी से विवाह का मन बना लिया.

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उन्होंने गणेश जी की तपस्या भंग कर उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा. तपस्या भंग करने पर गुस्साए भगवान गणेश ने विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि वह ब्रह्माचारी हैं. इस बात से गुस्साई माता तुलसी ने गणेश जी को श्राप दिया और कहा कि उनके दो विवाह होंगे. इस पर गणेश जी ने भी उन्हें श्राप दिया और कहा कि उनका विवाह एक असुर शंखचूर्ण (जलंधर) से होगा. राक्षक की पत्नी होने का श्राप सुनकर तुलसी जी ने गणेश जी से माफी मांगी.

तब गणेश ने तुलसी से कहा कि वह भगवान विष्णु और कृष्ण की प्रिय होने के साथ-साथ कलयुग में जगत को जीवन और मोक्ष देने वाली होंगी. लेकिन मेरी पूजा में तुम्हें (तुलसी) चढ़ाना अशुभ माना जाएगा. उसी दिन से भगवान गणेश की पूजा में तुलसी नहीं चढ़ाई जातीं.

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शंखचूड़ (जलंधर) नाम का एक राक्षक था. जो समस्त संसार पर राज करना चाहता था. इसी वजह से वो देवताओं से लेकर मनुष्यों तक सभी को अपने शक्ति से पराजित किया करता था. शंखचूड़ ने वृंदा नाम की भगवान विष्णु की परम भक्त से शादी की. वृंदा ही तुलसी थी, जिसे भगवान गणेश ने असुर से शादी का श्राप दिया था. वृंदा के असुर पति शंखचूड़ का देवताओं ने कई बार वध करना चाहा. लेकिन वृंदा के सतीत्व की वजह से वो उसे कोई नहीं मार सकता था. 

इस समस्या के हल के लिए सभी देवगण भगवान विष्णु के पास पहुंचे. उन्होंने वृंदा के सतीत्व के बारे में उन्हें बताया. इस समस्या के हल के लिए खुद भगवान विष्णु शंखचूड़ का रूप धारण कर वृंदा के पास पहुंचे. वृंदा ने उन्हें अपना पति समझ पैर छू लिये, जिससे वृंदा का सतीत्व भंग हो गया. सतीत्व भंग होते ही देवताओं ने शंखचूड़ को मार गिराया.

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इस छल को जान वृंदा ने विष्णु जी को श्राप दिया और कहा जिन्हें मैं बचपन से पूजती आई हूं. उन्हें मेरी भावनाओं की बिल्कुल कद्र नहीं. पत्थर के समान व्यवहार कर मेरी भावनाओं से खेला. मैं आपको श्राप देती हूं कि आप खुद पत्थर के हो जाएंगे. इस बात को जान माता लक्ष्मी क्षमा मांगने वृंदा के पास पहुंची और जगत कल्याण के बारे में बताते हुए श्राप वापस लेने को कहा. 

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माता लक्ष्मी की बात मान वृंदा ने अपना श्राप वापस लिया और खुद अपने पति शंखचूड़ के शव के साथ सति हो गई. भगवान विष्णु ने प्रायच्छित करते हुए खुद के एक रूप को पत्थर का बनाया और उसे शालिग्राम नाम दिया. साथ ही कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं प्रसाद ग्रहण नहीं करूंगा. इसीलिए भगवान गणेश के अलावा सभी देवताओं की पूजा के समय तुलसी अनिवार्य है. वहीं, रविवार का दिन भगवान विष्णु का प्रिय दिन माना जाता है. रविवार के साथ विष्णु जी की प्रिय तुलसी भी हैं, इसीलिए रविवार के दिन तुलसी नहीं तोड़ी जाती.

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