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कर्नाटक में जन्मे, बिहार में जीते, कोकाकोला को भगाया, नीतीश को वाजपेयी से मिलाया, जॉर्ज फर्नांडीज से जुड़ीं 10 बातें जो जाननी चाहिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी फर्नांडीज के निधन पर शोक जाहिर कर उनके परिवार और दोस्तों के प्रति संवेदना व्यक्त की.

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कर्नाटक में जन्मे, बिहार में जीते, कोकाकोला को भगाया, नीतीश को वाजपेयी से मिलाया, जॉर्ज फर्नांडीज से जुड़ीं 10 बातें जो जाननी चाहिए

पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज का निधन (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: पूर्व रक्षा मंत्री एवं प्रख्यात समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस का मंगलवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह 88 वर्ष के थे. उनकी सहयोगी जया जेटली ने यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि फर्नांडिस अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित थे, जिस कारण वह पिछले कई वर्षों से सार्वजनिक जीवन से दूर थे. हाल में उन्हें स्वाइन फ्लू भी हो गया था. जया जेटली ने बताया उनका निधन उनके आवास पर हुआ. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार में फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे, जब 1999 में भारत ने करगिल युद्ध लड़ा था. उनके कार्यकाल के दौरान ही भारत ने 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था. इंदिरा गांधी को मात देकर 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में वह उद्योग मंत्री भी रहे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समाजवादी नेता के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वह स्पष्टवादी तथा निडर थे जो हमेशा अपनी विचारधारा पर अडिग रहे. प्रधानमंत्री ने कहा, 'एक दूरदर्शी रेल मंत्री और एक महान रक्षा मंत्री जिसने भारत को सुरक्षित और मजबूत बनाया. अपने कई वर्षों के सार्वजनिक जीवन में वह अपनी विचारधारा पर अडिग रहे. उन्होंने आपातकाल का जोरदार विरोध किया. उनकी सादगी और विनम्रता उल्लेखनीय थी.' कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी फर्नांडीज के निधन पर शोक जाहिर कर उनके परिवार और दोस्तों के प्रति संवेदना व्यक्त की. गांधी ने फेसबुक पोस्ट में कहा, ''पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज जी के निधन के बारे में सुनकर दुख हुआ.'' उन्होंने कहा, ''दुख की इस घड़ी में उनके परिवार और मित्रों के प्रति मेरी संवेदना है.''
जॉर्ज फर्नांडीज से जुड़ीं 10 बातें जो जाननी चाहिए
  1. तेजतर्रार मजदूर नेता और समाजवादी जॉर्ज फर्नांडीज उन चंद राजनेताओं में से एक थे जिन्होंने जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठ राष्ट्रीय राजनीति पर एक अमिट छाप छोड़ी.  मंगलुरु में 1930 में एक ईसाई परिवार में जन्मे फर्नांडिस धुर कांग्रेस विरोधी नेता थे.
  2. 1990 के दशक के मध्य में भाजपा के साथ उनके गठजोड़ ने गठबंधन की राजनीति में अलग-थलग पड़ी भगवा पार्टी की अश्पृश्यता समाप्त की.  आपातकाल के खिलाफ उनके भूमिगत संघर्ष ने उन्हें एक प्रमुख विपक्षी नेता के रूप में पहचान दी.    
  3. बिखरे बाल और हाथ में बेड़ी वाली उनकी एक तस्वीर उस दौर की सबसे यादगार तस्वीरों में एक है.‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी' के उम्मीदवार के तौर पर चुनावी राजनीति में जोरदार प्रवेश करते हुए फर्नांडीज ने 1967 में दक्षिण मुम्बई निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के अनुभवी नेता एस के पाटिल को मात दी थी.
  4. फर्नांडीज ने एक कुशल मजूदर नेता के तौर पर 1974 में रेलवे हड़ताल में हिस्सा लिया, जिससे देशभर में रेल सेवाएं प्रभावित हुईं और उसे कुचलने के लिये सरकार की ओर से व्यापक कार्रवाई की गई. इसके बाद उन्होंने बिहार के मुजफ्फरपुर का रुख किया, जहां से उन्होंने 1977 में चुनाव जीता.
  5. जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें उद्योग मंत्री बनाया गया और उनके कार्यकाल में बहुराष्ट्रीय कंपनियों कोकाकोला और आईबीएम को अपने भारतीय कारोबार बंद करने पड़े क्योंकि उन्होंने सरकारी नियमनों को काफी कठोर कर दिया था.    
  6. बिहार में लालू प्रसाद समेत राष्ट्रीय राजनीति में कई क्षेत्रिय क्षत्रपों के उदय होने पर कभी भाजपा और आरएसएस के लंबे समय तक घोर आलोचक रहे फर्नांडीज के भाजपा के शीर्ष नेताओं एलके आडवाणी और वाजपेयी के साथ संबंध बेहतर हुए.
  7. ऐसा माना जाता है कि 1995 में बिहार विधानसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार को भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन में लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. 
  8. जब 1999 में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ करगिल युद्ध लड़ा था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार में फर्नांडीज रक्षा मंत्री थे. फर्नांडीज के कार्यकाल में ही भारत ने 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था. 
  9. फर्नांडीज अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित थे, जिस कारण वह पिछले कई वर्षों से सार्वजनिक जीवन से दूर थे और परिवार वाले घर पर ही उनकी देखभाल कर रहे थे.
  10. कुछ लोगों का कहना है कि अल्जाइमर बीमारी के कारण उनकी पार्टी जद (यू) का उन्हें 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए टिकट ना देना और उनका मुजफ्फरपुर में अकेले मैदान में उतरना ही उनके राजनीतिक करियर का अंत था. अफसोस की बात है कि उन्हें उस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. 

इनपुट : भाषा से




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