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बिहार उपचुनाव़: हार-जीत के ये हैं 10 कारण, जिन्हें नजरअंदाज करना दलों के लिए होगा आत्मघाती

बिहार में जिन पार्टियों की जीत हुई है, उनकी जीत में एक से बढ़कर एक कई वजहें हैं, जिन्हें नजर अंदाज करना भविष्य के लिए हानिकारक होगा.

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बिहार उपचुनाव़: हार-जीत के ये हैं 10 कारण, जिन्हें नजरअंदाज करना दलों के लिए होगा आत्मघाती

नीतीश कुमार और लालू यादव (फाइल फोटो)

पटना: बिहार उपचुनाव के परिणाम में जीतने वाली पार्टी ख़ासकर राष्ट्रीय जनता दल और भाजपा राहत की सांस ले रही हैं, लेकिन जीतने वाले दल हो या हारने वाले, जनता दल यूनाइटेड और कांग्रिस पार्टी सब एक बात से सहमत हैं कि ‘सहानुभूति' का सिक्का चला. इन दलों के नेताओं का ये भी मानना हैं कि जीत और हार के कई और कारण थे, जिन्हें नजरअंदाज करना आत्मघाती होगा.
बिहार उपचुनाव में हार-जीत के कारण
  1. सबसे पहले अररिया सीट को राष्ट्रीय जनता दल ने एक बार फिर जीत कर दिखा दिया कि जब तक वोटर के बीच साम्प्रदायिक आधार पर ध्रवीकरण ना हो भाजपा के लिए ये सीट जीतना संभव नहीं होगा. 
  2. बिहार भाजपा के अध्यक्ष नित्यानंद राय द्वारा चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन दिया गया वो बयान कि राष्ट्रीय जनता दल जीतेगी तो अररिया आईएसआई का अड्डा बन जायेगा और भाजपा प्रत्याशी जीता तो ये राष्ट्रवादी शक्तियों का केंद्र होगा, काम नहीं कर पाया. भाजपा नेता मानते हैं कि यह हताशा में दिया गया बयान था.
  3. नेता विपक्ष तेजस्वी यादव का अररिया और जहनानाबद में कैम्प कर प्रचार की कमान संभालना प्रभावी और असरदार रहा. ख़ासकर विधान सभा सत्र के बीच उन्होंने कुछ विधायकों को सदन में रहने का ज़िम्मा दिया और अधिकांश विधायकों को उनके जातीय प्रभाव के इलाक़े में कैम्प करने का ज़िम्मा दिया. 
  4. नीतीश कुमार और सुशील मोदी का हेलिकॉप्टर से चुनावी दौरा असर नहीं डाल सका. नीतीश के सभा में जमा लोगों से संकेत मिल रहे थे कि उनका अपना आधारभूत वोटर भी पार्टी प्रत्याशी के लिये बहुत उत्साहित नहीं रहा.
  5. नीतीश और उनके सहयोगी दलो के प्रत्याशी को शराबबंदी, बालू की समस्या का ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा. ख़ासकर दलित समुदाय के एक बड़े तबके में बहुत शराबबंदी के दौरान उनके लोगों की गिरफ़्तारी से नाराज़गी थी. 
  6. जहानाबाद में 35 हज़ार से अधिक वोटों से नीतीश कुमार के प्रत्याशी की हार इस बात को साबित करती है कि उनके काम काज से भी लोगों में नाराज़गी है. भले वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हों, लेकिन उनकी पार्टी के पास अपने वोटोर को भी एकजुट रखने की क्षमता नहीं है. नीतीश की पार्टी के अधिकांश नेताओं ने जहानाबाद में प्रचार को एक पिकनिक बना दिया था, जहां वो प्रचार करने के नाम पर सेल्फ़ी लेकर व्हाट्सऐप्प ग्रूप और फेसबुक पर डालते और भोजन कर वापस लौट जाते. 
  7. राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव का जेल में रहना उनकी पार्टी के लिए वरदान साबित हुआ. क्योंकि उनकी पार्टी के वोटर से कार्यकर्ता तक एकजुट रहे. वहीं लालू यादव के प्रचार में नहीं रहने के कारण उनके विरोधी निष्क्रिय रूप से प्रचार करते रहे. 
  8. भाजपा को अररिया में और जनता दल यूनाइटेड को जहानाबाद में पार्टी नेताओं के भीतरघात का सामना करना पड़ा. भाजपा के अररिया के प्रत्याशी प्रदीप सिंह को हराने में वहां के भाजपा नेताओं का हाथ है. उन्हें लग रहा था कि अगले लोक सभा चुनाव में वे टिकट के दावेदार नहीं होंगे. 
  9. तेजस्वी यादव का प्रचार के बीच में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को अपने गठबंधन में लाना और बीएसपी अध्यक्ष मायावती को राज्य सभा चुनाव बिहार से लड़ने का प्रस्ताव भी उनकी जीत में एक अहम कारण रहा.
  10. कांग्रेस पार्टी का प्रत्याशी जो भभुआ सीट से पराजित हुआ वो अपने पार्टी के गुटबाज़ी का शिकार हुआ. गठबंधन में टिकट लेना एक अलग बात है लेकिन जब तक आपकी पार्टी के नेता आपका साथ नहीं देते आप चुनाव जीतने के लिए सोच नहीं सकते.



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