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बर्थडे स्पेशल : आशा पारेख को पसंद नहीं थे दिलीप कुमार, कभी साथ में काम नहीं किया

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बर्थडे स्पेशल : आशा पारेख को पसंद नहीं थे दिलीप कुमार, कभी साथ में काम नहीं किया

आशा पारेख (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. पसंद का साथी नहीं मिला तो नहीं की शादी
  2. अपने एकाकी जीवन से खुश हैं आशा पारेख
  3. आशा पारेख की मां मुस्लिम और पिता हिंदू थे
नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा जगत में 50 से 70 तक के तीन दशकों का जमाना वह वक्त था जब पहले सुपर स्टार दिलीप कुमार का फिल्मी दुनिया में डंका बजता था. उनके साथ काम करने के लिए अभिनेत्रियां तरसती थीं. लेकिन 60 के दशक में फिल्मों में पदार्पण करने वालीं आशा पारेख एक ऐसी एक्ट्रेस हैं जिन्होंने दिलीप कुमार के साथ काम करने की इच्छा जाहिर करना तो दूर उनके साथ काम करने के लिए मिले प्रस्ताव तक ठुकरा दिए. उन्होंने दिलीप कुमार के साथ कभी किसी फिल्म में काम नहीं किया. दो अक्टूबर को आशा पारेख का जन्मदिन है. वे 74 वर्ष की हो गई हैं.         

जो पसंद नहीं, उसके साथ काम नहीं
दो अक्टूबर 1942 को बेंगलुरु में एक गुजराती परिवार में जन्मीं आशा पारेख देवानंद, राजेश खन्ना, शशि कपूर, जितेंद्र, मनोज कुमार और धर्मेंद्र सहित कई दिग्गज कलाकारों के साथ बतौर हीरोइन फिल्मों में आईं लेकिन दिलीप कुमार के साथ कभी नहीं दिखीं. कुछ साल पहले आशा पारेख ने दिलीप कुमार के साथ काम न करने के बारे में राज खोला था. उन्होंने पुणे में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में कहा था कि वे दिलीप कुमार को पसंद नहीं करती थीं. उन्होंने कहा था कि जिसे वे पसंद नहीं करतीं, उसके साथ काम नहीं कर सकतीं.      

प्यार हुआ, राज बरकरार
अपनी शर्तों पर जीवन जीने वालीं आशा पारेख ने कभी समझौते नहीं किए, मामला चाहे फिल्म कैरियर का हो या फिर घर-परिवार का. उन्होंने शादी नहीं की क्योंकि उन्हें अपना साथ निभाने वाला कोई योग्य जीवनसाथी नहीं मिल सका. हालांकि कहा जाता है कि आशा पारेख को किसी से प्यार तो हुआ था लेकिन यह संबंध विवाह की मंजिल तक नहीं पहुंच सका. वह कौन शख्स था जिससे उन्हें प्यार हुआ था, यह राज उन्होंने कभी नहीं खोला.

शादी न करने के फैसले से खुश हैं आशा पारेख
आशा पारेख ने हाल ही में एक पत्रिका को दिए गए इंटरव्यू में शादी के सवाल पर कहा कि "मैं शादी नहीं करके बहुत खुश हूं. मेरी मां ने मेरे लिए लड़के की तलाश की, लेकिन कोई सुयोग्य लड़का मिल नहीं पाया. मैं अपने इस फैसले को लेकर बहुत खुश हूं. मेरी किस्मत में शादी नहीं थी, इसलिए नहीं हुई. आज के दौर में जब पति-पत्नी व बच्चे के तनाव को देखती हूं, तो दुख होता है.'' उनका कहना है कि "मुझे कभी भी जीवनसाथी की कमी महसूस नहीं हुई. मुझे जीवन में जो कुछ मिला, उसे लेकर कोई शिकायत नहीं है." हालांकि आशा का यह भी कहना है कि उनका स्वभाव कभी भी अंतर्मुखी नहीं रहा है. वे आज भी दोस्तों से खूब बात करती हैं. उन्होंने कहा कि आप अकेले आते हैं और अकेले जाते हैं. अगर आपकी किस्मत में जीवन साथी नहीं लिखा हुआ है तो आपको वह नहीं मिलता है.

विजय भट्ट की धारणा को गलत साबित किया
दमदार अभिनय और नृत्य में महारथ रखने वालीं ग्लैमरस अभिनेत्री के रूप में चर्चित आशा पारेख को फिल्मकार विजय भट्ट ने सन 1959 में अपनी फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' से यह कहकर निकाल दिया था कि वे अभिनेत्री बनने लायक नहीं हैं. इस घटना के महज आठ दिन बाद ही निर्माता सुबोध मुखर्जी और निर्देशक नासिर हुसैन ने उनको फिल्म 'दिल देके देखो' में शम्मी कपूर के साथ हीरोइन के रूप में लिया. इस फिल्म को शानदार सफलता मिली और आशा पारेख को लेकर विजय भट्ट की धारणा गलत साबित हो गई. इसके साथ ही आशा हिन्दी सिनेमा जगत में स्थापित हो गईं.  

सन 1952 में की थी पहली फिल्म
आशा पारेख की मां मुस्लिम और पिता हिंदू थे. उनकी मां ने उन्हें काफी कम उम्र में ही शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा दिलाई. आशा ने देश-विदेश में कई नृत्य शो भी किए. वे बचपन में डॉक्टर या आईएएस अधिकारी बनना चाहती थीं लेकिन किस्मत उन्हें फिल्म जगत में ले आई. उन्होंने सन 1952 में फिल्म "आसमान" में बाल कलाकार के रूप में अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत की थी. उसी दौर में फिल्म निर्माता बिमल राय ने उन्हें एक शो में नृत्य करते हुए देखा. वे आशा से प्रभावित हुए और उन्होंने 1954 में उन्हें फिल्म "बाप बेटी" में एक भूमिका दी. उस समय आशा की उम्र 12 वर्ष थी.

कई हिट फिल्में
मशहूर फिल्म निर्देशक नासिर हुसैन ने आशा पारेख को लेकर कई फिल्में बनाईं. इनमें 'जब प्यार किसी से होता है' (1961), 'फिर वही दिल लाया हूं' (1963), 'तीसरी मंजिल' (1966), 'बहारों के सपने' (1967), 'प्यार का मौसम' (1969) और 'कारवां' (1971) जैसी फिल्मों ने अपार सफलता हासिल की. उनकी हिट फिल्मों में 'दो बदन' (1966), 'चिराग' (1969), "मैं तुलसी तेरे आंगन की" (1978) व "कटी पतंग " जैसी फिल्में भी शामिल हैं. फिल्म 'कटी पतंग' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला.

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सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष
कई पुरस्कारों से सम्मानित आशा पारेख को 1992 में पद्म श्री पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है. उन्हें 2001 में फिल्म फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार और 2006 में अंतरराष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे 1998 से 2001 तक सेंसर बोर्ड की पहली महिला अध्यक्ष रहीं. आशा पारेख को बोर्ड में सख्त रवैये के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. उन्होंने कई फिल्मों को पास नहीं होने दिया, जिसमें शेखर कपूर की फिल्म 'एलिजाबेथ' भी शामिल है. वे सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्ष भी रही हैं.

वहीदा, हेलन से दोस्ती बरकरार
आशा पारेख फिलहाल एक डांस अकादमी पर ध्यान केंद्रित किए हैं, जिसमें बच्चों को नृत्य प्रशिक्षण दिया जाता है. आशा पारेख अपनी सहेलियों वहीदा रहमान और हेलन से नियमित मेलजोल रखती हैं और अक्सर उनके साथ घूमने जाती हैं.


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