फिल्म रिव्यू- 'मोहेंजो-दारो' की कहानी में नयापन नहीं, गाने- कॉस्ट्यूम आकर्षक, 2 स्टार

फिल्म रिव्यू- 'मोहेंजो-दारो' की कहानी में नयापन नहीं, गाने- कॉस्ट्यूम आकर्षक, 2 स्टार

फिल्म के एक दृश्य में ऋतिक रोशन और पूजा हेगड़े.

मुंबई:

इस फ़िल्मी फ्राइडे रिलीज़ हुई है आशुतोष गोवारिकर की ड्रीम प्रोजेक्ट, ऋतिक रोशन स्टारर 'मोहेंजो दारो'. इससे पहले आशुतोष ने 'लगान', 'जोधा अकबर' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया है. इस फ़िल्म में ऋतिक रोशन, हिंदी फ़िल्म में डेब्यू कर रहीं पूजा हेगड़े, कबीर बेदी, अरुणोदय सिंह, नीतीश भारद्वाज और सुहासिनी मुले ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं. फ़िल्म की कहानी घूमती है प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के इर्द-गिर्द.

यह फ़िल्म 2016 के मोहेंजो दारो में सेट है जहां एक क्रूर नगर-प्रधान 'महाम' के ज़ुल्मों से नगर के लोग दुखी हैं. तभी वहां नील का व्यापार करने के लिए आ पहुंचता है 'सरमन', यहां आकर उसे यह नगर अपना सा लगता है. बाद में उसे पता चलता है कि असल में उसके ख़ून में उसी मिट्टी की ख़ुशबू है. वह मोहेंजो दारों के लोगों को नगर प्रधान के ज़ुल्मों से निजात दिलाने और अपना पुराना बदला लेने का फैसला करता है. मगर सवाल है कि क्यों, कैसे और इसी बीच, कैसी होगी मोहेंजो दारो की प्रचीन सभ्यता. इन सभी सवालों का जवाब आपको सिनेमाघरों में ही मिलेगा पर आप फ़िल्म देखें या न देखें ये फ़ैसला लेने में हम आपकी मदद कर देते हैं फ़िल्म की ख़ामियां और ख़ूबियां बता कर.

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पहले ख़ामियां...फ़िल्म की कहानी पुरानी है क्योंकि इसमें बरसों से चला आ रहा हिंदी फ़िल्मों का पुराना नुस्ख़ा है जिसका नाम है बदला और प्रेम. इस कहानी में कहने को नया कुछ नहीं है. निर्देशक ने जिस कहानी को अपनी कल्पनाओं का जामा पहनाकर मोहेंजो दारो में रखा है उसे दर्शक कई बार देख चुके हैं. आशुतोष गोवारिकर की मानें तो उन्होंने मोहेंजो दारो के लोगों के हुलिए से लेकर उनके पहनावे पर काफी रिसर्च की है. सभ्यता खत्म होने की सच्चाई के तह तक जाने का दावा भी किया गया. पर फ़िल्म सिर्फ़ कॉस्ट्यूम, स्टारकास्ट या सेट्स के बूते नहीं चलती, उसके लिए एक अच्छी कहानी ज़रूरी है और वही 'मोहेंजो दारो' से गायब है. फ़िल्म की स्क्रिप्ट कमज़ोर है. फ़िल्म की भाषा क़िरदारों पर फ़िट नहीं बैठती और क़िरदारों के मुंह से नकली लगती है. फ़िल्म के गानों पर जब ऋतिक रोशन आज के मॉडर्न  स्टेप्स करते नज़र आते हैं जो ये हजम नहीं होता. फ़िल्म के स्पेशल इफ़ेक्ट्स भी कमज़ोर और बेअसर हैं. यह फ़िल्म सिर्फ़ कॉस्ट्यूम-ड्रामा लगती है जहां सिर्फ़ कॉस्ट्यूम ही हावी है उसके अलावा कुछ नहीं.
 
अब ख़ूबियां... ऋतिक रोशन के फ़ैंस के लिए रितिक की फ़िल्म में मौजूदगी इसकी ख़ूबी हो सकती है. वह स्क्रीन पर अच्छे ज़रूर लगते हैं पर किरदार के क़रीब नहीं लगते. पूजा हेगड़े ठीक हैं. फ़िल्म का मुख्य आकर्षण हैं कपड़े और गहने. फ़िल्म के संगीत की बात करें तो संगीतकार एआर रहमान का म्यूज़िक मुझे अच्छा लगा. 'तू है' और टाइटल सॉन्ग 'मोहेंजो-दारो' ज़ुबान पर टिकते हैं. ये दोनों गाने मुझे पसंद आए. फ़िल्म में बस इतनी ही ख़ूबियां हैं. मेरी ओर से फ़िल्म को 2 स्टार्स.