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अन्नप्राशन: जब बच्चा पहली बार चखता है भोजन का स्वाद...

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अन्नप्राशन: जब बच्चा पहली बार चखता है भोजन का स्वाद...

खास बातें

  1. बंगाल में, अन्नप्राशन 'मुखखे भाट' के रूप में भी जाना जाता है
  2. सबसे अहम अनुष्ठानों में से एक अन्नप्राशन अनुष्ठान है
  3. अनुष्ठान के बाद कुछ मजेदार गेम भी खेले जाते हैं
हम सभी जानते हैं कि शुरुआती छह महीनों तक नवजात शिशुओं को बेहद सावधानी और ध्यान से रखा जाता है. उन्हें संक्रमण से बचावना बहुत जरूरी है. इन छह महीनों में सिर्फ मां का दूध ही बच्चे को दिया जाता है. एक शिशु के जीवन में सबसे अहम क्षणों में से एक क्षण वह है जब वह तरल पदार्थ से ठोस भोजन खाना शुरू करता है. इस समय को हिंदू समुदाय में व्यापक रूप से मनाया जाता है, जिसे अन्नप्रसार नाम से जाना जाता है.
 
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छह महीनों में सिर्फ मां का दूध ही बच्चे को दिया जाता है

सबसे अहम अनुष्ठानों में से एक अन्नप्राशन अनुष्ठान है. यह एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ 'भोजन खिलाना' होता है, और क्योंकि यह पहली बार होता है कि एक बच्चे को ठोस रूप में भोजन का सेवन कराया जाता है, तो यह पर्व पूरे परिवार, रिश्तेदारों, और दोस्तों द्वारा बहुत खुशी के साथ मनाया जाता है, यह समारोह विशेष रूप से बंगाली समुदाय, और मलयाली समुदाय में लोकप्रिय है जहां इसे चोरुनल के रूप में जाना जाता है, जबकि घारवाल में इसे भक्तखुलई के रूप में जाना जाता हैं.

इस प्राचीन परंपरा का महत्व क्या है?

यह परंपरा वैदिक काल से चलती आ रही है. कुछ इतिहासकारों के अनुसार, यह समारोह ईरानी संस्कृति और पारसी के बीच भी प्रचलित है.

बंगाल में, अन्नप्राशन 'मुखखे भाट' के रूप में भी जाना जाता है, जब शिशु 6 से 9 महीनों की उम्र के बीच तरल पदार्थ से ठोस पदार्थ लेने के लिए तैयार होते हैं. लड़कों के लिए, यह समारोह छठे या आठवें माह में आयोजित किया जाता है, और लड़कियों के लिए शुभ तारीख के अनुसार. अगर अन्नप्राशन के लिए अभी बच्चा कमजोर है, तो समारोह बाद में किया जा सकता है. हिंदू ग्रंथों के मुताबिक, अन्नप्राशन समारोह को 4 महीने से कम उम्र के बच्चे या पहले साल पूरा होने के बाद नहीं किया जाना चाहिए.
 
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अन्नप्राशन समारोह को 4 महीने से कम उम्र के बच्चे या पहले साल पूरा होने के बाद नहीं किया जाना चाहिए.

समारोह का स्तर हर परिवार में अलग होता है कुछ लोग इसे बड़े स्तर पर मनातें हैं जबकि अन्य इसे एक मंदिर में कर सकते हैं. पहला प्रसाद देवी देवताओं के लिए बनाया जाता है. लोग बच्चे की स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करते हैं और भोजन देने से पहले उसको आशीर्वाद देते हैं. बच्चे को नए और खूबसूरत कपड़े पहनाये जाते हैं-आमतौर पर लड़कों के लिए धोती-कुर्ता या लड़कियों के लिए लाल बानारसी साड़ी. शिशु को अपने मामा (मां भात) की गोद में बैठाया जाता हैं जो उन्हें ठोस भोजन का पहला निवाला खिलते है. हवा को शुद्ध करने के लिए धूप की छड़ के साथ तेल के दीपक जलाया जाता है.

पहला निवाला खिलने के बाद, परिवार के अन्य सदस्य बच्चे को भोजन करते हैं और उसे आशीर्वाद और उपहार देते हैं शिशु का भोजन आमतौर पर चांदी की थाली पर परोसा जाता है और एक चम्मच-चम्मच के साथ खिलाया जाता है. इस समारोह में चावल, मछली और सब्जियों की एक कटोरी और गुड़ जैसे अन्य खाद्य पदार्थ होते हैं. पुजारियों को पूजा करने के लिए बुलाया है और बच्चे की स्वस्थ और शुभ शुरुआत के लिए प्रार्थना की जाती है.
 
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समारोह में चावल, मछली और सब्जियों की एक कटोरी और गुड़ जैसे अन्य खाद्य पदार्थ होते हैं

अनुष्ठान के बाद कुछ मजेदार गेम भी खेले जाते हैं. कुछ वस्तुएं जैसे कलम, किताबें, कुछ भोजन, मिट्टी, और सोने को बच्चे के सामने रखा जाता है, प्रत्येक वस्तु बच्चे के भविष्य का प्रतिनिधित्व करती है. उसके बाद बच्चे को एक वस्तु चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और जो कुछ वह चुनता है वह उसकी भविष्य की संभावनाओं का प्रतीक होता है.

• पेन ज्ञान का प्रतीक है

• पुस्तकें विशाल ज्ञान का प्रतीक हैं

• खाद्य भोजन और खिला लोगों के प्रति बच्चे के प्यार का प्रतिनिधित्व करता है

• क्ले या मिट्टी भविष्य में संपत्ति के साथ अपने अच्छे भाग्य का प्रतिनिधित्व करती है
 
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पुस्तकें विशाल ज्ञान का प्रतीक हैं

चोरूनल के रिवाज भी बहुत भिन्न नहीं हैं इसके लिए भी एक शुभ तारीख चुनी जाती है और समारोह आमतौर पर तब होता है जब बच्चे छह महीने का हो. केरल में, कई माता-पिता इसे मशहूर गुरुवयूर मंदिर में समारोह करने के लिए शुभ मानते हैं. बच्चा पारंपरिक पोशाक में तैयार किया जाता है और अपने माता-पिता की गोद में बैठाया जाता है. चन्दनम (चंदन का पेस्ट) बच्चे के माथे पर लगाया जाता है. बच्चे के सामने केले के पत्ते पर भोजन का दिलचस्प प्रसार होता है जैसे पय्यसम, चावल, दही, नमक, गुड़ और केला जैसे व्यंजन बच्चे की पहली ठोस दावत के लिए परोसा जाता है.

बच्चे के पिता को तब पत्ते पर रखे गए सभी खाद्य पदार्थों में सोने की अंगूठी की डुबकी करने के लिए कहा जाता है और फिर उस अंगूठी के साथ बच्चे की जीभ को स्पर्श कराया जाता है. माता और परिवार के अन्य लोग भी कुछ अनुष्ठान का पालन करते हैं चोरूनल का समारोह आमतौर पर थुलभारम के साथ संपन्न होता है जिसमें बच्चे को भगवान के सामने पेश करने के लिए एक भेंट चढ़ाया जाता है.
 
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कई माता-पिता इसे मशहूर गुरुवयूर मंदिर में समारोह करने के लिए शुभ मानते हैं

हालांकि सालों से यह चलन में है, वही कुछ सावधानियां हैं जो माता-पिता को अपने बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए लेनी चाहिए-

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•    उस विशेष आयु में बच्चे को सुरक्षित रूप से पेश किए जाने वाले खाद्य पदार्थों की पुष्टि करने से पहले एक बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श करने की कोशिश करें. 
•    सुनिश्चित करें कि भोजन को स्वच्छ परिस्थितियों में और आपकी निगरानी में तैयार किया गया है. 
•    उन्हें भोजन के दो से तीन चम्मच से अधिक भोजन नहीं करना चाइये क्योंकि वे पहली बार ठोस आहार ले रहे हैं. 
•    सुनिश्चित करें कि बच्चे को समारोह से पहले आराम दिया जाये.
 
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सुनिश्चित करें कि बच्चे को समारोह से पहले आराम दिया जाये.

 


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