इन 3 युवाओं को सिस्टम की 'नाक में दम' करने के लिए हमेशा याद रखेगा 2016....

इन 3 युवाओं को सिस्टम की 'नाक में दम'  करने के लिए हमेशा याद रखेगा 2016....

बाएं रोहित वेमुला, बीच में जिग्नेश मेवानी, दाएं कन्हैया कुमार (फाइल फोटो)

भारी उठापटक से भरा साल रहा 2016. सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे 'ताकतवर' देशों की जनता ने कुछ अप्रत्याशित फैसले लिए जिसने पूरी दुनिया को हैरानी में डाल दिया. वहीं भारत की बात करें तो तमाम राजनीतिक हंगामे के बीच युवाओं ने भी अपनी उपस्थिति काफी तगड़े तरीके से दर्ज करवाई. खासतौर पर तीन ऐसे युवा चेहरों को मीडिया ने हेडलाइन बनाया जिन्होंने अपने विचारों और आंदोलन से सिस्टम की 'नाक में दम' कर दिया. हालांकि इन तीनों युवाओं के पीछे हजारों की तादाद में उनके युवा समर्थक खड़े रहे, वहीं इनके विरोधियों की संख्या भी कम नहीं थी. जैसे भी देंखे इन युवाओं को इस साल अनदेखा करना मुमकिन नहीं था.

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एक आदमी की कीमत...
इस लिस्ट में सबसे पहला नाम है रोहित वेमुला का, हैदराबाद युनिवर्सिटी के इस दलित छात्र ने जनवरी में खुदकुशी कर ली थी और उसकी लिखी आखिरी चिट्ठी समाज में फैले जातिवाद के मुंह पर एक करारा तमाचा है. रोहित का लिखा सुसाइड नोट किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए काफी है. भारतीय समाज में एक दलित के साथ होने वाले पक्षपातपूर्ण रवैया किस हद तक किसी को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर सकता है, वह वेमुला की खुदकुशी से सामने आती है. चिट्ठी में रोहित ने लिखा - 'एक आदमी की क़ीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नज़दीकी संभावना तक सीमित कर दी गई है. एक वोट तक. आदमी महज़ एक आंकड़ा बन कर रह गया है. अब एक आदमी को उसके दिमाग़ से नहीं आंका जाता.'
 

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रोहित की आत्महत्या के बाद देशभर के विश्वविद्यालयों में छात्रों में नाराज़गी दिखी

रोहित वेमुला की खुदकुशी ने देश भर की युनिवर्सिटी में छात्रों में आक्रोश भर दिया और दलित उत्पीड़न का मुद्दे एक बार फिर अखबारों के पहले पन्ने पर पहुंच गया. वहीं उनकी खुदकुशी से जुड़े मामले को लेकर सियासी तूफान भी आ गया. आरोप था कि दो केंद्रीय मंत्रियों स्‍मृति ईरानी और बंडारू दत्‍तात्रेय के दबाव के बाद दलित छात्रों पर कार्रवाई की गई. रोहित के साथियों ने यूनिवर्सिटी पर आरोप लगाया कि उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था. रोहित समेत पांच स्टूडेंट्स कैंपस गेट के बाहर तंबू लगाकर रह रहे थे. उन्हें 21 दिसंबर को हॉस्टल से बाहर 'फेंक' दिया गया था. रोहित के दोस्तों का कहना है कि उसका 'दिल टूट गया था.' इस मामले ने उस वक्त मानव संसाधन मंत्री रहीं स्मृति ईरानी की छवि पर काफी नकारात्मक प्रभाव डाला. देश भर के छात्रों की शिक्षा मंत्री ईरानी से अलग अलग मुद्दों पर वैसे ही पटरी नहीं खा रही थी और इस मामले ने इस कड़वाहट को और आगे बढ़ा दिया. हालांकि स्मृति ईरानी अब इस मंत्रालय में नहीं है लेकिन एक दलित छात्र की आत्महत्या से खड़ा हुआ यह हंगामा उनके स्मृति पटल से जल्दी नहीं हटने वाला.

'देशद्रोह' और देशभक्‍त‍ि के बीच कन्‍हैया
इस सूची में अगला नाम है, कन्हैया कुमार. रोहित वेमुला खुदुकशी मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी उर्फ जेएनयू ने लाइमलाइट बटोर ली. कन्हैया कुमार और उनके साथियों को जेएनूय में संसद हमले के दोषी अफ़जल गुरु की बरसी पर हुए एक कार्यक्रम के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया. यह फरवरी की बात है, भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि इस कार्यक्रम में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगे हैं, वहीं विपक्ष का कहना था कि कन्हैया कुमार निर्दोष हैं और इस बात की जांच होनी चाहिए कि भारत विरोधी नारे लगाने वाले कौन लोग थे. कन्हैया और उनके दो साथी अनिर्बन भट्टाचार्य और उमर खालिद को इस मामले में गिरफ्तार किया गया. पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर कन्हैया के साथ वकीलों ने मारपीट की जिसके बाद मामला और संगीन होता गया. जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने जेएनयू में भाषण दिया जिसमें उन्होंने एक बार फिर आज़ादी की बात दोहराई - आज़ादी सामंतवाद से, गरीबी से, भुखमरी से, जातिवाद से.
 

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कन्हैया कुमार को कड़ी सुरक्षा में कोर्ट ले जाया गया

कन्हैया के भाषण की समीक्षा की गई, कई युवा उनसे प्रेरित दिखे तो किसी ने कन्हैया को 'देशद्रोही' करार दिया. इन सबके बीच कन्हैया को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया. जहां एक तरफ कन्हैया ने कांग्रेस समेत कई पार्टी के नेताओं से मुलाकात की, वहीं बीजेपी शासित राज्यों में उनका बहिष्कार किया गया. राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने तो यह तक कहा कि पाठयक्रम में विशेष सुधार किया जाएगा और स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनियों को शामिल किया जाएगा, ताकि प्रदेश में कोई कन्हैया पैदा नहीं हो. विशेषज्ञों ने रिपोर्ट कार्ड भी बना दिया कि राजनीति में कन्हैया का भविष्य उज्जवल है. देखते हैं कि यह कन्हैया ज़मीन से जुड़े रहेंगे या बाकी राजनेताओं की भेड़ चाल में खो जाएंगे.

'गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी ज़मीन दो'
इस लिस्ट में तीसरे हैं, गुजरात में दलितों की आवाज़ बनकर उभरे जिग्नेश मेवाणी . 35 साल के जिग्नेश मेवाणी को नए जमाने का 'अग्रेसिव' दलित नेता कहा जा रहा है. पिछले कुछ समय में गुजरात में तीन युवा नेता उभरे हैं, जिन्होंने अपने-अपने समुदाय को एक नए सिरे से जोड़ा है. सबसे पहले आए हार्दिक पटेल, फिर आए ओबीसी एकता की बात लेकर अल्पेश ठाकोर और अब जिग्नेश मेवाणी जो कई मायनों में बाकी दोनों से अलग हैं.
 

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दलित आंदोलन में कन्हैया और जिग्नेश एक मंच पर

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दूसरे युवा नेताओं की तरह इनके पास न दौरे के लिए बड़ी कार है (हार्दिक पटेल फॉरच्यूनर में तो अल्पेश ठाकोर जगुआर में चलते हैं) न ही भीड़ जमा करने के लिए समाज के लोगों का पैसा, लेकिन इनके पास मेहनत, लगन और अपने समाज को समानता और न्याय दिलाने के लिए मन में जुनून है. जिग्नेश ज्यादातर दोस्तों के दुपहिया वाहनों में ही अब भी घूमते हैं.जिग्नेश तब और ज्यादा चर्चा में आए जब गुजरात के उना में दलितों की पिटाई का वीडियो सामने आया. इसके बाद अगस्त में मेवाणी की अगुवाई में राज्य में दलितों की अस्मिता मार्च का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने हिस्सा लिया. आंदोलन का नारा था - 'गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी ज़मीन दो'. यही वो मंच था जहां जिग्नेश, कन्हैया और रोहित को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया था. रोहित की मां वेमुला इस कार्यक्रम में पहुंची थी और उन्होंने ही राष्ट्रीय ध्वज फहराया था.
 

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दलित आंदोलन में रोहित की मां राधिका वेमुला भी पहुंची

जिग्नेश कहते हैं ‘जातिगत सामाजिक आर्थिक ढांचा जिसका आधार ज़मीन है, उसे मिटाना और ज़मीन सुधार पूरे देश में लागू करना ही उनकी राजनीतिक इच्छा है.’ जिग्‍नेश दलितों के प्रति 'अत्याचार' को रेखांकित करने के एक अभियान के तहत मेवाणी की अगुवाई में दलितों ने गुजरात पर्यटन के ब्रांड अंबेसडर और बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन को एक लघु संदेश और टैगलाइन 'बदबू गुजरात की' के साथ कम से कम 1,100 पोस्टकार्ड भी भेजे थे.